<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940</id><updated>2012-01-15T22:03:27.213+05:30</updated><title type='text'>हिन्दी साहित्य</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>48</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-9216420286524829771</id><published>2010-07-16T23:20:00.003+05:30</published><updated>2010-07-16T23:28:41.983+05:30</updated><title type='text'>क्रिया-प्रतिक्रिया</title><content type='html'>मैंने कई बार कि है कोशिश &lt;br /&gt;छोटू को मारने कि &lt;br /&gt;कई बार मारता हूँ &lt;br /&gt;उसे मंत्री कि गाडी के नीचे &lt;br /&gt;पर छोटू है कि मरता ही नहीं &lt;br /&gt;बस शक्ल बदल लेता है अपनी &lt;br /&gt;मारा है मैंने उसे कई बार &lt;br /&gt;कभी मंत्रालय के सामने &lt;br /&gt;कभी भूख से &lt;br /&gt;कभी ठंढ से &lt;br /&gt;पर वो मरता नहीं है &lt;br /&gt;उसे मारने का दावा करते है &lt;br /&gt;कई बुद्धिजीवी &lt;br /&gt;और इस देश के महान नेता &lt;br /&gt;पर मै देखता  हूँ उसे&lt;br /&gt;अक्सर उन्ही बुद्धिजीविओं के साथ &lt;br /&gt;उसी चाय कि दुकान पर जहाँ &lt;br /&gt;अक्सर किये जाते है वादे &lt;br /&gt;उसे मारने के &lt;br /&gt;पर वो है कि मरता ही नहीं &lt;br /&gt;शक्लें बदल लेता है अपनी &lt;br /&gt;कभी तौफ़िक़ तो कभी रमुआ बनकर &lt;br /&gt;शायद वो अमर हो गया है &lt;br /&gt;कि खरीद लिया है उसने &lt;br /&gt;उसे मारने वाले सब लोगों को &lt;br /&gt;मैंने भी कि है कई बार कोशिश &lt;br /&gt;उसे मारने कि &lt;br /&gt;पर वो मरता नहीं &lt;br /&gt;शायद मेरा हथियार ही अच्छा नहीं &lt;br /&gt;शायद मेरी कलम में वो धार नहीं &lt;br /&gt;वो हँसता है हमेशा मुझपर &lt;br /&gt;लेकिन मुझे हत्या करनी है &lt;br /&gt;मरना है छोटू को &lt;br /&gt;हमेशा के लिए &lt;br /&gt;चाहे कलम फेककर ही सही &lt;br /&gt;पर मैं छोटू के हाथ नहीं बिकूँगा &lt;br /&gt;मुझे हत्या करनी है ...... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.........................&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;रंगनाथ रवि&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; की रचना&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छोटू की हत्या मत करो&lt;br /&gt;छोटू को बदलो&lt;br /&gt;हत्या करनी है &lt;br /&gt;तो छोटूवाद की करो&lt;br /&gt;इन छोटूओं के निर्माताओं की करो&lt;br /&gt;निर्माताओं के स्पॉन्सर की करो&lt;br /&gt;इन पर रचे जा रहे नाटकीय स्वांग की करो&lt;br /&gt;हत्या जरूर करो&lt;br /&gt;क्योंकि इनका हृदय परिवर्तन नहीं होता&lt;br /&gt;क्योंकि इनका रवैया परिवर्तित नहीं होता&lt;br /&gt;क्योंकि यही हैं जो खुद को सुधारनेवाले छोटूओं की हत्या करते हैं&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;.......................................... &lt;br /&gt;भास्कर&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-9216420286524829771?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/9216420286524829771/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=9216420286524829771' title='17 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/9216420286524829771'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/9216420286524829771'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='&lt;strong&gt;क्रिया-प्रतिक्रिया&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><thr:total>17</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-7744776422153792809</id><published>2009-08-02T12:34:00.001+05:30</published><updated>2009-08-02T12:36:45.759+05:30</updated><title type='text'>एक भाषा हुआ करती है</title><content type='html'>एक भाषा हुआ करती है&lt;br /&gt;जिसमें जितनी बार मैं लिखना चाहता हूं `आंसू´ से मिलता जुलता कोई शब्द&lt;br /&gt;हर बार बहने लगती है रक्त की धार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक भाषा है जिसे बोलते वैज्ञानिक और समाजविद और तीसरे दर्जे के जोकर&lt;br /&gt;और हमारे समय की सम्मानित वेश्याएं और क्रांतिकारी सब शर्माते हैं&lt;br /&gt;जिसके व्याकरण और हिज्जों की भयावह भूलें ही&lt;br /&gt;कुलशील, वर्ग और नस्ल की श्रेष्ठता प्रमाणित करती हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत अधिक बोली-लिखी, सुनी-पढ़ी जाती,&lt;br /&gt;गाती-बजाती एक बहुत कमाऊ और बिकाऊ बड़ी भाषा&lt;br /&gt;दुनिया के सबसे बदहाल और सबसे असाक्षर, सबसे गरीब और सबसे खूंख़ार,&lt;br /&gt;सबसे काहिल और सबसे थके-लुटे लोगों की भाषा,&lt;br /&gt;अस्सी करोड़ या नब्बे करोड़ या एक अरब भुक्खड़ों, नंगों और ग़रीब-लफंगों की जनसंख्या की भाषा,&lt;br /&gt;वह भाषा जिसे वक़्त ज़रूरत तस्कर, हत्यारे, नेता, दलाल, अफसर, भंड़ुए, रंडियां और कुछ जुनूनी &lt;br /&gt;नौजवान भी बोला करते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह भाषा जिसमें लिखता हुआ हर ईमानदार कवि पागल हो जाता है&lt;br /&gt;आत्मघात करती हैं प्रतिभाएं&lt;br /&gt;`ईश्वर´ कहते ही आने लगती है जिसमें अक्सर बारूद की गंध&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिसमें पान की पीक है, बीड़ी का धुआं, तम्बाकू का झार,&lt;br /&gt;जिसमें सबसे ज्यादा छपते हैं दो कौड़ी के मंहगे लेकिन सबसे ज्यादा लोकप्रिय अखबार&lt;br /&gt;सिफ़त मगर यह कि इसी में चलता है कैडबरीज, सांडे का तेल, सुजूकी, पिजा, आटा-दाल और स्वामी &lt;br /&gt;जी और हाई साहित्य और सिनेमा और राजनीति का सारा बाज़ार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक हौलनाक विभाजक रेखा के नीचे जीने वाले सत्तर करोड़ से ज्यादा लोगों के&lt;br /&gt;आंसू और पसीने और खून में लिथड़ी एक भाषा&lt;br /&gt;पिछली सदी का चिथड़ा हो चुका डाकिया अभी भी जिसमें बांटता है&lt;br /&gt;सभ्यता के इतिहास की सबसे असभ्य और सबसे दर्दनाक चिटि्ठयां&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह भाषा जिसमें नौकरी की तलाश में भटकते हैं भूखे दरवेश&lt;br /&gt;और एक किसी दिन चोरी या दंगे के जुर्म में गिरफ़्तार कर लिए जाते हैं&lt;br /&gt;जिसकी लिपियां स्वीकार करने से इंकार करता है इस दुनिया का समूचा सूचना संजाल&lt;br /&gt;आत्मा के सबसे उत्पीड़ित और विकल हिस्से में जहां जन्म लेते हैं शब्द&lt;br /&gt;और किसी मलिन बस्ती के अथाह गूंगे कुएं में डूब जाते हैं चुपचाप&lt;br /&gt;अतीत की किसी कंदरा से एक अज्ञात सूक्ति को अपनी व्याकुल थरथराहट में थामे लौटता है कोई जीनियस &lt;br /&gt;और घोषित हो जाता है सार्वजनिक तौर पर पागल&lt;br /&gt;नष्ट हो जाती है किसी विलक्षण गणितज्ञ की स्मृति&lt;br /&gt;नक्षत्रों को शताब्दियों से निहारता कोई महान खगोलविद भविष्य भर के लिए अंधा हो जाता है&lt;br /&gt;सिर्फ हमारी नींद में सुनाई देती रहती है उसकी अनंत बड़बड़ाहट...मंगल..शुक्र..&lt;br /&gt;बृहस्पति...सप्त-ॠषि..अरुंधति...ध्रुव..&lt;br /&gt;हम स्वप्न में डरे हुए देखते हैं टूटते उल्का-पिंडों की तरह&lt;br /&gt;उस भाषा के अंतरिक्ष से&lt;br /&gt;लुप्त होते चले जाते हैं एक-एक कर सारे नक्षत्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाषा जिसमें सिर्फ कूल्हे मटकाने और स्त्रियों को&lt;br /&gt;अपनी छाती हिलाने की छूट है&lt;br /&gt;जिसमें दण्डनीय है विज्ञान और अर्थशास्त्र और शासन-सत्ता से संबधित विमर्श&lt;br /&gt;प्रतिबंधित हैं जिसमें ज्ञान और सूचना की प्रणालियां&lt;br /&gt;वर्जित हैं विचार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह भाषा जिसमें की गयी प्रार्थना तक&lt;br /&gt;घोषित कर दी जाती है सांप्रदायिक&lt;br /&gt;वही भाषा जिसमें किसी जिद में अब भी करता है तप कभी-कभी कोई शम्बूक&lt;br /&gt;और उसे निशाने की जद में ले आती है हर तरह की सत्ता की ब्राह्मण-बंदूक&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाषा जिसमें उड़ते हैं वायुयानों में चापलूस&lt;br /&gt;शाल ओढ़ते हैं मसखरे, चाकर टांगते हैं तमगे&lt;br /&gt;जिस भाषा के अंधकार में चमकते हैं किसी अफसर या हुक्काम या किसी पंडे के सफेद दांत और&lt;br /&gt;तमाम मठों पर नियुक्त होते जाते हैं बर्बर बुलडॉग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी देह और आत्मा के घावों को और तो और अपने बच्चों और पत्नी तक से छुपाता&lt;br /&gt;राजधानी में कोई कवि जिस भाषा के अंधकार में&lt;br /&gt;दिन भर के अपमान और थोड़े से अचार के साथ&lt;br /&gt;खाता है पिछले रोज की बची हुई रोटियां&lt;br /&gt;और मृत्यु के बाद पारिश्रमिक भेजने वाले किसी राष्ट्रीय अखबार या मुनाफाखोर प्रकाशक के लिए&lt;br /&gt;तैयार करता है एक और नयी पांडुलिपि&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह वही भाषा है जिसको इस मुल्क में हर बार कोई शरणार्थी, कोई तिजारती, कोई फिरंग&lt;br /&gt;अटपटे लहजे में बोलता और जिसके व्याकरण को रौंदता&lt;br /&gt;तालियों की गड़गड़ाहट के साथ दाखिल होता है इतिहास में&lt;br /&gt;और बाहर सुनाई देता रहता है वर्षो तक आर्तनाद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुनो दायोनीसियस, कान खोल कर सुनो&lt;br /&gt;यह सच है कि तुम विजेता हो फिलहाल, एक अपराजेय हत्यारे&lt;br /&gt;हर छठे मिनट पर तुम काट देते हो इस भाषा को बोलने वाली एक और जीभ&lt;br /&gt;तुम फिलहाल मालिक हो कटी हुई जीभों, गूंगे गुलामों और दोगले एजेंटों के&lt;br /&gt;विराट संग्रहालय के&lt;br /&gt;तुम स्वामी हो अंतरिक्ष में तैरते कृत्रिम उपग्रहों, ध्वनि तरंगों,&lt;br /&gt;संस्कृतियों और सूचनाओं&lt;br /&gt;हथियारों और सरकारों के&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सच है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन देखो,&lt;br /&gt;हर पांचवें सेकंड पर इसी पृथ्वी पर जन्म लेता है एक और बच्चा&lt;br /&gt;और इसी भाषा में भरता है किलकारी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और&lt;br /&gt;कहता है - `मां ´ !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;उदय प्रकाश&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; की कविता साभार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-7744776422153792809?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/7744776422153792809/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=7744776422153792809' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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/&gt;&lt;br /&gt;पानी सा रंगहीन नहीं होता मौन&lt;br /&gt;आवाज़ की तरह&lt;br /&gt;इसके भी होते हैं हज़ार रंग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बही के पन्नों पर लगा अंगूठा&lt;br /&gt;एकलव्य का ही नहीं होता हमेशा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आलीशान इमारतों के दरवाज़ों पर&lt;br /&gt;सलाम करते हांथों में&lt;br /&gt;नफ़रत का दरिया होता है अक्सर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पलता रहता है नासूर सा&lt;br /&gt;घर की अभेद दीवारों के भीतर &lt;br /&gt;एक औरत के सीने में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पसर जाता है शब्दों के बीच&lt;br /&gt;निर्वात सा&lt;br /&gt;और सोख लेता है सारा जीवनद्रव्य&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उतना निःशब्द नहीं होता मौन&lt;br /&gt;उतना मासूम और शालीन&lt;br /&gt;जितना कि &lt;br /&gt;सुनाई देता है अक्सर &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;अशोक कुमार पाण्डेय&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; कृत साभार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-4976896674931777931?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/4976896674931777931/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=4976896674931777931' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/4976896674931777931'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/4976896674931777931'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2009/06/blog-post_24.html' title='&lt;strong&gt;मौन &lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-3061558503468270226</id><published>2009-06-08T08:24:00.001+05:30</published><updated>2009-06-08T08:28:01.634+05:30</updated><title type='text'>कविता समय </title><content type='html'>कविता , ओ कविता!&lt;br /&gt;मुझे मालूम है कि तू न तो मेरी प्रेमिका है&lt;br /&gt;न पत्नी या रखैल&lt;br /&gt;माँ, बहन या बेटी .........&lt;br /&gt;तू तो कुछ भी नहीं है मेरी&lt;br /&gt;मुझे तो यहाँ तक भी नहीं पता है&lt;br /&gt;कि तुझे मेरे होने का अहसास है भी या नहीं&lt;br /&gt;फिर भी , मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता&lt;br /&gt;कि तू क्या सोचती है मेरे बारे में&lt;br /&gt;या कुछ सोचती भी है या नहीं&lt;br /&gt;लेकिन जब कोई मनचला करता है शरारत तेरे साथ&lt;br /&gt;मेरा जी जलता है&lt;br /&gt;जब कोई गढ़ता है सिद्धांत&lt;br /&gt;कि नहीं है जरुरत दुनिया को कविता की&lt;br /&gt;तो जी करता है&lt;br /&gt;बजाऊँ उसके कान के नीचे जोर का तमाचा&lt;br /&gt;ओ कविता !&lt;br /&gt;तेरे बगैर दुनिया में&lt;br /&gt;आदमजात इन्सान रहेंगे&lt;br /&gt;प्यार को अलगा पाएगा इन्सान&lt;br /&gt;पशुवृत्ति सम्भोग से&lt;br /&gt;शब्दों की सर्जनात्मिका शक्ति बची रह पायेगी तेरे बगैर&lt;br /&gt;ओ मेरी कविता रानी!&lt;br /&gt;बिना कविता के सारे आदमजाद हैवान नहीं हो जायेंगे&lt;br /&gt;मैं नहीं करता इंकार&lt;br /&gt;कि बदले हैं मायने इंसानियत के&lt;br /&gt;बाजार ने बना दिया हर चीज को पण्य&lt;br /&gt;तुम्हे भी दल्ले किस्म के हास्य-कवियों ने &lt;br /&gt;बना दिया है सस्ता नचनिया &lt;br /&gt;लोग खोजते हैं कविताओं में गुदगुदी और उत्तेजना &lt;br /&gt;तो भी ओ कविता,&lt;br /&gt;मैं करता भी हूँ &lt;br /&gt;और दिलाता भी हूँ तुम्हे यकीन &lt;br /&gt;कि प्यार और कविता का कोई विकल्प हो ही नहीं सकता &lt;br /&gt;चाहे सटोरिये, चटोरिये, पचोरिये -&lt;br /&gt;लगा लें कितना भी जोर &lt;br /&gt;मुझे अहसास है &lt;br /&gt;कि जिस भी दिल में साँस लेती होगी इंसानियत &lt;br /&gt;उस दिल में तुम्हारा कमरा होगा ज़रूर ।&lt;br /&gt;कविता, ओ कविता !&lt;br /&gt;एक बार ज़रा मुस्कुरा दो जी खोल कर ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रवीन्द्र दास कृत &lt;a href="http://kavita-samay.blogspot.com/"&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;कविता समय&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/a&gt;  ब्लाग से साभार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-3061558503468270226?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/3061558503468270226/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=3061558503468270226' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/3061558503468270226'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/3061558503468270226'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='&lt;strong&gt;कविता समय &lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-8892943290344400292</id><published>2009-05-05T18:30:00.000+05:30</published><updated>2009-05-05T18:32:25.089+05:30</updated><title type='text'> आपकी हँसी</title><content type='html'>निर्धन जनता का शोषण है&lt;br /&gt;कह कर आप हँसे&lt;br /&gt;लोकतंत्र का अंतिम क्षण है&lt;br /&gt;कह कर आप हँसे&lt;br /&gt;सब के सब हैं भ्रष्टाचारी&lt;br /&gt;कह कर आप हँसे&lt;br /&gt;चारों ओर बड़ी लाचारी&lt;br /&gt;कह कर आप हँसे&lt;br /&gt;कितने आप सुरक्षित होंगे&lt;br /&gt;मैं सोचने लगा&lt;br /&gt;सहसा मुझे अकेला पाकर&lt;br /&gt;फिर से आप हँसे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;रघुवीर सहाय&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; रचित साभार&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-8892943290344400292?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/8892943290344400292/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=8892943290344400292' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/8892943290344400292'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/8892943290344400292'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='&lt;strong&gt; आपकी हँसी&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-509570450868352338</id><published>2009-04-28T21:26:00.001+05:30</published><updated>2009-04-28T21:26:43.859+05:30</updated><title type='text'>निर्भिक विद्रोहिणी</title><content type='html'>कोमल और कमजोर स्त्रीत्व की उसकी चाह कभी नहीं रही,&lt;br /&gt;उसने अपने जन्मदिवस पर ढेर फूल नहीं चाहे,&lt;br /&gt;राजसी ऐशो आराम और भड़कीली गाडियों की चाहत नहीं की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्त्री मुक्ति का अर्थ वह बच्चे से अलग होना वहीं मानती,&lt;br /&gt;स्त्री मुक्ति का अर्थ उसके लिये घर से बिखराव नहीं है,&lt;br /&gt;स्त्री मुक्ति उसके लिये गुलाम और परेशान पिता से विद्रोह भी नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह तो अपने लोगों की छोटी से छोटी आवश्यक्ताएं पूरी करती रही,&lt;br /&gt;उनके लिये वह बार-बार अपमानित भी हुई, लेकिन उसने बुरा नहीं माना,&lt;br /&gt;हां,आततायी के सामने उसने आंसू बहाने से इंकार कर दिया ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब न्याय की लंबी लडाई में मारे गए निर्दोषों पर भी वह नहीं रोती।&lt;br /&gt;उसकी केवल एक चाह है स्वतंत्रता&lt;br /&gt;उसकी केवल एक चाह है-&lt;br /&gt;मशाल बराबर जलती रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भ्रष्ट्र और अनैतिक अल्पमत के अत्याचारों के समक्ष,&lt;br /&gt;वह विद्रोहिणी निर्भीक खड़ी है,&lt;br /&gt;ओढाई गई कृत्रिम भीरुता को उसने जीत लिया है&lt;br /&gt;वह एक बडी लड़ाई को प्रतिश्रुत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह सुंदर लग रही है,&lt;br /&gt;उसके सौंदर्य को अब तक के प्रतिमानों से नहीं नापा जा सकता,&lt;br /&gt;उसका मानदंड मानवता के प्रति उसका समर्पण है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;ग्लेरिया म्तुंगवा&lt;/strong&gt; &lt;/em&gt; की एक कविता &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(इस कविता का अनुवाद अर्चना त्रिपाठी ने किया है। )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href="http://prasunbajpai.itzmyblog.com/2008/12/blog-post_22.html"&gt;&lt;em&gt;पुण्य प्रसून बाजपेयी&lt;/em&gt;&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt; के ब्लाग से पूछे बगैर साभार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-509570450868352338?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/509570450868352338/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=509570450868352338' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/509570450868352338'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/509570450868352338'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2009/04/blog-post_1589.html' title='&lt;strong&gt;निर्भिक विद्रोहिणी&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-9121794398829653910</id><published>2009-04-28T21:12:00.001+05:30</published><updated>2009-04-28T21:12:27.971+05:30</updated><title type='text'>कुछ बच्चे बहुत अच्छे होते हैं</title><content type='html'>कुछ बच्चे बहुत अच्छे होते हैं&lt;br /&gt;वे गेंद और ग़ुब्बारे नहीं मांगते&lt;br /&gt;मिठाई नहीं मांगते ज़िद नहीं करते&lt;br /&gt;और मचलते तो हैं ही नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़ों का कहना मानते हैं&lt;br /&gt;वे छोटों का भी कहना मानते हैं&lt;br /&gt;इतने अच्छे होते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने अच्छे बच्चों की तलाश में रहते हैं हम&lt;br /&gt;और मिलते ही&lt;br /&gt;उन्हें ले आते हैं घर&lt;br /&gt;अक्सर&lt;br /&gt;तीस रुपये महीने और खाने पर. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.............................नरेश सक्सेना कृत साभार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-9121794398829653910?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/9121794398829653910/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=9121794398829653910' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/9121794398829653910'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/9121794398829653910'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2009/04/blog-post_744.html' title='&lt;strong&gt;कुछ बच्चे बहुत अच्छे होते हैं&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-6400025545160613073</id><published>2009-03-02T15:13:00.002+05:30</published><updated>2009-03-02T15:25:02.458+05:30</updated><title type='text'>अंग्रेजी भाषा का रोग</title><content type='html'>हमें यह लिखते हुए दु:ख होता है कि हमारे राष्ट्रीय कार्यकर्ता भी इस रोग में उतने ही ग्रस्त हैं, जितने सरकार के कर्मचारी या वकील या कालेजों के अध्यापक। इसमें संदेह नहीं कि वे खद्दर पहनने लगे हैं, पर उनके मनोभावों में लेशमात्र भी संस्कृति नहीं आयी। किसी कमेटी की बैठक में चले जाइए, आप खद्दरधारी महाशयों को फर्राटे से अंग्रेजी झाडते हुए पायेंगे। वह शब्द और वाक्य जो उन्होंने दैनिक पत्रों या अंग्रेजी पत्रों में पढ़े हैं, बाहर निकलने के लिए अकुलाते रहते हैं और अवसर पाते ही फूट निकलते हैं। हँसी तो तब आती है जब यह हज़रत अंग्रेजी न जाननेवाली महिलाओं के सामने भी अपने वाग्विलास से बाज़ नहीं आते। अंग्रेजी भाषा का यह जादू कब तक हमारे सिरों पर रहेगा? कब तक हम अंग्रेजों के गुलाम बने रहेंगे. इससे तो यही टपकता है कि राष्ट्रीयता अभी हृदय की गहराई तक नहीं पहुँचने पायी। महात्मा गाँधी के सिवाय हम किसी नेता को हिन्दी भाषा के प्रचार पर जोर देते नहीं देखते। यह विदित रहे कि जब तक हमारी राष्ट्रभाषा का निर्माण न होगा, भारतीय राष्ट्र का निर्माण ख्वाब और खयाल है। जापानी, जापानी में अपने भावों को प्रकट करता है, चीनी, चीनी भाषा में. ईरानी, फारसी में, लेकिन भारत की शिक्षित जनता अंग्रेजी पढ़ने और बोलने में अपना गौरव समझती है। कितने ही सज्जन तो यह कहने में संकोच नहीं करते कि हिन्दी लिखने या बोलने में उन्हें असुविधा होती है। यह सीधी-सादी मानसिक दासता है। बड़े से बड़ा हिन्दुस्तानी भी एक गोरे से बात करता है तो अंग्रेजी में। वह यह भूलकर भी नहीं सोचता कि अंग्रेज हिन्दुस्तानी में क्यों न बात करे। खैर अंग्रेजों से अंग्रेजी में बात करने को किसी हद तक क्षम्य भी मान लिया जा सकता है, लेकिन आपस में अंग्रेजी में बातचीत करने के लिए तो कोई दलील ही नहीं।&lt;br /&gt;                                                                           ….प्रेमचंद&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-6400025545160613073?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/6400025545160613073/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=6400025545160613073' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/6400025545160613073'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/6400025545160613073'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='&lt;strong&gt;अंग्रेजी भाषा का रोग&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-31170200372705019</id><published>2009-02-24T15:19:00.000+05:30</published><updated>2009-02-24T15:21:20.503+05:30</updated><title type='text'>भूले स्वाद बेर के ! </title><content type='html'>सीता हुई भूमिगत, सखी बनी सूपन खा &lt;br /&gt;बचन बिसर गए गए देर के सबेर के ! &lt;br /&gt;बन गया साहूकार लंकापति विभीषण &lt;br /&gt;पा गए अभयदान शावक कुबेर के ! &lt;br /&gt;जी उठा दसकंधर, स्तब्ध हुए मुनिगण &lt;br /&gt;हावी हुआ स्वर्थामरिग कंधों पर शेर के ! &lt;br /&gt;बुढ्भंस की लीला है, काम के रहे न राम &lt;br /&gt;शबरी न याद रही, भूले स्वाद बेर के ! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.......................... नागार्जुन कृत साभार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-31170200372705019?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/31170200372705019/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=31170200372705019' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/31170200372705019'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/31170200372705019'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2009/02/blog-post_24.html' title='&lt;strong&gt;भूले स्वाद बेर के ! &lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-2426017669834498123</id><published>2009-02-09T16:09:00.001+05:30</published><updated>2009-02-09T16:13:03.339+05:30</updated><title type='text'>मनुष्य एक है</title><content type='html'>इस देश में हिन्दू हैं, मुसलमान हैं, ब्राह्मण हैं, चांडाल हैं, धनी हैं, गरीब हैं - विरूद्ध संस्कारों और विरोधी स्वार्थों की विराट् वाहिनी है। इसमें पद-पद पर गलत समझे जाने का अंदेशा है, प्रतिक्षण विरोधी स्वार्थों के संघर्ष में पिस जाने का डर है, संस्कारों और भावावेशों का शिकार हो जाने का अंदेशा है; परन्तु इन समस्त विरोधों और संघातों से बड़ा और सबको छाप कर विराज रहा है मनुष्य.  इस मनुष्य की भलाई के लिए आप अपने आपको नि:शेष भाव से देकर ही सार्थक हो सकते हैं.  सारा देश आपका है . भेद और विरोध ऊपरी हैं . भीतर मनुष्य एक हैं . इस एक को दृढ़ता के साथ पहचानने का यत्न कीजिए . जो लोग भेद-भाव को पकड़कर ही अपना रास्ता निकालना चाहते हैं, वे गलती करते हैं . विरोधी रहे हैं तो उन्हें आगे भी बने रहना चाहिए, यह कोई काम की बात नहीं हुई . हमें नये सिरे सबकुछ गढ़ना है, तोड़ना नहीं है, टूटे को जोड़ना है . भेद-भाव की जयमाला से हम पार नहीं उतर सकते . कबीर ने हैरान होकर कहा था:&lt;br /&gt;कबीर इस संसार को समझाऊँ कै बार &lt;br /&gt;पूँछ जु पकड़े भेद का, उतरा चाहै पार &lt;br /&gt;मनुष्य एक है. उसके सुख-दु:ख को समझना, उसे मनुष्यता के पवित्र आसन पर बैठना ही हमारा कर्त्तव्य है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हजारीप्रसाद द्विवेदी&lt;br /&gt;&lt;em&gt;मनुष्य की साहित्य का लक्ष्य है&lt;/em&gt; से साभार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-2426017669834498123?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/2426017669834498123/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=2426017669834498123' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/2426017669834498123'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/2426017669834498123'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2009/02/blog-post.html' title='&lt;strong&gt;मनुष्य एक है&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-6097060931935702430</id><published>2008-12-16T13:34:00.001+05:30</published><updated>2008-12-16T13:36:58.003+05:30</updated><title type='text'>इस बार नहीं   </title><content type='html'>इस बार जब वह छोटी सी बच्ची  &lt;br /&gt;मेरे पास अपनी खरोंच लेकर आएगी &lt;br /&gt;मैं उसे फू-फू करके नहीं बहलाऊंगा &lt;br /&gt;पनपने दूंगा उसकी टीस को &lt;br /&gt;इस बार नहीं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बार जब मैं चेहरों पर दर्द लिखूंगा &lt;br /&gt;नहीं गाऊंगा गीत पीड़ा भुला देने वाले &lt;br /&gt;दर्द को रिसने दूंगा &lt;br /&gt;उतरने दूंगा गहरे &lt;br /&gt;इस बार नहीं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बार मैं ना मरहम लगाऊंगा &lt;br /&gt;ना ही उठाऊंगा रुई के फाहे &lt;br /&gt;और ना ही कहूंगा कि तुम आंखे बंद करलो, &lt;br /&gt;गर्दन उधर कर लो मैं दवा लगाता हूं &lt;br /&gt;देखने दूंगा सबको &lt;br /&gt;हम सबको &lt;br /&gt;खुले नंगे घाव &lt;br /&gt;इस बार नहीं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बार जब उलझनें देखूंगा, &lt;br /&gt;छटपटाहट देखूंगा &lt;br /&gt;नहीं दौड़ूंगा उलझी डोर लपेटने &lt;br /&gt;उलझने दूंगा जब तक उलझ सके &lt;br /&gt;इस बार नहीं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बार कर्म का हवाला दे कर नहीं उठाऊंगा औज़ार &lt;br /&gt;नहीं करूंगा फिर से एक नई शुरुआत &lt;br /&gt;नहीं बनूंगा मिसाल एक कर्मयोगी की &lt;br /&gt;नहीं आने दूंगा ज़िंदगी को आसानी से पटरी पर &lt;br /&gt;उतरने दूंगा उसे कीचड़ में, टेढ़े-मेढ़े रास्तों पे &lt;br /&gt;नहीं सूखने दूंगा दीवारों पर लगा खून &lt;br /&gt;हल्का नहीं पड़ने दूंगा उसका रंग &lt;br /&gt;इस बार नहीं बनने दूंगा उसे इतना लाचार &lt;br /&gt;की पान की पीक और खून का फ़र्क ही ख़त्म हो जाए &lt;br /&gt;इस बार नहीं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बार घावों को देखना है &lt;br /&gt;गौर से &lt;br /&gt;थोड़ा लंबे वक्त तक &lt;br /&gt;कुछ फ़ैसले &lt;br /&gt;और उसके बाद हौसले &lt;br /&gt;कहीं तो शुरुआत करनी ही होगी &lt;br /&gt;इस बार यही तय किया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;_ प्रसून जोशी कृत साभार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-6097060931935702430?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/6097060931935702430/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=6097060931935702430' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/6097060931935702430'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/6097060931935702430'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/12/blog-post.html' title='&lt;strong&gt;इस बार नहीं   &lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-1689163767514131537</id><published>2008-09-26T15:33:00.000+05:30</published><updated>2008-09-26T15:34:48.105+05:30</updated><title type='text'>मैंने एक बड़े आदमी से पूछा</title><content type='html'>मैंने एक बड़े आदमी से पूछा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुमने यह कोट कहाँ से पाया'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने मुझे घूर कर देखा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और कोट उतार कर फेंक दिया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने उससे पूछा, 'तुमने यह चश्मा कहाँ से पाया'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने चश्मा भी उतार कर फेंक दिया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और अंधा हो गया!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब मैंने पूछा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'बड़े आदमी तुम आदमी तो हो न!'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो वह नंगा हो गया और मर गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;----------------विश्वनाथ त्रिपाठी से साभार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-1689163767514131537?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/1689163767514131537/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=1689163767514131537' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/1689163767514131537'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/1689163767514131537'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/09/blog-post.html' title='&lt;strong&gt;मैंने एक बड़े आदमी से पूछा&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-4915735454335253065</id><published>2008-08-13T15:56:00.001+05:30</published><updated>2008-08-13T15:58:45.180+05:30</updated><title type='text'>धार</title><content type='html'>कौन बचा है जिसके आगे &lt;br /&gt;इन हाथों को नहीं पसारा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह अनाज जो बदल रक्त में &lt;br /&gt;टहल रहा है तन के कोने-कोने &lt;br /&gt;यह कमीज़ जो ढाल बनी है &lt;br /&gt;बारिश सरदी लू में &lt;br /&gt;सब उधार का, माँगा चाहा &lt;br /&gt;नमक-तेल, हींग-हल्दी तक &lt;br /&gt;सब कर्जे का &lt;br /&gt;यह शरीर भी उनका बंधक &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपना क्या है इस जीवन में &lt;br /&gt;सब तो लिया उधार &lt;br /&gt;सारा लोहा उन लोगों का &lt;br /&gt;अपनी केवल धार. &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;______अरुण कमल, &lt;em&gt;अपनी केवल धार&lt;/em&gt; से साभार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-4915735454335253065?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/4915735454335253065/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=4915735454335253065' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/4915735454335253065'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/4915735454335253065'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/08/blog-post_13.html' title='&lt;strong&gt;धार&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-9093332935785289567</id><published>2008-08-10T21:48:00.001+05:30</published><updated>2008-08-10T23:03:01.765+05:30</updated><title type='text'>ईदगाह</title><content type='html'>रमजान के पूरे तीस रोजों के बाद ईद आयी है. कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभाव है. वृक्षों पर अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक है, आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है. आज का सूर्य देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है, यानी संसार को ईद की बधाई दे रहा है. गॉंव में कितनी हलचल है. ईदगाह जाने की तैयारियॉँ हो रही हैं. किसी के कुरते में बटन नहीं है, पड़ोस के घर में सुई-धागा लेने दौड़ा जा रहा है. किसी के जूते कड़े हो गए हैं, उनमें तेल डालने के लिए तेली के घर पर भागा जाता है. जल्दी-जल्दी बैलों को सानी-पानी दे दें. ईदगाह से लौटते-लौटते दोपहर हो जाएगी. तीन कोस का पेदल रास्ता, फिर सैकड़ों आदमियों से मिलना-भेंटना, दोपहर के पहले लोटना असम्भव है. लड़के सबसे ज्यादा प्रसन्न हैं. किसी ने एक रोजा रखा है, वह भी दोपहर तक, किसी ने वह भी नहीं, लेकिन ईदगाह जाने की खुशी उनके हिस्से की चीज है. रोजे बड़े-बूढ़ो के लिए होंगे. इनके लिए तो ईद है. रोज ईद का नाम रटते थे, आज वह आ गई. अब जल्दी पड़ी है कि लोग ईदगाह क्यों नहीं चलते. इन्हें गृहस्थी चिंताओं से क्या प्रयोजन! सेवैयों के लिए दूध ओर शक्कर घर में है या नहीं, इनकी बला से, ये तो सेवेयां खाऍंगे. वह क्या जानें कि अब्बाजान क्यों बदहवास चौधरी कायमअली के घर दौड़े जा रहे हैं. उन्हें क्या खबर कि चौधरी ऑंखें बदल लें, तो यह सारी ईद मुहर्रम हो जाए. उनकी अपनी जेबों में तो कुबेर काधन भरा हुआ है. बार-बार जेब से अपना खजाना निकालकर गिनते हैं और खुश होकर फिर रख लेते हैं. महमूद गिनता है, एक-दो, दस,-बारह, उसके पास बारह पैसे हैं. मोहनसिन के पास एक, दो, तीन, आठ, नौ, पंद्रह पैसे हैं. इन्हीं अनगिनती पैसों में अनगिनती चीजें लाऍंगें— खिलौने, मिठाइयां, बिगुल, गेंद और जाने क्या-क्या. और सबसे ज्यादा प्रसन्न है हामिद. वह चार-पॉँच साल का गरीब सूरत, दुबला-पतला लड़का, जिसका बाप गत वर्ष हैजे की भेंट हो गया और मॉँ न जाने क्यों पीली होती-होती एक दिन मर गई. किसी को पता क्या बीमारी है. कहती तो कौन सुनने वाला था? दिल पर जो कुछ बीतती थी, वह दिल में ही सहती थी ओर जब न सहा गया,. तो संसार से विदा हो गई. अब हामिद अपनी बूढ़ी दादी अमीना की गोद में सोता है और उतना ही प्रसन्न है. उसके अब्बाजान रूपये कमाने गए हैं. बहुत-सी थैलियॉँ लेकर आऍंगे. अम्मीजान अल्लहा मियॉँ के घर से उसके लिए बड़ी अच्छी-अच्छी चीजें लाने गई हैं, इसलिए हामिद प्रसन्न है. आशा तो बड़ी चीज है, और फिर बच्चों की आशा! उनकी कल्पना तो राई का पर्वत बना लेती है. हामिद के पॉंव में जूते नहीं हैं, सिर परएक पुरानी-धुरानी टोपी है, जिसका गोटा काला पड़ गया है, फिर भी वह प्रसन्न है. जब उसके अब्बाजान थैलियॉँ और अम्मीजान नियमतें लेकर आऍंगी, तो वह दिल से अरमान निकाल लेगा. तब देखेगा, मोहसिन,  नूरे और सम्मी कहॉँ से उतने पैसे निकालेंगे.&lt;br /&gt; अभागिन अमीना अपनी कोठरी में बैठी रो रही है. आज ईद का दिन, उसके घर में दाना नहीं! आज आबिद होता, तो क्या इसी तरह ईद आती ओर चली जाती! इस अन्धकार और निराशा में वह डूबी जा रही है. किसने बुलाया था इस निगोड़ी ईद को? इस घर में उसका काम नहीं, लेकिन हामिद! उसे किसी के मरने-जीने के क्या मतल? उसके अन्दर प्रकाश है, बाहर आशा। विपत्ति अपना सारा दलबल लेकर आये, हामिद की आनंद-भरी चितबन उसका विध्वसं कर देगी.&lt;br /&gt; हामिद भीतर जाकर दादी से कहता है—तुम डरना नहीं अम्मॉँ, मै सबसे पहले आऊँगा. बिल्कुल न डरना.&lt;br /&gt; अमीना का दिल कचोट रहा है. गॉँव के बच्चे अपने-अपने बाप के साथ जा रहे हैं. हामिद का बाप अमीना के सिवा और कौन है! उसे केसे अकेले मेले जाने दे? उस भीड़-भाड़ से बच्चा कहीं खो जाए तो क्या हो? नहीं, अमीना उसे यों न जाने देगी. नन्ही-सी जान! तीन कोस चलेगा कैसे? पैर में छाले पड़ जाऍंगे. जूते भी तो नहीं हैं. वह थोड़ी-थोड़ी दूर पर उसे गोद में ले लेती, लेकिन यहॉँ सेवैयॉँ कोन पकाएगा? पैसे होते तो लौटते-लोटते सब सामग्री जमा करके चटपट बना लेती. यहॉँ तो घंटों चीजें जमा करते लगेंगे. मॉँगे का ही तो भरोसा ठहरा. उस दिन फहीमन के कपड़े सिले थे. आठ आने पेसे मिले थे. उस उठन्नी को ईमान की तरह बचाती चली आती थी इसी ईद के लिए लेकिन कल ग्वालन सिर पर सवार हो गई तो क्या करती? हामिद के लिए कुछ नहीं हे, तो दो पैसे का दूध तो चाहिए ही. अब तो कुल दो आने पैसे बच रहे हैं. तीन पैसे हामिद की जेब में, पांच अमीना के बटुवें में. यही तो बिसात है और ईद का त्यौहार, अल्ला ही बेड़ा पर लगाए. धोबन और नाइन ओर मेहतरानी और चुड़िहारिन सभी तो आऍंगी. सभी को सेवेयॉँ चाहिए और थोड़ा किसी को ऑंखों नहीं लगता. किस-किस सें मुँह चुरायेगी? और मुँह क्यों चुराए? साल-भर का त्योंहार हैं. जिन्दगी खैरियत से रहें, उनकी तकदीर भी तो उसी के साथ है: बच्चे को खुदा सलामत रखे, यें दिन भी कट जाऍंगे.&lt;br /&gt; गॉँव से मेला चला. ओर बच्चों के साथ हामिद भी जा रहा था. कभी सबके सब दौड़कर आगे निकल जाते. फिर किसी पेड़ के नींचे खड़े होकर साथ वालों का इंतजार करते. यह लोग क्यों इतना धीरे-धीरे चल रहे हैं? हामिद के पैरो में तो जैसे पर लग गए हैं. वह कभी थक सकता है? शहर का दामन आ गया. सड़क के दोनों ओर अमीरों के बगीचे हैं. पक्की चारदीवारी बनी हुई है. पेड़ो में आम और लीचियॉँ लगी हुई हैं. कभी-कभी कोई लड़का कंकड़ी उठाकर आम पर निशान लगाता है. माली अंदर से गाली देता हुआ निंलता है. लड़के वहाँ से एक फलॉँग पर हैं. खूब हँस रहे हैं. माली को केसा उल्लू बनाया है.&lt;br /&gt; बड़ी-बड़ी इमारतें आने लगीं. यह अदालत है, यह कालेज है, यह क्लब घर है. इतने बड़े कालेज में कितने लड़के पढ़ते होंगे? सब लड़के नहीं हैं जी! बड़े-बड़े आदमी हैं, सच! उनकी बड़ी-बड़ी मूँछे हैं. इतने बड़े हो गए, अभी तक पढ़ते जाते हैं. न जाने कब तक पढ़ेंगे ओर क्या करेंगे इतना पढ़कर! हामिद के मदरसे में दो-तीन बड़े-बड़े लड़के हें, बिल्कुल तीन कौड़ी के. रोज मार खाते हैं, काम से जी चुराने वाले. इस जगह भी उसी तरह के लोग होंगे ओर क्या. क्लब-घर में जादू होता है. सुना है, यहॉँ मुर्दो की खोपड़ियां दौड़ती हैं. और बड़े-बड़े तमाशे होते हें, पर किसी कोअंदर नहीं जाने देते. और वहॉँ शाम को साहब लोग खेलते हैं. बड़े-बड़े आदमी खेलते हें, मूँछो-दाढ़ी वाले. और मेमें भी खेलती हैं, सच! हमारी अम्मॉँ को यह दे दो, क्या नाम है, बैट, तो उसे पकड़ ही न सके. घुमाते ही लुढ़क जाऍं.&lt;br /&gt; महमूद ने कहा—हमारी अम्मीजान का तो हाथ कॉँपने लगे, अल्ला कसम. &lt;br /&gt; मोहसिन बोल—चलों, मनों आटा पीस डालती हैं. जरा-सा बैट पकड़ लेगी, तो हाथ कॉँपने लगेंगे! सौकड़ों घड़े पानी रोज निकालती हैं. पॉँच घड़े तो तेरी भैंस पी जाती है. किसी मेम को एक घड़ा पानी भरना पड़े, तो ऑंखों तक अँधेरी आ जाए. &lt;br /&gt; महमूद—लेकिन दौड़तीं तो नहीं, उछल-कूद तो नहीं सकतीं.&lt;br /&gt; मोहसिन—हॉँ, उछल-कूद तो नहीं सकतीं; लेकिन उस दिन मेरी गाय खुल गई थी और चौधरी के खेत में जा पड़ी थी, अम्मॉँ इतना तेज दौड़ी कि में उन्हें न पा सका, सच.&lt;br /&gt; आगे चले. हलवाइयों की दुकानें शुरू हुई. आज खूब सजी हुई थीं. इतनी मिठाइयॉँ कौन खाता? देखो न, एक-एक दूकान पर मनों होंगी. सुना है, रात को जिन्नात आकर खरीद ले जाते हैं. अब्बा कहते थें कि आधी रात को एक आदमी हर दूकान पर जाता है और जितना माल बचा होता है, वह तुलवा लेता है और सचमुच के रूपये देता है, बिल्कुल ऐसे ही रूपये.&lt;br /&gt; हामिद को यकीन न आया—ऐसे रूपये जिन्नात को कहॉँ से मिल जाऍंगी?&lt;br /&gt; मोहसिन ने कहा—जिन्नात को रूपये की क्या कमी? जिस खजाने में चाहें चले जाऍं. लोहे के दरवाजे तक उन्हें नहीं रोक सकते जनाब, आप हैं किस फेर में! हीरे-जवाहरात तक उनके पास रहते हैं. जिससे खुश हो गए, उसे टोकरों जवाहरात दे दिए. अभी यहीं बैठे हें, पॉँच मिनट में कलकत्ता पहुँच जाऍं.&lt;br /&gt; हामिद ने फिर पूछा—जिन्नात बहुत बड़े-बड़े होते हैं?&lt;br /&gt; मोहसिन—एक-एक सिर आसमान के बराबर होता है जी! जमीन पर खड़ा हो जाए तो उसका सिर आसमान से जा लगे, मगर चाहे तो एक लोटे में घुस जाए.&lt;br /&gt; हामिद—लोग उन्हें केसे खुश करते होंगे? कोई मुझे यह मंतर बता दे तो एक जिनन को खुश कर लूँ.&lt;br /&gt; मोहसिन—अब यह तो न जानता, लेकिन चौधरी साहब के काबू में बहुत-से जिन्नात हैं. कोई चीज चोरी जाए चौधरी साहब उसका पता लगा देंगे ओर चोर का नाम बता देगें. जुमराती का बछवा उस दिन खो गया था. तीन दिन हैरान हुए, कहीं न मिला तब झख मारकर चौधरी के पास गए. चौधरी ने तुरन्त बता दिया, मवेशीखाने में है और वहीं मिला. जिन्नात आकर उन्हें सारे जहान की खबर दे जाते हैं.&lt;br /&gt; अब उसकी समझ में आ गया कि चौधरी के पास क्यों इतना धन है और क्यों उनका इतना सम्मान है.&lt;br /&gt; आगे चले. यह पुलिस लाइन है. यहीं सब कानिसटिबिल कवायद करते हैं. रैटन! फाय फो! रात को बेचारे घूम-घूमकर पहरा देते हैं, नहीं चोरियॉँ हो जाऍं. मोहसिन ने प्रतिवाद किया—यह कानिसटिबिल पहरा देते हें? तभी तुम बहुत जानते हों अजी हजरत, यह चोरी करते हैं. शहर के जितने चोर-डाकू हें, सब इनसे मुहल्ले में जाकर ‘जागते रहो! जाते रहो!’ पुकारते हैं. तभी इन लोगों के पास इतने रूपये आते हैं. मेरे मामू एक थाने में कानिसटिबिल हैं. बरस रूपया महीना पाते हें, लेकिन पचास रूपये घर भेजते है. अल्ला कसम! मैंने एक बार पूछा था कि मामू, आप इतने रूपये कहॉँ से पाते हैं? हँसकर कहने लगे—बेटा, अल्लाह देता है. फिर आप ही बोले—हम लोग चाहें तो एक दिन में लाखों मार लाऍं. हम तो इतना ही लेते हैं, जिसमें अपनी बदनामी न हो और नौकरी न चली जाए.&lt;br /&gt;हामिद ने पूछा—यह लोग चोरी करवाते हैं, तो कोई इन्हें पकड़ता नहीं?&lt;br /&gt; मोहसिन उसकी नादानी पर दया दिखाकर बोला..अरे, पागल! इन्हें कौन पकड़ेगा! पकड़ने वाले तो यह लोग खुद हैं, लेकिन अल्लाह, इन्हें सजा भी खूब देता है. हराम का माल हराम में जाता है. थोड़े ही दिन हुए, मामू के घर में आग लग गई. सारी लेई-पूँजी जल गई. एक बरतन तक न बचा. कई दिन पेड़ के  नीचे सोए, अल्ला कसम, पेड़ के नीचे! फिरन जाने कहॉँ से एक सौ कर्ज लाए तो बरतन-भॉँड़े आए. &lt;br /&gt; हामिद—एक सौ तो पचार से ज्यादा होते है?&lt;br /&gt; ‘कहॉँ पचास, कहॉँ एक सौ. पचास एक थैली-भर होता है. सौ तो दो थैलियों में भी न आऍं?&lt;br /&gt; अब बस्ती घनी होने लगी. ईइगाह जाने वालो की टोलियॉँ नजर आने लगी. एक से एक भड़कीले वस्त्र पहने हुए. कोई इक्के-तॉँगे पर सवार, कोई मोटर पर, सभी इत्र में बसे, सभी के दिलों में उमंग. ग्रामीणों का यह छोटा-सा दल अपनी विपन्नता से बेखबर, सन्तोष ओर धैर्य में मगन चला जा रहा था. बच्चों के लिए नगर की सभी चीजें अनोखी थीं. जिस चीज की ओर ताकते, ताकते ही रह जाते और पीछे से आर्न की आवाज होने पर भी न चेतते. हामिद तो मोटर के नीचे जाते-जाते बचा.&lt;br /&gt; सहसा ईदगाह नजर आई. ऊपर इमली के घने वृक्षों की छाया है. नाचे पक्का फर्श है,  जिस पर जाजम ढिछा हुआ है. और रोजेदारों की पंक्तियॉँ एक के पीछे एक न जाने कहॉँ वक चली गई हैं, पक्की जगत के नीचे तक, जहॉँ जाजम भी नहीं है. नए आने वाले आकर पीछे की कतार में खड़े हो जाते हैं. आगे जगह नहीं है. यहॉँ कोई धन और पद नहीं देखता. इस्लाम की निगाह में सब बराबर है. इन ग्रामीणों ने भी वजू किया ओर पिछली पंक्ति में खड़े हो गए. कितना सुन्दर संचालन है, कितनी सुन्दर व्यवस्था! लाखों सिर एक साथ सिजदे में झुक जाते हैं, फिर सबके सब एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ झुकते हें, और एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ झुकते हें, और एक साथ खड़े हो जाते हैं, कई बार यही क्रिया होती है, जैसे बिजली की लाखों बत्तियाँ एक साथ प्रदीप्त हों और एक साथ बुझ जाऍं, और यही ग्रम चलता, रहे. कितना अपूर्व दृश्य था, जिसकी सामूहिक क्रियाऍं, विस्तार और अनंतता हृदय को श्रद्धा, गर्व और आत्मानंद से भर देती थीं, मानों भ्रातृत्व का एक सूत्र इन समस्त आत्माओं को एक लड़ी में पिरोए हुए हैं. &lt;br /&gt;2&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नमाज खत्म हो गई. लोग आपस में गले मिल रहे हैं. तब मिठाई और खिलौने की दूकान पर धावा होता है. ग्रामीणों का यह दल इस विषय में बालकों से कम उत्साही नहीं है. यह देखो, हिंडोला हें एक पैसा देकर चढ़ जाओ. कभी आसमान पर जाते हुए मालूम होगें, कभी जमीन पर गिरते हुए. यह चर्खी है, लकड़ी के हाथी, घोड़े, ऊँट, छड़ो में लटके हुए हैं. एक पैसा देकर बैठ जाओं और पच्चीस चक्करों का मजा लो. महमूद और मोहसिन और नूरे ओर सम्मी इन घोड़ों ओर ऊँटो पर बैठते हैं. हामिद दूर खड़ा है. तीन ही पैसे तो उसके पास हैं. अपने कोष का एक तिहाई जरा-सा चक्कर खाने के लिए नहीं दे सकता.&lt;br /&gt; सब चर्खियों से उतरते हैं. अब खिलौने लेंगे. अधर दूकानों की कतार लगी हुई है. तरह-तरह के खिलौने हैं—सिपाही और गुजरिया, राज ओर वकी, भिश्ती और धोबिन और साधु। वह! कत्ते सुन्दर खिलोने हैं. अब बोला ही चाहते हैं. महमूद सिपाही लेता हे, खाकी वर्दी और लाल पगड़ीवाला, कंधें पर बंदूक रखे हुए, मालूम होता हे, अभी कवायद किए चला आ रहा है. मोहसिन को भिश्ती पसंद आया. कमर झुकी हुई है, ऊपर मशक रखे हुए हैं मशक का मुँह एक हाथ से पकड़े हुए है. कितना प्रसन्न है! शायद कोई गीत गा रहा है. बस, मशक से पानी अड़ेला ही चाहता है. नूरे को वकील से प्रेम है. कैसी विद्वत्ता हे उसके मुख पर! काला चोगा, नीचे सफेद अचकन, अचकन के सामने की जेब में घड़ी, सुनहरी जंजीर, एक हाथ में कानून का पौथा लिये हुए. मालूम होता है, अभी किसी अदालत से जिरह या बहस किए चले आ रहे है. यह सब दो-दो पैसे के खिलौने हैं. हामिद के पास कुल तीन पैसे हैं, इतने महँगे खिलौन वह केसे ले? खिलौना कहीं हाथ से छूट पड़े तो चूर-चूर हो जाए. जरा पानी पड़े तो सारा रंग घुल जाए. ऐसे खिलौने लेकर वह क्या करेगा, किस काम के!&lt;br /&gt; मोहसिन कहता है—मेरा भिश्ती  रोज पानी दे जाएगा सॉँझ-सबेरे.&lt;br /&gt; महमूद—और मेरा सिपाही घर का पहरा देगा कोई चोर आएगा, तो फौरन बंदूक से फैर कर देगा.&lt;br /&gt; नूरे—और मेरा वकील खूब मुकदमा लड़ेगा.&lt;br /&gt; सम्मी—और मेरी धोबिन रोज कपड़े धोएगी.&lt;br /&gt; हामिद खिलौनों की निंदा करता है—मिट्टी ही के तो हैं, गिरे तो चकनाचूर हो जाऍं, लेकिन ललचाई हुई ऑंखों से खिलौनों को देख रहा है और चाहता है कि जरा देर के लिए उन्हें हाथ में ले सकता. उसके हाथ अनायास ही लपकते हैं, लेकिन लड़के इतने त्यागी नहीं होते हें, विशेषकर जब अभी नया शौक है. हामिद ललचता रह जाता है.&lt;br /&gt; खिलौने के बाद मिठाइयाँ आती हैं. किसी ने रेवड़ियॉँ ली हें, किसी ने गुलाबजामुन किसी ने सोहन हलवा. मजे से खा रहे हैं. हामिद बिरादरी से पृथक् है. अभागे के पास तीन पैसे हैं. क्यों नहीं कुछ लेकर खाता? ललचाई ऑंखों से सबक ओर देखता है.&lt;br /&gt; मोहसिन कहता है—हामिद रेवड़ी ले जा, कितनी खुशबूदार है!&lt;br /&gt; हामिद को सदेंह हुआ, ये केवल क्रूर विनोद हें मोहसिन इतना उदार नहीं है, लेकिन यह जानकर भी वह उसके पास जाता है. मोहसिन दोने से एक रेवड़ी निकालकर हामिद की ओर बढ़ाता है. हामिद हाथ फैलाता  है. मोहसिन रेवड़ी अपने मुँह में रख लेता है. महमूद नूरे ओर सम्मी खूब तालियॉँ बजा-बजाकर हँसते हैं. हामिद खिसिया जाता है.&lt;br /&gt; मोहसिन—अच्छा, अबकी जरूर देंगे हामिद, अल्लाह कसम, ले जा.&lt;br /&gt; हामिद—रखे रहो. क्या मेरे पास पैसे नहीं है?&lt;br /&gt; सम्मी—तीन ही पेसे तो हैं. तीन पैसे में क्या-क्या लोगें?&lt;br /&gt; महमूद—हमसे गुलाबजामुन ले जाओ हामिद। मोहमिन बदमाश है.&lt;br /&gt; हामिद—मिठाई कौन बड़ी नेमत है. किताब में इसकी कितनी बुराइयॉँ लिखी हैं.&lt;br /&gt; मोहसिन—लेकिन दिन मे कह रहे होगे कि मिले तो खा लें. अपने पैसे क्यों नहीं निकालते?&lt;br /&gt; महमूद—इस समझते हें, इसकी चालाकी. जब हमारे सारे पैसे खर्च हो जाऍंगे, तो हमें ललचा-ललचाकर खाएगा.&lt;br /&gt; मिठाइयों के बाद कुछ दूकानें लोहे की चीजों की, कुछ गिलट और कुछ नकली गहनों की. लड़कों के लिए यहॉँ कोई आकर्षण न था. वे सब आगे बढ़ जाते हैं, हामिद लोहे की दुकान पर रूक जाते हैं.  कई चिमटे रखे हुए थे. उसे ख्याल आया, दादी के पास चिमटा नहीं है. तबे से रोटियॉँ उतारती हैं,  तो हाथ जल जाता है. अगर वह चिमटा ले जाकर दादी को दे दे तो वह कितना प्रसन्न होगी! फिर उनकी ऊगलियॉँ कभी न जलेंगी. घर में एक काम की चीज हो जाएगी. खिलौने से क्या फायदा? व्यर्थ में पैसे खराब होते हैं. जरा देर ही तो खुशी होती है. फिर तो खिलौने को कोई ऑंख उठाकर नहीं देखता. यह तो घर पहुँचते-पहुँचते टूट-फूट बराबर हो जाऍंगे. चिमटा कितने काम की चीज है. रोटियॉँ तवे से उतार लो, चूल्हें में सेंक लो. कोई आग मॉँगने आये तो चटपट चूल्हे से आग निकालकर उसे दे दो. अम्मॉँ बेचारी को कहॉँ फुरसत हे कि बाजार आऍं और इतने पैसे ही कहॉँ मिलते हैं? रोज हाथ जला लेती हैं.&lt;br /&gt; हामिद के साथी आगे बढ़ गए हैं. सबील पर सबके सब शर्बत पी रहे हैं. देखो, सब कतने लालची हैं. इतनी मिठाइयॉँ लीं, मुझे किसी ने एक भी न दी. उस पर कहते है, मेरे साथ खेलो. मेरा यह काम करों. अब अगर किसी ने कोई काम करने को कहा, तो पूछूँगा. खाऍं मिठाइयॉँ, आप मुँह सड़ेगा, फोड़े-फुन्सियॉं निकलेंगी, आप ही जबान चटोरी हो जाएगी. तब घर से पैसे चुराऍंगे और मार खाऍंगे. किताब में झूठी बातें थोड़े ही लिखी हैं. मेरी जबान क्यों खराब होगी? अम्मॉँ चिमटा देखते ही दौड़कर मेरे हाथ से ले लेंगी और कहेंगी—मेरा बच्चा अम्मॉँ के लिए चिमटा लाया है. कितना अच्छा लड़का है. इन लोगों के खिलौने पर कौन इन्हें दुआऍं देगा? बड़ों का दुआऍं सीधे अल्लाह के दरबार में पहुँचती हैं, और तुरंत सुनी जाती हैं. मैं भी इनसे मिजाज क्यों सहूँ? मैं गरीब सही, किसी से कुछ मॉँगने तो नहीं जाते. आखिर अब्बाजान कभीं न कभी आऍंगे. अम्मा भी ऑंएगी ही. फिर इन लोगों से पूछूँगा, कितने खिलौने लोगे? एक-एक को टोकरियों खिलौने दूँ और दिखा हूँ कि दोस्तों के साथ इस तरह का सलूक किया जात है. यह नहीं कि एक पैसे की रेवड़ियॉँ लीं, तो चिढ़ा-चिढ़ाकर खाने लगे. सबके सब हँसेंगे कि हामिद ने चिमटा लिया है. हंसें! मेरी बला से! उसने दुकानदार से पूछा—यह चिमटा कितने का है?&lt;br /&gt; दुकानदार ने उसकी ओर देखा और कोई आदमी साथ न देखकर कहा—तुम्हारे काम का नहीं है जी!&lt;br /&gt; ‘बिकाऊ है कि नहीं?’&lt;br /&gt; ‘बिकाऊ क्यों नहीं है? और यहॉँ क्यों लाद लाए हैं?’&lt;br /&gt; तो बताते क्यों नहीं, कै पैसे का है?’&lt;br /&gt; ‘छ: पैसे लगेंगे.‘&lt;br /&gt; हामिद का दिल बैठ गया.&lt;br /&gt; ‘ठीक-ठीक पॉँच पेसे लगेंगे, लेना हो लो, नहीं चलते बनो.‘&lt;br /&gt; हामिद ने कलेजा मजबूत करके कहा तीन पैसे लोगे?&lt;br /&gt; यह कहता हुआ व आगे बढ़ गया कि दुकानदार की घुड़कियॉँ न सुने. लेकिन दुकानदार ने घुड़कियॉँ नहीं दी. बुलाकर चिमटा दे दिया. हामिद ने उसे इस तरह कंधे पर रखा, मानों बंदूक है और शान से अकड़ता हुआ संगियों के पास आया. जरा सुनें, सबके सब क्या-क्या आलोचनाऍं करते हैं!&lt;br /&gt; मोहसिन ने हँसकर कहा—यह चिमटा क्यों लाया पगले, इसे क्या करेगा?&lt;br /&gt; हामिद ने चिमटे को जमीन पर पटकर कहा—जरा अपना भिश्ती जमीन पर गिरा दो. सारी पसलियॉँ चूर-चूर हो जाऍं बचा की.&lt;br /&gt;महमूद बोला—तो यह चिमटा कोई खिलौना है?&lt;br /&gt; हामिद—खिलौना क्यों नही है! अभी कन्धे पर रखा, बंदूक हो गई. हाथ में ले लिया, फकीरों का चिमटा हो गया. चाहूँ तो इससे मजीरे काकाम ले सकता हूँ. एक चिमटा जमा दूँ, तो तुम लोगों के सारे खिलौनों की जान निकल जाए. तुम्हारे खिलौने कितना ही जोर लगाऍं, मेरे चिमटे का बाल भी बॉंका नही कर सकतें मेरा बहादुर शेर है चिमटा.&lt;br /&gt; सम्मी ने खँजरी ली थी. प्रभावित होकर बोला—मेरी खँजरी से बदलोगे? दो आने की है.&lt;br /&gt; हामिद ने खँजरी की ओर उपेक्षा से देखा-मेरा चिमटा चाहे तो तुम्हारी खॅजरी का पेट फाड़ डाले. बस, एक चमड़े की झिल्ली लगा दी, ढब-ढब बोलने लगी. जरा-सा पानी लग जाए तो खत्म हो जाए. मेरा बहादुर चिमटा आग में, पानी में, ऑंधी में, तूफान में बराबर डटा खड़ा रहेगा.&lt;br /&gt; चिमटे ने सभी को मोहित कर लिया, अब पैसे किसके पास धरे हैं? फिर मेले से दूर निकल आए हें, नौ कब के बज गए, धूप तेज हो रही है. घर पहुंचने की जल्दी हो रही है. बाप से जिद भी करें, तो चिमटा नहीं मिल सकता. हामिद है बड़ा चालाक. इसीलिए बदमाश ने अपने पैसे बचा रखे थे.&lt;br /&gt; अब बालकों के दो दल हो गए हैं. मोहसिन, महमद, सम्मी और नूरे एक तरफ हैं, हामिद अकेला दूसरी तरफ. शास्त्रर्थ हो रहा है. सम्मी तो विधर्मी हा गया! दूसरे पक्ष से जा मिला, लेकिन मोहनि, महमूद और नूरे भी हामिद से एक-एक, दो-दो साल बड़े होने पर भी हामिद के आघातों से  आतंकित हो उठे हैं. उसके पास न्याय का बल है और नीति की शक्ति. एक ओर मिट्टी है, दूसरी ओर लोहा, जो इस वक्त अपने को फौलाद कह रहा है. वह अजेय है,  घातक है. अगर कोई शेर आ जाए मियॉँ भिश्ती के छक्के छूट जाऍं,  जो मियॉँ सिपाही मिट्टी की बंदूक छोड़कर भागे,  वकील साहब की नानी मर जाए, चोगे में मुंह छिपाकर जमीन पर लेट जाऍं. मगर यह चिमटा, यह बहादुर, यह रूस्तमे-हिंद लपककर शेर की गरदन पर सवार हो जाएगा और उसकी ऑंखे निकाल लेगा.&lt;br /&gt; मोहसिन ने एड़ी—चोटी का जारे लगाकर कहा—अच्छा, पानी तो नहीं भर सकता? &lt;br /&gt; हामिद ने चिमटे को सीधा खड़ा करके कहा—भिश्ती को एक डांट बताएगा, तो दौड़ा हुआ पानी लाकर उसके द्वार पर छिड़कने लगेगा.&lt;br /&gt; मोहसिन परास्त हो गया, पर महमूद ने कुमुक पहुँचाई—अगर बचा पकड़ जाऍं तो अदालम में बॅधे-बँधे फिरेंगे. तब तो वकील साहब के पैरों पड़ेगे.&lt;br /&gt; हामिद इस प्रबल तर्क का जवाब न दे सका. उसने पूछा—हमें पकड़ने कौने आएगा?&lt;br /&gt; नूरे ने अकड़कर कहा—यह सिपाही बंदूकवाला.&lt;br /&gt; हामिद ने मुँह चिढ़ाकर कहा—यह बेचारे हम बहादुर रूस्तमे—हिंद को पकड़ेगें! अच्छा लाओ, अभी जरा कुश्ती हो जाए. इसकी सूरत देखकर दूर से भागेंगे. पकड़ेगें क्या बेचारे!&lt;br /&gt; मोहसिन को एक नई चोट सूझ गई—तुम्हारे चिमटे का मुँह रोज आग में जलेगा. &lt;br /&gt; उसने समझा था कि  हामिद लाजवाब हो जाएगा, लेकिन यह बात न हुई. हामिद ने तुरंत जवाब दिया—आग में बहादुर ही कूदते हैं जनाब, तुम्हारे यह वकील, सिपाही और भिश्ती लैडियों की तरह घर में घुस जाऍंगे. आग में वह काम है, जो यह रूस्तमे-हिन्द ही कर सकता है.&lt;br /&gt; महमूद ने एक जोर लगाया—वकील साहब कुरसी—मेज पर बैठेगे, तुम्हारा चिमटा तो बाबरचीखाने में जमीन पर पड़ा रहने के सिवा और क्या कर सकता है?&lt;br /&gt; इस तर्क ने सम्मी औरनूरे को भी सजी कर दिया! कितने ठिकाने की बात कही है पट्ठे ने! चिमटा बावरचीखाने में पड़ा रहने के सिवा और क्या कर सकता है?&lt;br /&gt; हामिद को कोई फड़कता हुआ जवाब न सूझा, तो उसने धॉँधली शुरू की—मेरा चिमटा बावरचीखाने में नही रहेगा. वकील साहब कुर्सी पर बैठेगें, तो जाकर उन्हे जमीन पर पटक देगा और उनका कानून उनके पेट  में डाल देगा.&lt;br /&gt; बात कुछ बनी नही. खाल गाली-गलौज थी, लेकिन कानून को पेट में डालनेवाली बात छा गई. ऐसी छा गई कि तीनों सूरमा मुँह ताकते रह गए मानो कोई धेलचा कानकौआ किसी गंडेवाले कनकौए को काट गया हो. कानून मुँह से बाहर निकलने वाली चीज है. उसको पेट के अन्दर डाल दिया जाना बेतुकी-सी बात होने पर भी कुछ नयापन रखती है. हामिद ने मैदान मार लिया. उसका चिमटा रूस्तमे-हिन्द है. अब इसमें मोहसिन, महमूद नूरे, सम्मी किसी को भी आपत्ति नहीं हो सकती.&lt;br /&gt; विजेता को हारनेवालों से जो सत्कार मिलना स्वाभविक है, वह हामिद को भी मिल। औरों ने तीन-तीन, चार-चार आने पैसे खर्च किए, पर कोई काम की चीज न ले सके. हामिद ने तीन पैसे में रंग जमा लिया. सच ही तो है, खिलौनों का क्या भरोसा? टूट-फूट जाऍंगी. हामिद का चिमटा तो बना रहेगा बरसों?&lt;br /&gt; संधि की शर्ते तय होने लगीं. मोहसिन ने कहा—जरा अपना चिमटा दो, हम भी देखें. तुम हमार भिश्ती लेकर देखो.&lt;br /&gt; महमूद और नूरे ने भी अपने-अपने खिलौने पेश किए.&lt;br /&gt;हामिद को इन शर्तो को मानने में कोई आपत्ति न थी. चिमटा बारी-बारी से सबके हाथ में गया, और उनके खिलौने बारी-बारी से हामिद के हाथ में आए. कितने खूबसूरत खिलौने हैं.&lt;br /&gt; हामिद ने हारने वालों के ऑंसू पोंछे—मैं तुम्हे चिढ़ा रहा था, सच! यह चिमटा भला, इन खिलौनों की क्या बराबर करेगा, मालूम होता है, अब बोले, अब बोले.&lt;br /&gt; लेकिन मोहसनि की पार्टी को इस दिलासे से संतोष नहीं होता. चिमटे का सिल्का खूब बैठ गया है. चिपका हुआ टिकट अब पानी से नहीं छूट रहा है.&lt;br /&gt; मोहसिन—लेकिन इन खिलौनों के लिए कोई हमें दुआ तो न देगा?&lt;br /&gt; महमूद—दुआ को लिय फिरते हो. उल्टे मार न पड़े. अम्मां जरूर कहेंगी कि मेले में यही मिट्टी के खिलौने मिले?&lt;br /&gt; हामिद को स्वीकार करना पड़ा कि खिलौनों को देखकर किसी की मां इतनी खुश न होगी, जितनी दादी चिमटे को देखकर होंगी. तीन पैसों ही में तो उसे सब-कुछ करना था ओर उन पैसों के इस उपयों पर पछतावे की बिल्कुल जरूरत न थी. फिर अब तो चिमटा रूस्तमें—हिन्द है ओर सभी खिलौनों का बादशाह.&lt;br /&gt; रास्ते में महमूद को भूख लगी. उसके बाप ने केले खाने को दियें. महमून ने केवल हामिद को साझी बनाया. उसके अन्य मित्र मुंह ताकते रह गए. यह उस चिमटे का प्रसाद थां. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्यारह बजे गॉँव में हलचल मच गई. मेलेवाले आ गए. मोहसिन की छोटी बहन दौड़कर भिश्ती उसके हाथ से छीन लिया और मारे खुशी के जा उछली, तो मियॉं भिश्ती नीचे आ रहे और सुरलोक सिधारे. इस पर भाई-बहन में मार-पीट हुई. दानों खुब रोए. उसकी अम्मॉँ यह शोर सुनकर बिगड़ी और दोनों को ऊपर से दो-दो चॉँटे और लगाए.&lt;br /&gt; मियॉँ नूरे के वकील का अंत उनके प्रतिष्ठानुकूल इससे ज्यादा गौरवमय हुआ. वकील जमीन पर या ताक पर हो नहीं बैठ सकता. उसकी मर्यादा का विचार तो करना ही होगा. दीवार में खूँटियाँ गाड़ी गई. उन पर लकड़ी का एक पटरा रखा गया. पटरे पर कागज का कालीन बिदाया गया. वकील साहब राजा भोज की भाँति सिंहासन पर विराजे. नूरे ने उन्हें पंखा झलना शुरू किया. आदालतों में खर की टट्टियॉँ और बिजली के पंखे रहते हैं. क्या यहॉँ मामूली पंखा भी न हो! कानून की गर्मी दिमाग पर चढ़ जाएगी कि नहीं? बॉँस कापंखा आया ओर नूरे हवा करने लगें मालूम नहीं, पंखे की हवा से या पंखे की चोट से वकील साहब स्वर्गलोक से मृत्युलोक में आ रहे और उनका माटी का चोला माटी में मिल गया! फिर बड़े जोर-शोर से मातम हुआ और वकील साहब की अस्थि घूरे पर डाल दी गई.&lt;br /&gt; अब रहा महमूद का सिपाही. उसे चटपट गॉँव का पहरा देने का चार्ज मिल गया, लेकिन पुलिस का सिपाही कोई साधारण व्यक्ति तो नहीं, जो अपने पैरों चलें वह पालकी पर चलेगा. एक टोकरी आई, उसमें कुछ लाल रंग के फटे-पुराने चिथड़े बिछाए गए जिसमें सिपाही साहब आराम से लेटे. नूरे ने यह टोकरी उठाई और अपने द्वार का चक्कर लगाने लगे. उनके दोनों छोटे भाई सिपाही की तरह ‘छोनेवाले, जागते लहो’ पुकारते चलते हैं. मगर रात तो अँधेरी होनी चाहिए, नूरे को ठोकर लग जाती है. टोकरी उसके हाथ से छूटकर गिर पड़ती है और मियॉँ सिपाही अपनी बन्दूक लिये जमीन पर आ जाते हैं और उनकी एक टॉँग में विकार आ जाता है. &lt;br /&gt; महमूद को आज ज्ञात हुआ कि वह अच्छा डाक्टर है. उसको ऐसा मरहम मिला गया है जिससे वह टूटी टॉँग को आनन-फानन जोड़ सकता है. केवल गूलर का दूध चाहिए. गूलर का दूध आता है. टाँग जावब दे देती है. शल्य-क्रिया असफल हुई, तब उसकी दूसरी टाँग भी तोड़ दी जाती है. अब कम-से-कम एक जगह आराम से बैठ तो सकता है. एक टॉँग से तो न चल सकता था, न बैठ सकता था. अब वह सिपाही संन्यासी हो गया है. अपनी जगह पर बैठा-बैठा पहरा देता है. कभी-कभी देवता भी बन जाता है. उसके सिर का झालरदार साफा खुरच दिया गया है. अब उसका जितना रूपांतर चाहों, कर सकते हो. कभी-कभी तो उससे बाट का काम भी लिया जाता है.&lt;br /&gt; अब मियॉँ हामिद का हाल सुनिए. अमीना उसकी आवाज सुनते ही दौड़ी और उसे गोद में उठाकर प्यार करने लगी. सहसा उसके हाथ में चिमटा देखकर वह चौंकी.&lt;br /&gt; ‘यह चिमटा कहॉं था?’&lt;br /&gt; ‘मैंने मोल लिया है.‘&lt;br /&gt; ‘कै पैसे में?&lt;br /&gt; ‘तीन पैसे दिये.‘&lt;br /&gt; अमीना ने छाती पीट ली. यह कैसा बेसमझ लड़का है कि दोपहर हुआ, कुछ खाया न पिया. लाया क्या, चिमटा! ‘सारे मेले में तुझे और कोई चीज न मिली, जो यह लोहे का चिमटा उठा लाया?’&lt;br /&gt; हामिद ने अपराधी-भाव से कहा—तुम्हारी उँगलियॉँ तवे से जल जाती थीं, इसलिए मैने इसे लिया.&lt;br /&gt;बुढ़िया का क्रोध तुरन्त स्नेह में बदल गया, और स्नेह भी वह नहीं, जो प्रगल्भ होता हे और अपनी सारी कसक शब्दों में बिखेर देता है. यह मूक स्नेह था, खूब ठोस, रस और स्वाद से भरा हुआ. बच्चे में कितना व्याग, कितना सदभाव और कितना विवेक है! दूसरों को खिलौने लेते और मिठाई खाते देखकर इसका मन कितना ललचाया होगा? इतना जब्त इससे हुआ कैसे? वहॉँ भी इसे अपनी बुढ़िया दादी की याद बनी रही. अमीना का मन गदगद हो गया.&lt;br /&gt; और अब एक बड़ी विचित्र बात हुई. हामिद कें इस चिमटे से भी विचित्र। बच्चे हामिद ने बूढ़े हामिद का पार्ट खेला था. बुढ़िया अमीना बालिका अमीना बन गई. वह रोने लगी. दामन फैलाकर हामिद को दुआऍं देती जाती थी और आँसूं की बड़ी-बड़ी बूंदे गिराती जाती थी. हामिद इसका रहस्य क्या समझता!&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;________________________________प्रेमचंद की कहानी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-9093332935785289567?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/9093332935785289567/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=9093332935785289567' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/9093332935785289567'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/9093332935785289567'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/08/blog-post_10.html' title='&lt;strong&gt;ईदगाह&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-3711891274339038380</id><published>2008-08-09T12:38:00.002+05:30</published><updated>2008-08-09T12:50:58.418+05:30</updated><title type='text'>ठाकुर का कुआँ</title><content type='html'>जोखू ने लोटा मुंह से लगाया तो पानी में सख्त बदबू आई. गंगी से बोला-यह कैसा पानी है? मारे बास के पिया नहीं जाता. गला सूखा जा रहा है और तू सडा पानी पिलाए देती है!&lt;br /&gt;     गंगी प्रतिदिन शाम पानी भर लिया करती थी. कुआं दूर था, बार-बार जाना मुश्किल था. कल वह पानी लायी, तो उसमें बू बिलकुल न थी, आज पानी में बदबू कैसी! लोटा नाक से लगाया, तो सचमुच बदबू थी. जरुर  कोई जानवर कुएं में गिरकर मर गया होगा, मगर दूसरा पानी आवे कहां से?&lt;br /&gt;     ठाकुर के कुंए पर कौन चढ़नें देगा? दूर से लोग डॉँट बताऍगे. साहू का कुऑं गॉँव के उस सिरे पर है, परन्तु वहॉं कौन पानी भरने देगा? कोई कुऑं गॉँव में नहीं है. &lt;br /&gt;     जोखू कई दिन से बीमार हैं. कुछ देर तक तो प्यास रोके चुप पड़ा रहा, फिर बोला-अब तो मारे प्यास के रहा नहीं जाता. ला, थोड़ा पानी नाक बंद करके पी लूं.&lt;br /&gt;     गंगी ने पानी न दिया. खराब पानी से बीमारी बढ़ जाएगी इतना जानती थी, परंतु यह न जानती थी कि पानी को उबाल देने से उसकी खराबी जाती रहती हैं. बोली-यह पानी कैसे पियोंगे? न जाने कौन जानवर मरा हैं. कुऍ से मै दूसरा पानी लाए देती हूँ. &lt;br /&gt;     जोखू ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा-पानी कहॉ से लाएगी?&lt;br /&gt;     ठाकुर और साहू के दो कुऍं तो हैं. क्यो एक लोटा पानी न भरन देंगे? &lt;br /&gt;     ‘हाथ-पांव तुड़वा आएगी और कुछ न होगा. बैठ चुपके से. ब्राहम्ण देवता आशीर्वाद देंगे, ठाकुर लाठी मारेगें, साहूजी एक पांच लेगें. गराबी का दर्द कौन समझता हैं! हम तो मर भी जाते है, तो कोई दुआर पर झॉँकनें नहीं आता, कंधा देना तो बड़ी बात है. ऐसे लोग कुएँ से पानी भरने देंगें?’&lt;br /&gt;     इन शब्दों में कड़वा सत्य था. गंगी क्या जवाब देती, किन्तु उसने वह बदबूदार पानी पीने को न दिया.&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;2&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;रात के नौ बजे थे. थके-मॉँदे मजदूर तो सो चुके थें, ठाकुर के दरवाजे पर दस-पॉँच बेफिक्रे जमा थें मैदान में. बहादुरी का तो न जमाना रहा है, न मौका. कानूनी बहादुरी की बातें हो रही थीं. कितनी होशियारी से ठाकुर ने थानेदार को एक खास मुकदमे की नकल ले आए. नाजिर और मोहतिमिम, सभी कहते थें, नकल नहीं मिल सकती. कोई पचास मॉँगता, कोई सौ. यहॉ बे-पैसे-कौड़ी नकल उड़ा दी. काम करने ढ़ग चाहिए.&lt;br /&gt;     इसी समय गंगी कुऍ से पानी लेने पहुँची.&lt;br /&gt;     कुप्पी की धुँधली रोशनी कुऍं पर आ रही थी. गंगी जगत की आड़ मे बैठी मौके का इंतजार करने लगी. इस कुँए का पानी सारा गॉंव पीता हैं. किसी के लिए रोका नहीं, सिर्फ ये बदनसीब नहीं भर सकते. &lt;br /&gt;     गंगी का विद्रोही दिल रिवाजी पाबंदियों और मजबूरियों पर चोटें करने लगा-हम क्यों नीच हैं और ये लोग क्यों ऊचें हैं? इसलिए किये लोग गले में तागा डाल लेते हैं? यहॉ तो जितने है, एक-से-एक छॅटे हैं. चोरी ये करें, जाल-फरेब ये करें, झूठे मुकदमे ये करें. अभी इस ठाकुर ने तो उस दिन बेचारे गड़रिए की भेड़ चुरा ली थी और बाद मे मारकर खा गया. इन्हीं पंडित के घर में तो बारहों मास जुआ होता है. यही साहू जी तो घी में तेल मिलाकर बेचते है. काम करा लेते हैं, मजूरी देते नानी मरती है. किस-किस बात मे हमसे ऊँचे हैं, हम गली-गली चिल्लाते नहीं कि हम ऊँचे है, हम ऊँचे. कभी गॉँव में आ जाती हूँ, तो रस-भरी आँख से देखने लगते हैं. जैसे सबकी छाती पर सॉँप लोटने लगता है, परंतु घमंड यह कि हम ऊँचे हैं!&lt;br /&gt;     कुऍं पर किसी के आने की आहट हुई. गंगी की छाती धक-धक करने लगी. कहीं देख ले तो गजब हो जाए. एक लात भी तो नीचे न पड़े. उसाने घड़ा और रस्सी उठा ली और झुककर चलती हुई एक वृक्ष के अँधरे साए मे जा खड़ी हुई. कब इन लोगों को दया आती है किसी पर! बेचारे महगू को इतना मारा कि महीनो लहू थूकता रहा. इसीलिए तो कि उसने बेगार न दी थी. इस पर ये लोग ऊँचे बनते हैं?&lt;br /&gt;     कुऍं पर स्त्रियाँ पानी भरने आयी थी. इनमें बात हो रही थीं. &lt;br /&gt;     ‘खान खाने चले और हुक्म हुआ कि ताजा पानी भर लाओं. घड़े के लिए पैसे नहीं है.’&lt;br /&gt;     हम लोगों को आराम से बैठे देखकर जैसे मरदों को जलन होती हैं.’&lt;br /&gt;     ‘हाँ, यह तो न हुआ कि कलसिया उठाकर भर लाते. बस, हुकुम चला दिया कि ताजा पानी लाओ, जैसे हम लौंडियाँ ही तो हैं.’&lt;br /&gt;     ‘लौडिंयॉँ नहीं तो और क्या हो तुम? रोटी-कपड़ा नहीं पातीं? दस-पाँच रुपये भी छीन-झपटकर ले ही लेती हो. और लौडियॉं कैसी होती हैं!’&lt;br /&gt;     ‘मत लजाओं, दीदी! छिन-भर आराम करने को ती तरसकर रह जाता है. इतना काम किसी दूसरे के घर कर देती, तो इससे कहीं आराम से रहती. ऊपर से वह एहसान मानता! यहॉं काम करते-करते मर जाओं, पर किसी का मुँह ही सीधा नहीं होता.’&lt;br /&gt;     दानों पानी भरकर चली गई, तो गंगी वृक्ष की छाया से निकली और कुऍं की जगत के पास आयी. बेफिक्रे चले गऐ थें. ठाकुर भी दरवाजा बंदर कर अंदर ऑंगन में सोने जा रहे थें. गंगी ने क्षणिक सुख की सॉस ली. किसी तरह मैदान तो साफ हुआ. अमृत चुरा लाने के लिए जो राजकुमार किसी जमाने में गया था, वह भी शायद इतनी सावधानी के साथ और समझ्-बूझकर न गया हो. गंगी दबे पॉँव कुऍं की जगत पर चढ़ी, विजय का ऐसा अनुभव उसे पहले कभी न हुआ.&lt;br /&gt;     उसने रस्सी का फंदा घड़े में डाला. दाऍं-बाऍं चौकनी दृष्टी से देखा जैसे कोई सिपाही रात को शत्रु के किले में सूराख कर रहा हो. अगर इस समय वह पकड़ ली गई, तो फिर उसके लिए माफी या रियायत की रत्ती-भर उम्मीद नहीं. अंत मे देवताओं को याद करके उसने कलेजा मजबूत किया और घड़ा कुऍं में डाल दिया.&lt;br /&gt;     घड़े ने पानी में गोता लगाया, बहुत ही आहिस्ता. जरा-सी आवाज न हुई. गंगी ने दो-चार हाथ जल्दी-जल्दी मारे. घड़ा कुऍं के मुँह तक आ पहुँचा. कोई बड़ा शहजोर पहलवान भी इतनी तेजी से न खींच सकता था. &lt;br /&gt;     गंगी झुकी कि घड़े को पकड़कर जगत पर रखें कि एकाएक ठाकुर साहब का दरवाजा खुल गया. शेर का मुँह इससे अधिक भयानक न होगा. &lt;br /&gt;     गंगी के हाथ रस्सी छूट गई. रस्सी के साथ घड़ा धड़ाम से पानी में गिरा और कई क्षण तक पानी में हिलकोरे की आवाजें सुनाई देती रहीं. &lt;br /&gt;     ठाकुर कौन है, कौन है? पुकारते हुए कुऍं की तरफ जा रहे थें और गंगी जगत से कूदकर भागी जा रही थी. &lt;br /&gt;     घर पहुँचकर देखा कि लोटा मुंह से लगाए वही मैला गंदा पानी रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;______________________ प्रेमचंद रचित कहानी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-3711891274339038380?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/3711891274339038380/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=3711891274339038380' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/3711891274339038380'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/3711891274339038380'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/08/blog-post_09.html' title='&lt;strong&gt;ठाकुर का कुआँ&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-3407990019728344590</id><published>2008-08-08T10:14:00.006+05:30</published><updated>2008-08-08T10:36:29.463+05:30</updated><title type='text'>कब्रिस्तान में पंचायत </title><content type='html'>&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;" src="http://4.bp.blogspot.com/_5z_5iTul5kU/SJvT1raow8I/AAAAAAAAAb0/hQQKZQjrcgI/s400/asw.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5232008311261938626" /&gt;&lt;br /&gt;यह शीर्षक कुछ चौंकानेवाला लग सकता है. पर मेरी मजबूरी है कि जिस घटना का बयान करने जा रहा हूँ, उसके लिए उसके सिवा कोई शीर्षक हो ही नहीं सकता. कब्रिस्तान वह जगह है जहाँ सारी पंचायतें खत्म हो जाती हैं. मुझे याद आता है कि रूसी कवयित्री अन्ना अख्मातोवा की एक युद्धकालीन कविता में बमबारी से ध्वस्त पीटर्सबर्ग (जो तब लेनिनग्राद कहलाता था) के बारे में एक तिलमिला देने वाली टिप्पणी है, जिसमें वे कहती हैं—‘‘इस समय शहर में अगर कहीं कोई ताज़गी है तो सिर्फ कब्रिस्तान की उस मिट्टी में, जो अभी-अभी खोदी गई है.’’ शब्द मुझे ठीक-ठीक याद नहीं. पर आशय यही है. कब्रिस्तान पर बहुत-सी कविताएँ लिखी गई हैं. पर अन्ना अख्मातोवा की यह पंक्ति शायद सब पर भारी पड़ती है. कब्रिस्तान का जो पक्ष मुझे सबसे ज्यादा दिलचस्प लगता है वह यह कि कई बार मृतकों के घर के आजूबाजू जिन्दा लोगों के भी घर होते हैं. जीवन और मृत्यु का यह विलक्षण सह-अस्तित्व सिर्फ एक कब्रिस्तान में ही दिखाई पड़ता है—जहाँ एक ओर नया गड्ढा खोदा जा रहा है तो दूसरी ओर बच्चे लुका-छिपी खेल रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे अपने गाँव में मुसलमान परिवारों की संख्या ज्यादा नहीं है. सन् सैंतालीस से पहले कुछ अधिक परिवार थे. पर उसके बाद उनकी संख्या क्रमशः कम होती गई. वे कहाँ गए, इसके बारे में कोई कुछ नहीं जानता. अब सिर्फ तीन-चार परिवार रह गए हैं और उनका यह छोटा-सा कब्रिस्तान है, जो गाँव के एक सिरे पर है. मुझे याद नहीं कि आधुनिक सुविधाओं से वंचित उस छोटे से गाँव में कभी कोई साम्प्रदायिक तनाव हुआ हो. हाँ, एक बात जरूर हुई है कि कब्रिस्तान की भूमि थोड़ी पहले से सिकुड़ गई है, जिसे चारों ओर से बाँस और नागफनी के जंगल ने ढँक लिया है. शायद यही कारण है कि वह छोडी़ हुई भूमि आबादी का हिस्सा बनने से बच गई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर सभी जगह ऐसा नहीं है. हम सब जानते हैं कि कब्रिस्तान की भूमि को लेकर छोटे-मोटे तनाव अक्सर होते रहते हैं. कई बार इसकी दुर्भाग्यपूर्ण परिणतियाँ भी देखी गई हैं. एक ऐसे ही अवसर पर होने वाली पंचायत में मुझे शामिल होना पड़ा था, जिसकी स्मृति मेरे जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण स्मृतियों में से एक है. पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिस छोटे-से टाउन में मैं प्राचार्य पद पर कार्य करता था, उसके आसपास के गाँवों में मुस्लिम आबादी अच्छी खासी थी. पर कुल मिलाकर बुद्ध की स्मृति की छाया में पलने वाला वह जनपद साम्प्रदायिक सौहार्द के लिहाज से काफी शान्त रहा है और किसी हद तक आज भी है. पर एक बार एक कस्बानुमा-गाँव में, जहाँ दोनों सम्प्रदायों की आबादी लगभग बराबर थी, एक छोटी-सी घटना घट गई. वह होली के आसपास का समय था, जब हवा में पकी हुई फसल की एक हल्की-सी गंध घुली रहती है. पर तनाव की प्रकृति शायद यह होती है कि वह कभी भी और कहीं से भी ज्यादा पैदा हो सकता है—फिर वह कब्रिस्तान की बंजर भूमि ही क्यों न हो. अचानक यह खबर फैली कि उस गाँव में दंगा हो गया है और आशंका थी कि वह पूरे इलाके में आग की लपट की तरह फैल न जाए. जिलाधिकारी ने समय रहते अपने पूरे पुलिस बल के साथ हस्तक्षेप किया और फसाद थम गया. पर सिर्फ वह थमा था, खत्म नहीं हुआ था. फिर जिलाधिकारी की पहल पर ही इलाके के कुछ प्रमुख लोगों को बुलाया गया, जिसमें महाविद्यालय का प्रिंसिपल होने के नाते मैं भी शामिल था. फिर पूरी टोली उस स्थान पर ले जाई गई, जहाँ से दंगा शुरू हुआ था. वह कब्रिस्तान की जमीन थी, जिसके एक किनारे पर दो-चार घर बने हुए थे और मवेशियों के लिए कुछ दोचारे भी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहाँ दोनों समुदाय के कुछ वरिष्ठ लोग बुलाए गए और तय हुआ कि समस्या का समाधान पंचायत के द्वारा निकाला जाएगा. जिलाधिकारी ने घोषित किया कि दोनों पक्ष के लोग एक-एक पंच मनोनीत करेंगे और दोनों मिलकर जो फैसला करेंगे, वह दोनों ही समुदायों को मान्य होगा. बहुसंख्यक समुदाय ने पहले निर्णय किया और फिर मुझे बताया गया कि वहाँ से मेरे नाम का प्रस्ताव किया गया है. अल्पसंख्यक समुदाय के निर्णय में थोड़ा समय लगा. पर अन्ततः उन्होंने भी एक फैसला कर लिया और उसे एक चिट पर लिखकर जिलाधिकारी की ओर बढ़ा दिया. उन्होंने चिट को खोला और फिर मेरी ओर बढ़े। बोले—अद्भुत निर्णय है, अल्पसंख्यक समुदाय ने भी आप ही को चुना है. जिलाधिकारी महोदय चकित थे, पर इसके पीछे जो संकेत था, उससे थोड़े आश्वस्त भी। चकित तो मैं भी था कि आखिर यह हुआ कैसे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर मेरी असली परीक्षा अब थी. जो दायित्व मुझे सौंपा गया था, उसके लिए मैं सक्षम हूँ, इसको लेकर सन्देह मेरे भीतर थे. मेरी सबसे बड़ी सीमा तो यही थी कि मैं उस तनाव के इतिहास और उसकी पृष्ठभूमि से बिल्कुल अपरिचित था. पर मेरे सौभाग्य से उस गाँव के प्रधान एक वृद्ध मुसलमान थे, जो पेशे से डॉक्टर थे और जिनकी शिक्षा-दीक्षा कश्मीर में हुई थी. मैं उनसे मिला और मेरे प्रति उस समुदाय ने जो विश्वास व्यक्त किया था, उसके लिए उसका शुक्रिया अदा किया. फिर रहा न गया तो पूछ ही लिया—‘‘आखिर आप लोगों ने यह कैसे समझा कि मैं आपके विश्वास का पात्र हूँ.’’ वह बोले—‘‘हम आपको नहीं जानते. पर हमारे लड़के जो आपके यहाँ पढ़ते हैं, उन्होंने आपके बारे में जो बता रखा था, यह फैसला उसी की बुनियाद पर किया गया.’’ मैं अवाक् था—और उस गुरुत्तर दायित्व के भार से दबा हुआ भी, जो अचानक मुझ पर डाल दिया गया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर मेरी परेशानी को शायद डॉक्टर ने जान लिया. जैसा कि बता चुका हूँ, वे उस गाँव के प्रधान भी थे. वे मुझे कुछ दूर ले गए और सारे संघर्ष की कहानी बताई, जो संक्षेप में यह थी कि बहुसंख्यक समुदाय ने कब्रिस्तान की लगभग आधी जमीन पर कब्जा कर लिया है और यह काम एक दिन में नहीं, कोई चालीस-पचास वर्षों से धीरे-धीरे होता आ रहा था. फिर उन्होंने निष्कर्ष दिया—‘‘ज्यादती उनकी है, गलती हमारी.’’ मैंने पूछा, ‘‘गलती कौन-सी?’’ बोले—‘‘हमने कभी एतराज नहीं किया—इसलिए पचास साल बाद एतराज करना बिल्कुल बेमानी है.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने पूछा, ‘‘फिर रास्ता क्या है?’’ वे कुछ देर सोचते रहे. फिर बोले—‘‘एक ही रास्ता है, जहाँ तक कब्जा हो चुका है, उसमें से कुछ गज जमीन हमें लौटा दी जाए, ताकि हमें लगे कि हमारी भावना का सम्मान किया गया. उसके बाद जो सीमा-रेखा तय हो, उस पर दीवार खड़ी कर दी जाए, जिसका खर्च दोनों पक्ष बर्दाश्त करें.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वृद्ध डॉक्टर का दिया हुआ फार्मूला मैंने सभा के सामने इस तरह रखा जैसे कि वह पंचायत का (यानी कि मेरा) फैसला हो. पर मेरा उसमें कुछ नहीं था. यह कहते हुए कि ‘दीवार खड़ी कर दी जाए’ मुझे अच्छी तरह याद है कि मैं थोड़ा अटका था—क्योंकि मुझे एक ओर बड़ी लेकिन अदृश्य दीवार याद आ गई, जो देश के नक्शे में खड़ी कर दी गई थी. पंचायत ने फैसला दिया और उठ गई. यह कोई 25-26 साल पहले की बात है. मैं नहीं जानता उस दीवार का क्या हुआ ? शायद वह बनी हो और शायद उसे कुछ साल बाद तोड़ दिया गया हो—पर यही क्या कम है कि उसके बाद वहाँ से फिर किसी फसाद की खबर नहीं आई. मुझे जीवन में कई छोटे-बड़े सम्मान मिले हैं—हालाँकि मैं दावे के साथ नहीं कह सकता कि पुरस्कार को ठीक-ठाक ‘सम्मान’ कहा जा सकता है या नहीं. पर कैसी विडम्बना है कि मुझे जीवन का सबसे बड़ा ‘पुरस्कार’ एक कब्रिस्तान में मिला था, जिसके बारे में सोचकर मेरा माथा कृतज्ञता से झुक जाता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;केदारनाथ सिंह, &lt;em&gt;कब्रिस्तान में पंचायत&lt;/em&gt; का एक अंश साभार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-3407990019728344590?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/3407990019728344590/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=3407990019728344590' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/3407990019728344590'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/3407990019728344590'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/08/blog-post_08.html' title='&lt;strong&gt;कब्रिस्तान में पंचायत &lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_5z_5iTul5kU/SJvT1raow8I/AAAAAAAAAb0/hQQKZQjrcgI/s72-c/asw.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-1271917710090163882</id><published>2008-08-07T12:16:00.003+05:30</published><updated>2008-08-07T17:07:56.063+05:30</updated><title type='text'>राजेश जोशी की कुछ पंक्तियाँ</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_5z_5iTul5kU/SJqcZ0tLSJI/AAAAAAAAAaU/gOVX8osKyhk/s1600-h/scan.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_5z_5iTul5kU/SJqcZ0tLSJI/AAAAAAAAAaU/gOVX8osKyhk/s200/scan.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5231665884603041938" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;सबसे बड़ा अपराध है इस समय&lt;br /&gt;निहत्थे और निरपराध होना&lt;br /&gt;जो अपराधी नहीं होंगे&lt;br /&gt;मारे जायेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब तक मैं एक अपील लिखता हूँ&lt;br /&gt;आग लग चुकी होती है सारे शहर में&lt;br /&gt;हिज्जे ठीक करता हूँ जब तक अपील के&lt;br /&gt;कर्फ्यू का ऐलान करती घूमने लगती है गाड़ी&lt;br /&gt;अपील छपने जाती है जबतक प्रेस में&lt;br /&gt;दुकानें जल चुकी होती हैं&lt;br /&gt;मारे जा चुके होते हैं लोग&lt;br /&gt;छपकर जबतक आती है अपील&lt;br /&gt;अपील की ज़रूरत ख़त्म हो चुकी होती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वर्ग में सबसे खतरनाक चीज़ है&lt;br /&gt;कल्पवृक्ष&lt;br /&gt;कहा जाता है कि मन उठते ही कोई भी इच्छा&lt;br /&gt;पूरी कर डालता है वह तत्काल&lt;br /&gt;लोगों का कहना है&lt;br /&gt;स्वर्ग में समृद्धि है बहुत&lt;br /&gt;मगर ऊब वहाँ भी किसी का पीछा नहीं छोड़ती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई बार जब बाज़ार चीज़ों से लद जाते हैं&lt;br /&gt;समाज में पैदा होने लगते हैं&lt;br /&gt;नए-नए उपद्रव&lt;br /&gt;चीज़ें एक दिन इतनी ताकतवर हो जाती हैं&lt;br /&gt;कि बनती जाती है इनकी स्वतंत्र सत्ता&lt;br /&gt;तब आदमी नहीं, चीज़ें तय करने लगती हैं&lt;br /&gt;आदमी का भाग्य.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह समय सूचनाओं का समय है&lt;br /&gt;सूचनाओं में तब्दील हो रहा है ज्ञान&lt;br /&gt;यहाँ तक कि&lt;br /&gt;सच भी अब सिर्फ़ एक सूचना है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बदल जायें, बदल जायें लोगों के चेहरे&lt;br /&gt;जब वे मेरी कविता में आयें&lt;br /&gt;हीरे की तरह चमकती हुई दिखें लोगों की&lt;br /&gt;बहुत छोटी-छोटी अच्छाइयाँ&lt;br /&gt;कि आत्महत्या करता आदमी पलटकर लौट पड़े&lt;br /&gt;जीवन की ओर चिल्लाता हुआ&lt;br /&gt;कुछ नहीं है जीवन से ज़्यादा सुन्दर&lt;br /&gt;जीवन से प्यारा जीवन की तरह अमर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबको चकमा देकर एक रात&lt;br /&gt;मैं किसी स्वप्न की पीठ पर बैठकर उड़ जाऊँगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मकान मालिक परेशान है&lt;br /&gt;और आंगन में टहल रहा है, देख रहा है&lt;br /&gt;पीपल और बड़ा हो गया है&lt;br /&gt;पूजा के लिए उसके आसपास&lt;br /&gt;इकट्ठे होने लगे हैं&lt;br /&gt;मोहल्ले के लोग&lt;br /&gt;मकान एक सार्वजनिक स्थल बनता जा रहा है&lt;br /&gt;पर वह किसी को भी&lt;br /&gt;रोक नहीं पा रहा है&lt;br /&gt;क्योंकि यह धर्म के विरूद्ध है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह टालेगा समकालीनों पर&lt;br /&gt;नहीं देगा अपनी राय&lt;br /&gt;विदेशी कवियों के बारे में बतियाएगा&lt;br /&gt;हरवक्त.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चीन की एक नीति कथा कहती है&lt;br /&gt;कि दाँत इसलिए गिर जाते हैं&lt;br /&gt;कि वे सख़्त होते हैं&lt;br /&gt;कि जीभ नरम होती है इसलिए&lt;br /&gt;बनी रहती है उम्र भर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुमने देखा है कभी&lt;br /&gt;बेटी के जाने के बाद का कोई घर?&lt;br /&gt;जैसे बिना चिड़ियों की सुबह&lt;br /&gt;जैसे बिना तारों का आकाश&lt;br /&gt;बेटी इतनी एक-सी होती है&lt;br /&gt;कि एक बेटी में दिखती है दूसरे को अपनी&lt;br /&gt;बेटी की शक्ल.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे-जैसे बढ़ती जाती है उम्र&lt;br /&gt;छोटी हो रही है उम्र&lt;br /&gt;देहरी पर खड़ा जाने आने को होता है कोई स्वप्न&lt;br /&gt;कि आधी रात अधबीच ही खुल जाती है नींद&lt;br /&gt;जो मेरी नींद में आने को ही निकला था वो स्वप्न&lt;br /&gt;न जाने कहाँ किन सड़कों पर भटक रहा होगा इस वक्त.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाँद ने जाने क्या कहा झरने से&lt;br /&gt;कि झरना हँसा रात भर&lt;br /&gt;रात भर सारी घाटी में गूँजी&lt;br /&gt;उसकी हँसी.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-1271917710090163882?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/1271917710090163882/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=1271917710090163882' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/1271917710090163882'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/1271917710090163882'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/08/blog-post_07.html' title='&lt;strong&gt;राजेश जोशी की कुछ पंक्तियाँ&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_5z_5iTul5kU/SJqcZ0tLSJI/AAAAAAAAAaU/gOVX8osKyhk/s72-c/scan.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-1388702326972769139</id><published>2008-08-06T14:40:00.006+05:30</published><updated>2008-08-06T18:51:51.361+05:30</updated><title type='text'>हरिराम-गुरू संवाद </title><content type='html'>&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;" src="http://1.bp.blogspot.com/_5z_5iTul5kU/SJluR0rmfdI/AAAAAAAAAZo/I1ZSQCdEeN0/s400/guru.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5231333694645894610" /&gt;&lt;br /&gt;(1) गुरु : तुम्हारा जीवन बर्बाद हो गया हरिराम! &lt;br /&gt;हरिराम : कैसे गुरुदेव? &lt;br /&gt;गुरु : तुम जीभी चलाना न सीख सके! &lt;br /&gt;हरिराम : पर मुझे तलवार चलाना आता है गुरुदेव! &lt;br /&gt;गुरु : तलवार से गरदन कटती है, पर जीभ से पूरा मनुष्य कट जाता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(2) गुरु : हरिराम, भीड़ में घुसकर तमाशा देखा करो. &lt;br /&gt;हरिराम : क्यों गुरुदेव? &lt;br /&gt;गुरु : इसलिए की भीड़ में घुसकर तमाशा न देख सके तो खुद तमाशा बन जाओगे! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(3) हरिराम : क्रांति क्या है गुरुदेव? &lt;br /&gt;गुरु : क्रांति एक चिड़िया है हरिराम! &lt;br /&gt;हरिराम : वह कहां रहती है गुरुदेव! &lt;br /&gt;गुरु : चतुर लोगों की ज़ुबान पर और सरल लोगों के दिलों में. &lt;br /&gt;हरिराम : चतुर लोग उसका क्या करते हैं? &lt;br /&gt;गुरु : चतुर लोग उसकी प्रशंसा करते हैं, उसके गीत गाते हैं और समय आने पर उसे चबा जाते हैं. &lt;br /&gt;हरिराम : और सरल लोग उसका क्या करते हैं? &lt;br /&gt;गुरु : वह उनके हाथ कभी नहीं आती. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(4) हरिराम : गुरुदेव, अगर एक हड्डी के लिए दो भूखे कुत्ते लड़ रहे हों तो उन्हें देखकर एक सरल आदमी क्या करेगा?&lt;br /&gt;गुरु : बीच-बचाव कराएगा. &lt;br /&gt;हरिराम : और चतुर आदमी क्या करेगा? &lt;br /&gt;गुरु : हड्डी लेकर भाग जाएगा. &lt;br /&gt;हरिराम : और राजनीतिज्ञ क्या करेगा? &lt;br /&gt;गुरु : दो भूखे कुत्ते वहां और छोड़ देगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(5) हरिराम : आदमी क्या है गुरुदेव? &lt;br /&gt;गुरु : यह एक प्रकार का जानवर है हरिराम! &lt;br /&gt;हरिराम : यह जानवर क्या करता है गुरुदेव? &lt;br /&gt;गुरु : यह विचारों का निर्माण करता है. &lt;br /&gt;हरिराम : फिर क्या करता है? &lt;br /&gt;गुरु : फिर विचारों के महल बनाता है. &lt;br /&gt;हरिराम : फिर क्या करता है? &lt;br /&gt;गुरु : फिर उनमें विचरता है.&lt;br /&gt;हरिराम : फिर क्या करता है? &lt;br /&gt;गुरु : फिर विचारों को खा जाता है. &lt;br /&gt;हरिराम : फिर क्या करता है?&lt;br /&gt;गुरु : फिर नए विचारों का निर्माण करता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(6) हरिराम : संसार क्या है गुरुदेव? &lt;br /&gt;गुरु : एक चारागाह है हरिराम! &lt;br /&gt;हरिराम : उसमें कौन चरता है? &lt;br /&gt;गुरु : वही चरता है जिसके आंखें होती हैं. &lt;br /&gt;हरिराम : आंखें किसके होती हैं गुरुदेव? &lt;br /&gt;गुरु : जिसके जीभ होती है. &lt;br /&gt;हरिराम : जीभ किसके होती है गुरुदेव? &lt;br /&gt;गुरु : जिसके पास बुद्धि होती है. &lt;br /&gt;हरिराम : बुद्धि किसके पास होती है गुरुदेव? &lt;br /&gt;गुरु : जिसके पास दुम होती है. &lt;br /&gt;हरिराम : दुम किसके पास होती है गुरुदेव? &lt;br /&gt;गुरु : जिसे दुम की इच्छा होती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(7) गुरु : हरिराम, बताओ सफलता का क्या रहस्य है? &lt;br /&gt;हरिराम : कड़ी मेहनत गुरुदेव! &lt;br /&gt;गुरु : नहीं. &lt;br /&gt;हरिराम : बुद्धिमानी? &lt;br /&gt;गुरु : नहीं. &lt;br /&gt;हरिराम : ईमानदारी? &lt;br /&gt;गुरु : नहीं.&lt;br /&gt;हरिराम : प्रेम? &lt;br /&gt;गुरु : नहीं.&lt;br /&gt;हरिराम : फिर सफलता का क्या रहस्य है गुरुदेव? &lt;br /&gt;गुरु : असफलता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(8) हरिराम : गुरुदेव, अगर एक सुंदर स्त्री के पीछे दो प्रेमी लड़ रहे हों तो स्त्री को क्या करना चाहिए? &lt;br /&gt;गुरु : तीसरे प्रेमी की तलाश.&lt;br /&gt;हरिराम : क्यों गुरुदेव? &lt;br /&gt;गुरु : इसलिए कि स्त्री के पीछे लड़ने वाले प्रेमी नहीं हो सकते. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(9) हरिराम : सबसे बड़ा दर्शन क्या है गुरुदेव? &lt;br /&gt;गुरु : हरिराम, सबसे बड़ा दर्शन चाटुकारिता है. &lt;br /&gt;हरिराम : कैसे गुरुदेव? &lt;br /&gt;गुरु : इस तरह कि चाटुकार बड़े-से-बड़े दर्शन को चाट जाता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(10) हरिराम : ईमानदारी क्या है गुरुदेव? &lt;br /&gt;गुरु : यह एक भयानक जानलेवा बीमारी का नाम है. &lt;br /&gt;हरिराम : क्या ये बीमारी हमारे देश में भी होती है? &lt;br /&gt;गुरु : हरिराम, बहुत पहले प्लेग, टी.बी. और हैजे की तरह इसका भी कोई इलाज न था. तब ये हमारे देश में फैलती थी और लाखों लोगों को चट कर जाती थी. &lt;br /&gt;हरिराम : और अब गुरुदेव? &lt;br /&gt;गुरु : अब उस दवा का पता चल गया है, जिसके कारण यह बीमारी रोकी जा सकती है. &lt;br /&gt;हरिराम : उस दवा का क्या नाम है गुरुदेव? &lt;br /&gt;गुरु : आज बच्चे-बच्चे की जुबान पर उस दवा का नाम है लालच. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;------------------------------असगर वज़ाहत, साभार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-1388702326972769139?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/1388702326972769139/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=1388702326972769139' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/1388702326972769139'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/1388702326972769139'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/08/blog-post_06.html' title='&lt;strong&gt;हरिराम-गुरू संवाद &lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_5z_5iTul5kU/SJluR0rmfdI/AAAAAAAAAZo/I1ZSQCdEeN0/s72-c/guru.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-1792873403921090859</id><published>2008-08-04T14:34:00.003+05:30</published><updated>2008-08-04T14:40:10.108+05:30</updated><title type='text'>गुलाबी चूड़ियाँ</title><content type='html'>&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;" src="http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SJbHU0qpjVI/AAAAAAAAAZQ/AIRxlKItIZ8/s200/babypink.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5230587177786248530" /&gt;&lt;br /&gt;प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सात साल की बच्ची का पिता तो है! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सामने गियर से उपर &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हुक से लटका रक्खी हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काँच की चार चूड़ियाँ गुलाबी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस की रफ़्तार के मुताबिक &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिलती रहती हैं… &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;झुककर मैंने पूछ लिया &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खा गया मानो झटका &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अधेड़ उम्र का मुच्छड़ रोबीला चेहरा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आहिस्ते से बोला: हाँ सा’ब &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लाख कहता हूँ नहीं मानती मुनिया &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टाँगे हुए है कई दिनों से &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी अमानत &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ अब्बा की नज़रों के सामने &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं भी सोचता हूँ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या बिगाड़ती हैं चूड़ियाँ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किस ज़ुर्म पे हटा दूँ इनको यहाँ से? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और ड्राइवर ने एक नज़र मुझे देखा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और मैंने एक नज़र उसे देखा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छलक रहा था दूधिया वात्सल्य बड़ी-बड़ी आँखों में &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तरलता हावी थी सीधे-साधे प्रश्न पर &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और अब वे निगाहें फिर से हो गईं सड़क की ओर &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और मैंने झुककर कहा - &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाँ भाई, मैं भी पिता हूँ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो तो बस यूँ ही पूछ लिया आपसे &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्ना किसे नहीं भाएँगी? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नन्हीं कलाइयों की गुलाबी चूड़ियाँ! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;--------------------------नागार्जुन&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-1792873403921090859?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/1792873403921090859/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=1792873403921090859' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/1792873403921090859'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/1792873403921090859'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/08/blog-post_04.html' title='&lt;strong&gt;गुलाबी चूड़ियाँ&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SJbHU0qpjVI/AAAAAAAAAZQ/AIRxlKItIZ8/s72-c/babypink.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-8618266320190227904</id><published>2008-08-01T20:11:00.000+05:30</published><updated>2008-08-01T20:13:08.224+05:30</updated><title type='text'>गुंग महल</title><content type='html'>&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;" src="http://bp3.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SJF6MmnKyfI/AAAAAAAAAY4/HF-tR2DmfW8/s200/10074731.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5229094999295707634" /&gt;&lt;br /&gt;खुली बहसों को दावत देना&lt;br /&gt;रवादार शाहंशाहों को भी परेशानी में डाल देता था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिजरी 987-88 के दौरान दीवान-ए-ख़ास में&lt;br /&gt;जब इस बात पर मुबाहिसा हुआ&lt;br /&gt;कि ख़ुदावंद की बनाई सबसे उम्दा शय अशरफ़-उल-मख़लूकात&lt;br /&gt;आदमज़ाद की वाहिद पैदाइशी मुक़द्दस ज़ुबान क्या थी&lt;br /&gt;तो काज़ी और उलमा इस पर यकराय थे&lt;br /&gt;कि अल्लाह की ज़ुबान अरबी है&lt;br /&gt;जिसमें उसने कुन् कहकर कायनात को वज़ूद बख़्शा&lt;br /&gt;और किताब-उल-मुबीन को नबी पर तारी किया&lt;br /&gt;उधर ब्राह्मण और दूसरे दरबारी सवर्ण&lt;br /&gt;पूरी भयभीत विनम्रता किन्तु क्षमायाचना-भरी दृढ़ता से कहते रहे&lt;br /&gt;कि वेद जो सृष्टि के प्राचीनतम ग्रन्थ हैं और ईश्वर-विरचित ही हैं&lt;br /&gt;चूँकि संस्कृत में हैं जिसे नाम ही देवभाषा का दिया गया है&lt;br /&gt;अतएव इस पुनरावृत्ति की आवश्यकता नहीं है&lt;br /&gt;कि परब्रह्म किस वाणी में बोलता है&lt;br /&gt;मंद स्वर में उन्होने पाणिनी का भी उल्लेख किया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनपढ़ होने के बावज़ूद&lt;br /&gt;आक़-ए-ज़ीशान जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर&lt;br /&gt;एक ऐसा बादशाह था जिसे चीज़ों के तज़्रिबे करने&lt;br /&gt;और उन्हे सही या बातिल साबित करने में बेदार दिलचस्पी थी&lt;br /&gt;चुना उसने बीस हामिला हिन्दू मुसलमान औरतों को&lt;br /&gt;जो कमोबेश एक ही वक्त में माँ बनने वाली थीं&lt;br /&gt;और ज़च्चगी के फौरन बाद भेज दिया फ़कत उनकी औलादों को&lt;br /&gt;उस महल में जिसे आगरे में दूर नीम-बियाबान में&lt;br /&gt;ख़ास इसी मक़सद से आनन-फ़ानन में बनवाया गया था&lt;br /&gt;जहाँ सिर्फ़ धायें थीं और आयाएँ और चंद दूसरे अहलकार औरत-मर्द&lt;br /&gt;जिन सबको हुक्म था कि उनके मुँह पर पट्टी रहेगी&lt;br /&gt;वे पालेंगे इन बच्चों को लेकिन उनसे और आपस में क़तई बोलेंगे नहीं&lt;br /&gt;वर्ना उनकी ज़ुबान क़लम कर ली जाएगी&lt;br /&gt;और उस महल में जो दूसरे कारिंदे आएँगे वे भी अपना मुँह बन्द रखेंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुआवज़े दिए गए थे इन बच्चों के वास्ते&lt;br /&gt;या इन्हें निज़ाम के काम से तलब कर लिया गया था&lt;br /&gt;यह पता नहीं चलता&lt;br /&gt;यही बताया गया है&lt;br /&gt;कि ज़िल्ले-इलाही जानना चाहते थे कि ये बच्चे&lt;br /&gt;जब बोलने लायक होंगे तो कौन सी ज़ुबान बोलते पाए जाएँगे&lt;br /&gt;अरबी संस्कृत या कोई और&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महीने बीत गए तीन-चार बरस भी &lt;br /&gt;कि आलमपनाह को फ़तहपुर से दूर उस महल की याद आई&lt;br /&gt;जिसकी बेज़ुबान ख़ामोशी की वजह से आसपास के काश्तकारों गूजरों ने&lt;br /&gt;उसे नाम दे दिया था गुंग महल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;10 अगस्त 1582 को गया बादशाह&lt;br /&gt;अपने बहस करने वाले दरबारियों के साथ उस इमारत तक&lt;br /&gt;जहाँ अब भी गूँगे बने हुए औरत मर्द पाल रहे थे बच्चों को&lt;br /&gt;इन बरसों में मुँह पर पट्टी बाँधे कारकून&lt;br /&gt;लाए थे रसद तनख़्वाहें और बाक़ी साज़-ओ-सामान&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चुप्पी तुड़वाई अकबर ने अड़तीस महीनों की और हुक्म दिया औरतों को&lt;br /&gt;जिनके गलों की नसें तक जड़ हो चुकी थीं&lt;br /&gt;और जो अब ख़ुद सिर्फ़ इशारों में बात कर सकती थीं&lt;br /&gt;कि बच्चों को हाज़िर किया जाए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आलीजाह मुल्लाओं पण्डितों आलिमों के सामने&lt;br /&gt;पेश किए गए बीस बच्चे&lt;br /&gt;जो बेहद सहमे हुए थे&lt;br /&gt;ऐसे और इतने इन्सान उन्होंने कभी देखे न थे&lt;br /&gt;लेकिन कहा महाबली ने मुस्कराकर उनसे अरबी में :&lt;br /&gt;बोलो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घबराकर पीछे हटने लगे बच्चे&lt;br /&gt;तब शहंशाह ने पुचकार कर एक से संस्कृत में बोलने को कहा&lt;br /&gt;इशारा पाकर सभी उलेमा और पुजारी&lt;br /&gt;हौसला बढ़ाने लगे बच्चों का अलग-अलग दोनों भाषाओं में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो गुंगियाने लगे पीछे हटते हुए&lt;br /&gt;कुछ कुत्तों सियारों भेड़ियों की तरह रोने लगे&lt;br /&gt;कुछ नर्राने लगे दूसरे जानवरों परिन्दों की मानिंद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बादशाह ने तब उनसे तुर्की दक़नी उर्दू ब्रज कौरवी सबमें कहा बोलने को&lt;br /&gt;पचास दरबारी और ज़ुबानों में इसरार करते रहे उनसे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब बच्चों की आँखें निकल आई थीं&lt;br /&gt;उनके काँपते बदन ऐंठ रहे थे वे मुँह से झाग निकालने लगे&lt;br /&gt;कुछ ने दहशत में पेशाब और पाख़ाना कर दिया&lt;br /&gt;फिर वे दीवार के सहारे दुबक गए एक कोने में पिल्लों की तरह&lt;br /&gt;और उनके मुँह से ऐसी आवाज़ें निकलने लगीं&lt;br /&gt;जो इंसानों ने कभी इंसान की औलाद से सुनी न थीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थर्रा गया अकबर इसके मायने समझकर&lt;br /&gt;कलेजा उसके मुँह में आ गया&lt;br /&gt;वह यह तो कहता था कि दुनिया में पैग़म्बर अनपढ़ हुए हैं&lt;br /&gt;चुनान्चे हर ख़ान्दान में एक लड़का उसी तरह उम्मी छोड़ा जा सकता है&lt;br /&gt;लेकिन बच्चों को इस तरह गूँगा देखने का माद्दा उसमें न था&lt;br /&gt;उसने चीख़ कर हुक्म दिया बोलना शुरू हो यहाँ बेख़ौफ और मनचाहा&lt;br /&gt;सौंप दो इन बच्चों को इनके वाल्दैन सरपरस्तों को&lt;br /&gt;फ़ौरन ख़ाली करो इस मनहूस महल को&lt;br /&gt;आइंदा यहाँ ऐसा कुछ न हो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह पता नहीं चलता है&lt;br /&gt;कि उन बच्चों के कोई अपने बचे भी थे या नहीं&lt;br /&gt;उन बीस माजूरों को किस किसने पहचाना और अपनाया&lt;br /&gt;उन्हे कभी कोई ज़ुबानें आई भी या नहीं&lt;br /&gt;वे अपने घर बसा पाए या नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चुन दिए गए गुंग महल के सभी रोशनदान खिड़की दरवाज़े&lt;br /&gt;आसपास के गाँवों में अफ़वाह फैल गई&lt;br /&gt;कि उसके भीतर से अब भी गूँगों की&lt;br /&gt;जानवरों जैसी आवाज़ें आती हैं&lt;br /&gt;धीरे धीरे ढह गया गुंग महल&lt;br /&gt;कुछ बरसों तक रहे खण्हर में सियार लोमड़ियाँ और चमगादड़ें&lt;br /&gt;आगरा के पास की इस शाही तज़िबागाह का तो क्या&lt;br /&gt;उस फ़ैज़ाबाद का भी कोई नामोनिशान नहीं मिलता&lt;br /&gt;जहाँ एक दिन पहले बादशाह सलामत ने मक़ाम फ़र्माया था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अकबरनामा में उस रात ज़िल्ले-इलाही की&lt;br /&gt;तहज्जुद की नमाज़ की यह दुआ भी दर्ज़ नहीं है&lt;br /&gt;कि कभार मैं तेरे नबी को लेकर हँस लेता था&lt;br /&gt;लेकिन मेरे अल्लाह मेरा यह आज़मूदा कुफ़्र भी माफ़ कर&lt;br /&gt;कि ख़ुदाई ज़ुबान जैसी कोई चीज़ नहीं है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह शायद इसलिए कि जब अकबर ने यह फ़रियाद की&lt;br /&gt;तो उसके बहुत कुछ जान चुके ज़ेहन का एक कोना&lt;br /&gt;एक नए ख़ौफ़ के मारे हमेशा के लिए गूँगा हो चुका था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;--------विष्णु खरे, &lt;em&gt;काल और अवधि के दरमियान, &lt;/em&gt; साभार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-8618266320190227904?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/8618266320190227904/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=8618266320190227904' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/8618266320190227904'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/8618266320190227904'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/08/blog-post.html' title='&lt;strong&gt;गुंग महल&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp3.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SJF6MmnKyfI/AAAAAAAAAY4/HF-tR2DmfW8/s72-c/10074731.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-1615969254734780263</id><published>2008-07-27T18:29:00.005+05:30</published><updated>2008-07-27T19:34:31.973+05:30</updated><title type='text'>करुण रसाल हृदय के स्वर</title><content type='html'>&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;" src="http://bp1.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SIx9JfRW90I/AAAAAAAAAYY/glnmdQ1rcrI/s200/yu.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5227690869436905282" /&gt;&lt;br /&gt;"ओ मेरे आदर्शवादी मन,&lt;br /&gt;ओ मेरे सिद्धान्तवादी मन,&lt;br /&gt;अब तक क्या किया?&lt;br /&gt;जीवन क्या जिया!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदरम्भरि बन अनात्म बन गये,&lt;br /&gt;भूतों की शादी में क़नात-से तन गये,&lt;br /&gt;किसी व्यभिचारी के बन गये बिस्तर,&lt;br /&gt;दुःखों के दाग़ों को तमग़ों-सा पहना,&lt;br /&gt;अपने ही ख़यालों में दिन-रात रहना,&lt;br /&gt;असंग बुद्धि व अकेले में सहना,&lt;br /&gt;ज़िन्दगी निष्क्रिय बन गयी तलघर,&lt;br /&gt;अब तक क्या किया,&lt;br /&gt;जीवन क्या जिया!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बताओ तो किस-किसके लिए तुम दौड़ गये,&lt;br /&gt;करुणा के दृश्यों से हाय! मुँह मोड़ गये,&lt;br /&gt;बन गये पत्थर,&lt;br /&gt;बहुत-बहुत ज़्यादा लिया,&lt;br /&gt;दिया बहुत-बहुत कम,&lt;br /&gt;मर गया देश, अरे जीवित रह गये तुम!!&lt;br /&gt;लो-हित-पिता को घर से निकाल दिया,&lt;br /&gt;जन-मन-करुणा-सी माँ को हंकाल दिया,&lt;br /&gt;स्वार्थों के टेरियार कुत्तों को पाल लिया,&lt;br /&gt;भावना के कर्तव्य--त्याग दिये,&lt;br /&gt;हृदय के मन्तव्य--मार डाले!&lt;br /&gt;बुद्धि का भाल ही फोड़ दिया,&lt;br /&gt;तर्कों के हाथ उखाड़ दिये,&lt;br /&gt;जम गये, जाम हुए, फँस गये,&lt;br /&gt;अपने ही कीचड़ में धँस गये!!&lt;br /&gt;विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में&lt;br /&gt;आदर्श खा गये!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तक क्या किया,&lt;br /&gt;जीवन क्या जिया,&lt;br /&gt;ज़्यादा लिया और दिया बहुत-बहुत कम&lt;br /&gt;मर गया देश, अरे जीवित रह गये तुम..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;___________ मुक्तिबोध, &lt;em&gt;अंधेरे में &lt;/em&gt; का महत्त्वपूर्ण अंश&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-1615969254734780263?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/1615969254734780263/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=1615969254734780263' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/1615969254734780263'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/1615969254734780263'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/07/blog-post_27.html' title='&lt;strong&gt;करुण रसाल हृदय के स्वर&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp1.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SIx9JfRW90I/AAAAAAAAAYY/glnmdQ1rcrI/s72-c/yu.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-6987714671220540722</id><published>2008-07-24T19:26:00.000+05:30</published><updated>2008-07-24T20:12:39.454+05:30</updated><title type='text'>उसने कहा था</title><content type='html'>&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:right;" src="http://bp2.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SIiUIJmYd4I/AAAAAAAAAXw/GlEW_dL7U-A/s400/youngest-civil-war-soldier.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5226590235300231042" /&gt;&lt;br /&gt;बड़े-बडे़ शहरों के इक्के-गाडी वालों की जबान के कोड़ों से जिनकी पीठ छिल गई है और कान पक गए हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बम्बू कार्ट वालों की बोली का मरहम लगावे. जबकि बड़े शहरों की चौड़ी सड़को पर घोड़े की पीठ को चाबुक से धुनते हुए इक्के वाले कभी घोड़े की नानी से अपना निकट यौन-संबंध स्थिर करते हैं, कभी उसके गुप्त गुह्य अंगो से डाक्टर को लजाने वाला परिचय दिखाते हैं, कभी राह चलते पैदलों की आँखो के न होने पर तरस खाते हैं, कभी उनके पैरो की अंगुलियों के पोरों की चींथकर अपने ही को सताया हुआ बताते हैं और संसार भर की ग्लानि और क्षोभ के अवतार बने नाक की सीध चले जाते हैं, तब अमृतसर में उनकी बिरादरी वाले तंग चक्करदार गलियों मे हर एक लडढी वाले के लिए ठहर कर सब्र का समुद्र उमड़ा कर-- बचो खालसाजी, हटो भाईज', ठहरना भाई, आने दो लालाजी, हटो बाछा कहते हुए सफेद फेटों , खच्चरों और बतको, गन्ने और खोमचे और भारे वालों के जंगल से राह खेते हैं. क्या मजाल है कि जी और साहब बिना सुने किसी को हटना पड़े. यह बात नही कि उनकी जीभ चलती ही नही, चलती है पर मीठी छुरी की तरह महीन मार करती हुई. यदि कोई बुढ़िया बार-बार चिटौनी देने पर भी लीक से नही हटती तो उनकी वचनावली के ये नमूने हैं-- हट जा जीणे जोगिए, हट जा करमाँ वालिए, हट जा, पुत्तां प्यारिए. बच जा लम्बी वालिए. समष्टि मे इसका अर्थ हैं कि तू जीने योग्य है, तू भाग्योंवाली है, पुत्रो को प्यारी है, लम्बी उमर तेरे सामने है, तू क्यों मेरे पहियो के नीचे आना चाहती है? बच जा। ऐसे बम्बू कार्ट वालों के बीच मे होकर एक लड़का और एक लड़की चौक की दुकान पर आ मिले. उसके बालों और इसके ढीले सुथने से जान पडता था कि दोनो सिख हैं. वह अपने मामा के केश धोने के लिए दही लेने आया था और यह रसोई के लिए बड़ियाँ. दुकानदार एक परदेशी से गुथ रहा था, जो सेर भर गीले पापड़ो की गड्डी गिने बिना हटता न था. &lt;br /&gt;-- तेरा घर कहाँ है? &lt;br /&gt;-- मगरे मे. ...और तेरा? &lt;br /&gt;-- माँझे मे, यहाँ कहाँ रहती है? &lt;br /&gt;-- अतरसिंह की बैठक में, वह मेरे मामा होते हैं. &lt;br /&gt;-- मैं भी मामा के आया हूँ, उनका घर गुरु बाजार मे है. &lt;br /&gt;इतने मे दुकानदार निबटा और इनका सौदा देने लगा. सौदा लेकर दोनो साथ-साथ चले. कुछ दूर जाकर लड़के ने मुसकरा कर पूछा-- तेरी कुड़माई हो गई? इस पर लड़की कुछ आँखे चढ़ाकर 'धत्' कहकर दौड़ गई और लड़का मुँह देखता रह गया. &lt;br /&gt;दूसरे तीसरे दिन सब्जी वाले के यहाँ, या दूध वाले के यहाँ अकस्मात् दोनो मिल जाते. महीना भर यही हाल रहा. दो-तीन बार लड़के ने फिर पूछा-- तेरे कुड़माई हो गई? और उत्तर में वही 'धत्' मिला. एक दिन जब फिर लड़के ने वैसी ही हँसी मे चिढ़ाने के लिए पूछा तो लड़की लड़के की संभावना के विरुद्ध बोली-- हाँ, हो गई. &lt;br /&gt;-- कब? &lt;br /&gt;-- कल, देखते नही यह रेशम से कढा हुआ सालू. ... लड़की भाग गई. &lt;br /&gt;लड़के ने घर की सीध ली. रास्ते मे एक लड़के को मोरी मे ढकेल दिया, एक छाबड़ी वाले की दिन भर की कमाई खोई, एक कुत्ते को पत्थर मारा और गोभी वाले ठेले मे दूध उंडेल दिया. सामने नहा कर आती हुई किसी वैष्णवी से टकरा कर अन्धे की उपाधि पाई. तब कहीं घर पहुँचा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-- होश मे आओ. कयामत आयी है और लपटन साहब की वर्दी पहन कर आयी है. &lt;br /&gt;-- क्या? -- लपचन साहब या तो मारे गये हैं या कैद हो गये हैं. उनकी वर्दी पहन कर कोई जर्मन आया है. सूबेदार ने इसका मुँह नही देखा. मैने देखा है, और बातें की हैं. सौहरा साफ़ उर्दू बोलता है, पर किताबी उर्दू. और मुझे पीने को सिगरेट दिया है. &lt;br /&gt;-- तो अब? -- अब मारे गए. धोखा है. सूबेदार कीचड़ मे चक्कर काटते फिरेंगे और यहाँ खाई पर धावा होगा उधर उन पर खुले मे धावा होगा. उठो, एक काम करो. पलटन मे पैरो के निशान देखते-देखते दौड़ जाओ. अभी बहुत दूर न गये होंगे. सूबेदार से कहो कि एकदम लौट आवें. खंदक की बात झूठ है. चले जाओ, खंदक के पीछे से ही निकल जाओ. पत्ता तक न खुड़के. देर मत करो.' &lt;br /&gt;-- हुकुम तो यह है कि यहीं... &lt;br /&gt;-- ऐसी तैसी हुकुम की! मेरा हुकुम है... जमादार लहनासिंह जो इस वक्त यहाँ सबसे बड़ा अफ़सर है, उसका हुकुम है. मैं लपटन साहब की ख़बर लेता हूँ. &lt;br /&gt;-- पर यहाँ तो तुम आठ ही हो. &lt;br /&gt;-- आठ नही, दस लाख। एक एक अकालिया सिख सवा लाख के बराबर होता है. चले जाओ. &lt;br /&gt;लौटकर खाई के मुहाने पर लहनासिंह दीवार से चिपक गया. उसने देखा कि लपटन साहब ने जेब से बेल के बराबर तीन गोले निकाले. तीनों को जगह-जगह खंदक की दीवारों मे घुसेड़ दिया और तीनों मे एक तार सा बाँध दिया. तार के आगे सूत की गुत्थी थी, जिसे सिगड़ी के पास रखा. बाहर की तरफ जाकर एक दियासलाई जलाकर गुत्थी रखने... बिजली की तरह दोनों हाथों से उलटी बन्दूक को उठाकर लहनासिंह ने साहब की कुहनी पर तानकर दे मारा. धमाके के साथ साहब के हाथ से दियासलाई गिर पड़ी. लहनासिंह ने एक कुन्दा साहब की गर्दन पर मारा और साहब 'आँख! मीन गाट्ट' कहते हुए चित हो गये. लहनासिंह ने तीनो गोले बीनकर खंदक के बाहर फेंके और साहब को घसीटकर सिगड़ी के पास लिटाया. जेबों की तलाशी ली. तीन-चार लिफ़ाफ़े और एक डायरी निकाल कर उन्हे अपनी जेब के हवाले किया. &lt;br /&gt;साहब की मूर्च्छा हटी. लहना सिह हँसकर बोला-- क्यो, लपटन साहब, मिजाज कैसा है? आज मैंने बहुत बातें सीखीं. यह सीखा कि सिख सिगरेट पीते हैं. यह सीखा कि जगाधरी के जिले मे नीलगायें होती हैं और उनके दो फुट चार इंच के सींग होते हैं. यह सीखा कि मुसलमान खानसामा मूर्तियो पर जल चढाते हैं और लपटन साहब खोते पर चढते हैं. पर यह तो कहो, ऐसी साफ़ उर्दू कहाँ से सीख आये? हमारे लपटन साहब तो बिना 'डैम' के पाँच लफ़्ज भी नही बोला करते थे. &lt;br /&gt;लहनासिंह ने पतलून की जेबों की तलाशी नही ली थी. साहब ने मानो जाड़े से बचने के लिए दोनो हाथ जेबो मे डाले. लहनासिंह कहता गया-- चालाक तो बड़े हो, पर माँझे का लहना इतने बरस लपटन साहब के साथ रहा है. उसे चकमा देने के लिए चार आँखे चाहिएँ. तीन महीने हुए एक तुर्की मौलवी मेरे गाँव मे आया था. औरतो को बच्चे होने का ताबीज बाँटता था और बच्चो को दवाई देता था. चौधरी के बड़ के नीचे मंजा बिछाकर हुक्का पीता रहता था और कहता था कि जर्मनी वाले बड़े पंडित हैं. वेद पढ़-पढ़ कर उसमे से विमान चलाने की विद्या जान गये हैं. गौ को नही मारते. हिन्दुस्तान मे आ जायेंगे तो गोहत्या बन्द कर देगे. मंडी के बनियो को बहकाता था कि डाकखाने से रुपये निकाल लो, सरकार का राज्य जाने वाला है. डाक बाबू पोल्हू राम भी डर गया था. मैने मुल्ला की दाढी मूंड़ दी थी और गाँव से बाहर निकालकर कहा था कि जो मेरे गाँव मे अब पैर रखा तो -- साहब की जेब मे से पिस्तौल चला और लहना की जाँघ मे गोली लगी. इधर लहना की हेनरी मार्टिन के दो फ़ायरो ने साहब की कपाल-क्रिया कर दी. &lt;br /&gt;धडाका सुनकर सब दौड आये. &lt;br /&gt;बोधा चिल्लाया-- क्या है? &lt;br /&gt;लहनासिंह मे उसे तो यह कह कर सुला दिया कि 'एक हडका कुत्ता आया था, मार दिया' और औरो से सब हाल कह दिया. बंदूके लेकर सब तैयार हो गये. लहना ने साफ़ा फाड़ कर घाव के दोनो तरफ पट्टियाँ कसकर बांधी. घाव माँस मे ही था. पट्टियो के कसने से लूह बन्द हो गया. &lt;br /&gt;इतने मे सत्तर जर्मन चिल्लाकर खाई मे घुस पड़े. सिखो की बंदूको की बाढ ने पहले धावे को रोका. दूसरे को रोका. पर यहाँ थे आठ (लहना सिंह तक-तक कर मार रहा था. वह खड़ा था औऱ लेटे हुए थे) और वे सत्तर. अपने मुर्दा भाईयों के शरीर पर चढ़कर जर्मन आगे घुसे आते थे. थोड़े मिनटो में वे... अचानक आवाज आयी --'वाह गुरुजी की फतह! वाहगुरु दी का खालसा!' और धड़ाधड़ बंदूको के फायर जर्मनो की पीठ पर पड़ने लगे. ऐन मौके पर जर्मन दो चक्कों के पाटों के बीच मे आ गए. पीछे से सूबेदार हजारासिंह के जवान आग बरसाते थे और सामने से लहनासिंह के साथियों के संगीन चल रहे थे. पास आने पर पीछे वालो ने भी संगीन पिरोना शुरु कर दिया. &lt;br /&gt;एक किलकारी और-- 'अकाल सिक्खाँ दी फौज आयी. वाह गुरु जी दी फतह! वाह गुरु जी दी खालसा! सत्त सिरी अकाल पुरुष! ' और लड़ाई ख़तम हो गई. तिरसठ जर्मन या तो खेत रहे थे या कराह रहे थे. सिक्खो में पन्द्रह के प्राण गए. सूबेदार के दाहिने कन्धे मे से गोली आर पार निकल गयी. लहनासिंह की पसली मे एक गोली लगी. उसने घाव को खंदक की गीली मिट्टी से पूर लिया. और बाकी का साफ़ा कसकर कमर बन्द की तरह लपेट लिया. किसी को ख़बर नही हुई कि लहना के दूसरा घाव -- भारी घाव -- लगा है. लड़ाई के समय चांद निकल आया था. ऐसा चांद जिसके प्रकाश से संस्कृत कवियो का दिया हुआ 'क्षयी' नाम सार्थक होता है. और हवा ऐसी चल रही थी जैसी कि बाणभट्ट की भाषा मे 'दंतवीणो पदेशाचार्य' कहलाती. वजीरासिंह कह रहा था कि कैसे मन-मनभर फ्रांस की भूमि मेरे बूटो से चिपक रही थी जब मैं दौडा दौडा सूबेदार के पीछे गया था. सूबेदार लहनासिह से सारा हाल सुन और कागजात पाकर उसकी तुरन्त बुद्धि को सराह रहे थे और कर रहे थे कि तू न होता तो आज सब मारे जाते. इस लड़ाई की आवाज़ तीन मील दाहिनी ओर की खाई वालों ने सुन ली थी. उन्होने पीछे टेलिफ़ोन कर दिया था. वहाँ से झटपट दो डाक्टर और दो बीमार ढोने की गाड़ियाँ चली, जो कोई डेढ घंटे के अन्दर अन्दर आ पहुँची. फील्ड अस्पताल नज़दीक था. सुबह होते-होते वहाँ पहुँच जाएंगे, इसलिए मामूली पट्टी बांधकर एक गाडी मे घायल लिटाये गए और दूसरी मे लाशें रखी गईं. सूबेदार ने लहनासिह की जाँघ मे पट्टी बंधवानी चाही. बोधसिंह ज्वर से बर्रा रहा था. पर उसने यह कह कर टाल दिया कि थोड़ा घाव है, सवेरे देखा जायेगा. वह गाडी मे लिटाया गया. लहना को छोडकर सूबेदार जाते नही थे. यह देख लहना ने कहा-- तुम्हे बोधा की कसम हैं और सूबेदारनी जी की सौगन्द है तो इस गाड़ी मे न चले जाओ. &lt;br /&gt;-- और तुम? &lt;br /&gt;-- मेरे लिए वहाँ पहुँचकर गाड़ी भेज देना. और जर्मन मुर्दो के लिए भी तो गाड़ियाँ आती होगीं. मेरा हाल बुरा नही हैं. देखते नही मैं खड़ा हूँ? वजीरासिंह मेरे पास है ही. &lt;br /&gt;-- अच्छा, पर... &lt;br /&gt;-- बोधा गाडी पर लेट गया. भला, आप भी चढ़ आओ. सुनिए तो, सूबेदारनी होराँ को चिट्ठी लिखो तो मेरा मत्था टेकना लिख देना. &lt;br /&gt;-- और जब घर जाओ तो कह देना कि मुझ से जो उन्होने कहा था, वह मैंने कर दिया. &lt;br /&gt;गाडियाँ चल पड़ी थीं. सूबेदार ने चढ़ते-चढ़ते लहना का हाथ पकड़कर कहा-- तूने मेरे और बोधा के प्राण बचाये हैं. लिखना कैसा? साथ ही घर चलेंगे. अपनी सूबेदारनी से तू ही कह देना. उसने क्या कहा था? &lt;br /&gt;-- अब आप गाड़ी पर चढ़ जाओ. मैने जो कहा, वह लिख देना और कह भी देना. &lt;br /&gt;गाड़ी के जाते ही लहना लेट गया. --वजीरा, पानी पिला दे और मेरा कमरबन्द खोल दे. तर हो रहा है. &lt;br /&gt;मृत्यु के कुछ समय पहले स्मृति बहुत साफ़ हो जाती है. जन्मभर की घटनाएँ एक-एक करके सामने आती हैं. सारे दृश्यो के रंग साफ़ होते है, समय की धुन्ध बिल्कुल उन पर से हट जाती है. लहनासिंह बारह वर्ष का है. अमृतसर मे मामा के यहाँ आया हुआ है. दहीवाले के यहाँ, सब्जीवाले के यहाँ, हर कहीं उसे आठ साल की लड़की मिल जाती है. जब वह पूछता है कि तेरी कुड़माई हो गई? तब वह 'धत्' कहकर भाग जाती है. एक दिन उसने वैसे ही पूछा तो उसने कहा--हाँ, कल हो गयी, देखते नही, यह रेशम के फूलों वाला सालू? यह सुनते ही लहनासिंह को दुःख हुआ. क्रोध हुआ. क्यों हुआ? &lt;br /&gt;-- वजीरासिंह पानी पिला दे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पच्चीस वर्ष बीत गये. अब लहनासिंह नं. 77 राइफ़ल्स मे जमादार हो गया है. उस आठ वर्ष की कन्या का ध्यान ही न रहा, न मालूम वह कभी मिली थी या नही. सात दिन की छुट्टी लेकर ज़मीन के मुकदमे की पैरवी करने वह घर गया. वहाँ रेजीमेंट के अफ़सर की चिट्ठी मिली. फौरन चले आओ. साथ ही सूबेदार हजारासिंह की चिट्ठी मिली कि मैं और बोधासिंह भी लाम पर जाते हैं, लौटते हुए हमारे घर होते आना. साथ चलेंगे. &lt;br /&gt;सूबेदार का घर रास्ते में पड़ता था और सूबेदार उसे बहुत चाहता था. लहनासिंह सूबेदार के यहाँ पहुँचा. जब चलने लगे तब सूबेदार बेडे़ मे निकल कर आया. बोला-- लहनासिंह, सूबेदारनी तुमको जानती है. बुलाती है. जा मिल आ. &lt;br /&gt;लहनासिंह भीतर पहुँचा. सूबेदारनी मुझे जानती है? कब से? रेजीमेंट के क्वार्टरों मे तो कभी सूबेदार के घर के लोग रहे नहीं. दरवाज़े पर जाकर 'मत्था टेकना' कहा. असीस सुनी. लहनासिंह चुप. &lt;br /&gt;-- मुझे पहचाना? &lt;br /&gt;-- नहीं. &lt;br /&gt;-- 'तेरी कुड़माई हो गयी? ... धत्... कल हो गयी... देखते नही, रेशमी बूटों वाला सालू... अमृतसर में... &lt;br /&gt;भावों की टकराहट से मूर्च्छा खुली. करवट बदली. पसली का घाव बह निकला. &lt;br /&gt;-- वजीरासिंह, पानी पिला -- उसने कहा था. &lt;br /&gt;स्वप्न चल रहा हैं. सूबेदारनी कह रही है-- मैने तेरे को आते ही पहचान लिया. एक काम कहती हूँ. मेरे तो भाग फूट गए. सरकार ने बहादुरी का खिताब दिया है, लायलपुर मे ज़मीन दी है, आज नमकहलाली का मौक़ा आया है. पर सरकार ने हम तीमियो की एक घघरिया पलटन क्यो न बना दी जो मै भी सूबेदारजी के साथ चली जाती? एक बेटा है. फौज मे भरती हुए उसे एक ही वर्ष हुआ. उसके पीछे चार और हुए, पर एक भी नही जिया. सूबेदारनी रोने लगी-- अब दोनों जाते हैं. मेरे भाग! तुम्हें याद है, एक दिन टाँगे वाले का घोड़ा दहीवाले की दुकान के पास बिगड़ गया था. तुमने उस दिन मेरे प्राण बचाये थे. आप घोड़ो की लातो पर चले गये थे. और मुझे उठाकर दुकान के तख्त के पास खड़ा कर दिया था. ऐसे ही इन दोनों को बचाना. यह मेरी भिक्षा है. तुम्हारे आगे मैं आँचल पसारती हूँ. &lt;br /&gt;रोती-रोती सूबेदारनी ओबरी मे चली गयी. लहनासिंह भी आँसू पोछता हुआ बाहर आया. &lt;br /&gt;-- वजीरासिंह, पानी पिला -- उसने कहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लहना का सिर अपनी गोद मे रखे वजीरासिंह बैठा है. जब मांगता है, तब पानी पिला देता है. आध घंटे तक लहना फिर चुप रहा, फिर बोला-- कौन? कीरतसिंह? &lt;br /&gt;वजीरा ने कुछ समझकर कहा-- हाँ. &lt;br /&gt;-- भइया, मुझे और ऊँचा कर ले. अपने पट्ट पर मेरा सिर रख ले. &lt;br /&gt;वजीरा ने वैसा ही किया. &lt;br /&gt;-- हाँ, अब ठीक है. पानी पिला दे. बस। अब के हाड़ मे यह आम खूब फलेगा. चाचा-भतीजा दोनों यहीँ बैठकर आम खाना. जितना बड़ा तेरा भतीजा है उतना ही बड़ा यह आम, जिस महीने उसका जन्म हुआ था उसी महीने मैने इसे लगाया था. &lt;br /&gt;वजीरासिंह के आँसू टप-टप टपक रहे थे. कुछ दिन पीछे लोगों ने अख़बारो में पढ़ा--- &lt;br /&gt;फ्रांस और बेलजियम-- 67वीं सूची-- मैदान मे घावों से मरा -- न. 77 सिख राइफल्स जमादार लहनासिंह. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;______________चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी'  द्वारा रचित अद्वितीय कहानी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-6987714671220540722?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/6987714671220540722/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=6987714671220540722' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/6987714671220540722'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/6987714671220540722'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/07/blog-post_24.html' title='&lt;strong&gt;उसने कहा था&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp2.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SIiUIJmYd4I/AAAAAAAAAXw/GlEW_dL7U-A/s72-c/youngest-civil-war-soldier.jpg' height='72' 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/&gt;कोई न छायादार &lt;br /&gt;पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार; &lt;br /&gt;श्याम तन, भर बँधा यौवन, &lt;br /&gt;नत नयन प्रिय,कर्म-रत मन, &lt;br /&gt;गुरू हथौड़ा हाथ, &lt;br /&gt;करती बार-बार प्रहार: &lt;br /&gt;सामने तरू-मालिका अट्टालिका, प्राकार. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चढ़ रही थी धूप; &lt;br /&gt;गर्मियों के दिन &lt;br /&gt;दिवा का तमतमाता रुप; &lt;br /&gt;उठी झुलसाती हुई लू, &lt;br /&gt;रूई ज्यों जलती हुई भू, &lt;br /&gt;गर्द चिनगी छा गई, &lt;br /&gt;प्राय: हुई दुपहर: &lt;br /&gt;वह तोड़ती पत्थर. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखते देखा मुझे तो एक बार &lt;br /&gt;उस भवन की ओर देखा, छिन्नतार; &lt;br /&gt;देखकर कोई नहीं, &lt;br /&gt;देखा मुझे उस दृष्टि से &lt;br /&gt;जो मार खा रोई नहीं, &lt;br /&gt;सजा सहज सितार, &lt;br /&gt;सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार &lt;br /&gt;एक क्षण के बाद वह कॉंपी सुघर, &lt;br /&gt;ढुलक माथे से गिरे सीकर, &lt;br /&gt;लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा- &lt;br /&gt;'मैं तोड़ती पत्थर'. &lt;br /&gt;______________________सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-9098154847494685725?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/9098154847494685725/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=9098154847494685725' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/9098154847494685725'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/9098154847494685725'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/07/blog-post_22.html' title='&lt;strong&gt;देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp2.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SD5dgv3g5OI/AAAAAAAAAHk/WWjXhBebdr4/s72-c/-Sktnirala.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-8025618001533188459</id><published>2008-07-19T13:44:00.006+05:30</published><updated>2008-07-19T15:25:27.102+05:30</updated><title type='text'>एक गर्भवती औरत के प्रति दो कविताएँ</title><content type='html'>&lt;img style="float:center; margin:0 0 10px 10px;" src="http://bp1.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SIG2artAxLI/AAAAAAAAAWY/ZzdhDHllOP4/s320/609330~Silhouette-of-a-Pregnant-Woman-on-the-Beach-Posters.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5224657612250858674" /&gt;&lt;br /&gt;1&lt;br /&gt;यह तुम्हारा उदर ब्रह्माण्ड हो गया है.&lt;br /&gt;इसमें क्या है? एक बन रहा शिशु-भर?&lt;br /&gt;झिल्ली में लिपटी मांस पहनती चेतना. बस?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितनी फैलती जा रही है परिधि तुम्हारे उदर की &lt;br /&gt;तुम क्या जानो&lt;br /&gt;कि अंतरिक्ष तक चली गयी है यह विरूप गोलाई और ये&lt;br /&gt;पेड़-पौधे, मकान, सड़कें, मैं, यह पोल, वह कुत्ता, उछलता वह मेढक&lt;br /&gt;रँभाती गाय, बाड़ कतरता माली, क्षितिज पर का सूरज&lt;br /&gt;सब उसके अंदर चले गये हैं&lt;br /&gt;और तुम भी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निरन्तर निर्माण में रत है तुम्हारा उदर&lt;br /&gt;तुम्हारा रक्त, तुम्हारी मज्जा, तुम्हारा जीवन-रस&lt;br /&gt;सब मिल कर जो रच रहे हैं&lt;br /&gt;वह क्या है? एक&lt;br /&gt;कनखजूरा&lt;br /&gt;जो अकस्मात किसी बूट के नीचे आ जायेगा.&lt;br /&gt;या किसी आदमजाद को डँसने के प्रयास के अपराध में&lt;br /&gt;थुरकुच कर&lt;br /&gt;सफ़ाई के खयाल से सड़क पर से किनारे हटा दिया जायेगा&lt;br /&gt;-वही एक&lt;br /&gt;कनखजूरा? घेर कर जिसके लिथड़े शव को&lt;br /&gt;खड़े होंगे गाँव के सारे सम्भ्रान्त लोग ईश्वर को धन्यवाद देते&lt;br /&gt;और यदि कोई विद्रोही कवि हुआ वहाँ ईश्वर और सफ़ाई&lt;br /&gt;और स्वयं&lt;br /&gt;पर थूक कर लिख देगा जिस पर एक कविता और&lt;br /&gt;आकर ओढ़ चादर सो जायेगा. वही&lt;br /&gt;एक कनखजूरा रच रही हो तुम?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी अबोध की तरह ताकती हो मेरा प्रश्न. तुम्हें&lt;br /&gt;पता नहीं अपने फूले हुए पेट में सहेजते हुए जिसको &lt;br /&gt;पिला रही हो अपना रक्त, श्रम, चौकसी&lt;br /&gt;वह क्या है? मुझे है &lt;br /&gt;पता&lt;br /&gt;यह न हो वही कनखजूरा&lt;br /&gt;पर हो जायेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-------------ज्ञानेन्द्रपति, &lt;em&gt;आँख हाथ बनते हुए&lt;/em&gt; में संकलित, साभार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-8025618001533188459?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/8025618001533188459/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=8025618001533188459' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/8025618001533188459'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/8025618001533188459'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/07/blog-post_19.html' title='&lt;strong&gt;एक गर्भवती औरत के प्रति दो कविताएँ&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp1.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SIG2artAxLI/AAAAAAAAAWY/ZzdhDHllOP4/s72-c/609330~Silhouette-of-a-Pregnant-Woman-on-the-Beach-Posters.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-616211220801751292</id><published>2008-07-18T20:40:00.000+05:30</published><updated>2008-07-18T20:41:44.776+05:30</updated><title type='text'>राम कथा के स्त्रीवादी विमर्श का एक रूप</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;खट्टर काका गरी काटते हुए बोले-&lt;br /&gt;मान लो, यदि जनता एक स्वर में यही कहती कि सीता को राज्य से निर्वासित कर दीजिए, तथापि राम का अपना कर्तव्य क्या था? जब वह जानते थे कि महारानी निर्दोष है, अग्निपरीक्षा में उत्तीर्ण हो चुकी है, तब संसार के कहने से ही क्या? वह अपने न्याय पर अटल रहते. यदि प्रजा विद्रोह की आशंका होती, तो पुन: भरत को गद्दी पर बैठाकर दोनों जने जंगल की राह पकड़ते, तब आदर्शपालन कहलाता. परन्तु राजा राम ने केवल राज्य की समझा, प्रेम नहीं. महारानी सीता तो अपने पत्नी धर्म के आगे संसार का साम्राज्य ठुकरा देतीं, लेकिन राम राजा अपने पतिधर्म के आगे अयोध्या की गद्दी नहीं छोड़ सके. सती शिरोमणि सीता के लिए वह उतना भी त्याग नहीं कर सके, जितना विलायत के एक बादशाह अष्टम एडवर्ड ने अपनी एक चहेती सिंप्सन के लिए किया!&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;______________________हरिमोहन झा, &lt;em&gt;खट्टर काका&lt;/em&gt; का एक अंश&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-616211220801751292?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/616211220801751292/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=616211220801751292' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/616211220801751292'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/616211220801751292'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/07/blog-post_18.html' title='&lt;strong&gt;राम कथा के स्त्रीवादी विमर्श का एक रूप&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-3236036403130567039</id><published>2008-07-16T17:01:00.007+05:30</published><updated>2008-07-16T17:18:28.432+05:30</updated><title type='text'>पहाड़</title><content type='html'>&lt;DIV ALIGN=CENTER&gt;&lt;img style="float:center; margin:0 0 10px 10px;" src="http://bp2.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SH3eOlCdeSI/AAAAAAAAAVo/OFsHeQVtm-4/s400/Mount+Otemanu.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5223575484861610274" /&gt;&lt;br /&gt;पेड़&lt;br /&gt;बनकर बीज&lt;br /&gt;पकड़कर हवा&lt;br /&gt;पहुँच जाते हैं&lt;br /&gt;पहाड़ पर धीरे-धीरे&lt;br /&gt;होते हैं प्रकट&lt;br /&gt;अपने पत्तों और टहनियों के साथ&lt;br /&gt;पहाड़ पर&lt;br /&gt;पहाड़ भी जानते हैं&lt;br /&gt;बीज&lt;br /&gt;बन जाएगा पेड़&lt;br /&gt;धीरे-धीरे&lt;br /&gt;इसलिए&lt;br /&gt;वे कभी बनते नहीं हैं बाधा&lt;br /&gt;बीज के विकास में&lt;br /&gt;क्योंकि उन्हें भी होता है&lt;br /&gt;इंतजार पेड़ का&lt;br /&gt;अपनी सूनी छाती पर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;----------------------राजकुमार केसवानी, &lt;em&gt;पहल&lt;/em&gt;  से साभार&lt;/DIV&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-3236036403130567039?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/3236036403130567039/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=3236036403130567039' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/3236036403130567039'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/3236036403130567039'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/07/blog-post_16.html' title='&lt;strong&gt;पहाड़&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp2.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SH3eOlCdeSI/AAAAAAAAAVo/OFsHeQVtm-4/s72-c/Mount+Otemanu.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-5434684173211270133</id><published>2008-07-14T06:15:00.004+05:30</published><updated>2008-07-14T06:43:43.002+05:30</updated><title type='text'>मोटेराम जी शास्त्री</title><content type='html'>&lt;img style="float:left; margin:0 0 10px 10px;" src="http://bp1.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHqnUNFJvsI/AAAAAAAAAVM/s4ey1RjzRMk/s400/%E0%A4%89%E0%A4%B5%E0%A4%9C%E0%A4%A8.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5222670683440004802" /&gt;&lt;br /&gt;पण्डित मोटेरा जी शास्त्री को कौन नही जानता! आप अधिकारियों का रूख देखकर काम करते है. स्वदेशी आन्दोलने के दिनों मे अपने उस आन्दोलन का खूब विरोध किया था. स्वराज्य आन्दोलन के दिनों मे भी अपने अधिकारियों से राजभक्ति की सनद हासिल की थी. मगर जब इतनी उछल-कूद पर  उनकी तकदीर की मीठी नींद न टूटी, और अध्यापन कार्य से पिण्ड न छूटा, तो अन्त मे अपनी एक नई तदबीर सोची। घर जाकर धर्मपत्नी जी से बोले—इन बूढ़े तोतों को रटाते-रटातें मेरी खोपड़ी पच्ची हुई जाती है. इतने दिनों विद्या-दान देने का क्याफल मिला जो और आगे कुछ मिलने की आशा करूं.&lt;br /&gt; धर्मपत्न ने चिन्तित होकर कहा—भोजनों का भी तो कोई सहारा चाहिए.&lt;br /&gt; मोटेराम—तुम्हें जब देखो, पेट ही की फ्रिक पड़ी रहती है. कोई ऐसा विरला ही दिन जाता होगा कि निमन्त्रण न मिलते हो, और चाहे कोई निन्दा करें, पर मै परोसा लिये बिना नहीं आता हूं. आज ही सब यजमान मरे जाते है? मगर जन्म-भर पेट ही जिलया तो क्या किया। संसार का कुछ सुख भी तो भोगन चाहिए. मैने वैद्य बनने का निश्चय किया है. &lt;br /&gt; स्त्री ने आश्चर्य से कहा—वैद्य बनोगे, कुछ वैद्यकी पढ़ी भी है?&lt;br /&gt; मोटे—वैद्यक पढने से कुछ नही होता, संसार मे विद्या का इतना महत्व नही जितना बुद्धि क। दो-चार सीधे-सादे लटके है, बस और कुछ नही. आज ही अपने नाम के आगे भिष्गाचार्य बढ़ा लूंगा, कौन पूछने आता है, तुम भिषगाचार्य हो या नही. किसी को क्या गरज पड़ी है जो मेरी परीक्षा लेता फिरे. एक मोटा-सा साइनबोर्ड बनवा लूंगा. उस पर शब्द लिखें होगे—यहा स्त्री पुरूषों के गुप्त रोगों की चिकित्सा विशेष रूप से की जाती है. दो-चार पैसे का हउ़-बहेड़ा-आवंला कुट छानकर रख लूंगा. बस, इस काम के लिए इतना सामान पर्याप्त है. हां, समाचारपत्रों मे विज्ञापन दूंगा और नोटिस बंटवाऊंगा. उसमें लंका, मद्रास, रंगून, कराची आदि दूरस्थ स्थानों के सज्जनों की चिटिठयां दर्ज की जाएंगी. ये मेरे चिकित्सा-कौशल के साक्षी होगें जनता को क्या पड़ी है कि वह इस बात का पता लगाती फिरे कि उन स्थानों मे इन नामों के मनुष्य रहते भी है, या नहीं फिर देखों वैद्य की कैसी चलती है. &lt;br /&gt; स्त्री—लेकिन बिना जाने-बूझ दवा दोगे, तो फायदा क्या करेगी?&lt;br /&gt; मोटे—फायदा न करेगी, मेरी बला से। वैद्य का काम दवा देना है, वह मृत्यु को परस्त करने का ठेका नही लेता, और फिर जितने आदमी बीमार पड़ते है, सभी तो नही मर जाते. मेरा यह कहना है कि जिन्हें कोई औषधि नही दी जाती, वे विकार शान्त हो जाने पर ही अच्छे हो जाते है. वैद्यों को बिना मांगे यश मिलता है. पांच रोगियों मे एक भी अच्छा हो गया, तो उसका यश मुझे अवश्य ही मिलेगा. शेष चार जो मर गये, वे मेरी निन्दा करने थोडे ही आवेगें. मैने बहुत विचार करके देख लिया, इससे अच्छा कोई काम नही है. लेख लिखना मुझे आता ही है, कवित्त बना ही लेता हूं, पत्रों मे आयुर्वेद-महत्व पर दो-चार लेख लिख दूंगा, उनमें जहां-तहां दो-चार कवित्त भी जोड़ दूंगा और लिखूगां भी जरा चटपटी भाषा में. फिर देखों कितने उल्लू फसते है यह न समझो कि मै इतने दिनो केवल बूढे तोते ही रटाता रहा हूं. मै नगर के सफल वैद्यो की चालों का अवलोकन करता रहा हूं और इतने दिनों के बाद मुझे उनकी सफलता के मूल-मंत्र का ज्ञान हुआ है. ईश्वर ने चाहा तो एक दिन तुम सिर से पांव तक सोने से लदी होगी.&lt;br /&gt; स्त्री ने अपने मनोल्लास को दबाते हुए कहा—मै इस उम्र मे भला क्या गहने पहनूंगी, न अब वह अभिलाषा ही है, पर यह तो बताओं कि तुम्हें दवाएं बनानी भी तो नही आती, कैसे बनाओगे, रस कैसे बनेगें, दवाओ को पहचानते भी तो नही हो.&lt;br /&gt; मोटे—प्रिये! तुम वास्तव मे बड़ी मूर्ख हो. अरे वैद्यो के लिए इन बातों मे से एक भी आवश्यकता नही, वैद्य की चुटकी की राख ही रस है, भस्म है, रसायन है, बस आवश्यकता है कुछ ठाट-बाट की. एक बड़ा-सा कमरा चाहिए उसमें एक दरी हो, ताखों पर दस-पांच शीशीयां बोतल हो. इसके सिवा और कोई चीज दरकार नही, और सब कुछ बुद्धि आप ही आप कर लेती है. मेरे साहित्य-मिश्रित लेखों का बड़ा प्रभाव पड़ेगा, तुम देख लेना. अलंकारो का मुझे कितना ज्ञान है,  यह तो तुम जानती ही हो. आज इस भूमण्डल पर मुझे ऐसा कोई नही दिखता जो अलंकारो के विषय मे मुझसे पेश पा सके. आखिर इतने दिनों घास तो नही खोदी है! दस-पाचं आदमी तो कवि-चर्चा के नाते ही मेरे यहां आया जाया करेगें. बस, वही मेरे दल्लाह होगें. उन्ही की मार्फत मेरे पास रोगी आवेगें. मै आयुर्वेद-ज्ञान के बल पर नही नायिका-ज्ञान के बल पर धड़ल्ले से वैद्यक करूंगा, तुम देखती तो जाओ.&lt;br /&gt; स्त्री ने अविश्वास के भाव से कहा—मुझे तो डर लगता है कि कही यह विद्यार्थी भी तुम्हारे हाथ से न जाए. न इधर के रहो ने उधर के। तुम्हारे भाग्य मे तो लड़के पढ़ाना लिखा है, और चारों ओर से ठोकर खाकर फिर तुम्हें वी तोते रटाने पडेगें.&lt;br /&gt; मोटे—तुम्हें मेरी योग्यता पर विश्वास क्यों नही आता? &lt;br /&gt; स्त्री—इसलिए कि तुम वहां भी धुर्तता करोगे. मै तुम्हारी धूर्तता से चिढ़ती हूं. तुम जो कुछ नही हो और नही हो सकते,वक क्यो बनना चाहते हो? तुम लीडर न बन सके, न बन सके, सिर पटककर रह गये. तुम्हारी धूर्तता ही फलीभूत होती है और इसी से मुझे चिढ़ है. मै चाहती हूं कि तुम भले आदमी बनकर रहो. निष्कपट जीवन व्यतीत करो. मगर तुम मेरी बात कब सुनते हो? &lt;br /&gt; मोटे—आखिर मेरा नायिका-ज्ञान कब काम आवेगा?&lt;br /&gt; स्त्री—किसी रईस की मुसाहिबी क्यो नही कर लेते? जहां दो-चार सुन्दर कवित्त सुना दोगें. वह खुश हो जाएगा और कुछ न कुछ दे ही मारेगा. वैद्यक का ढोंग क्यों रचते हों!&lt;br /&gt; मोटे—मुझे ऐसे-ऐसे गुर मालूम है जो वैद्यो के बाप-दादों को भी न मालूम होगे. और सभी वैद्य एक-एक, दो-दो रूपये पर मारे-मारे फिरते है, मै अपनी फीस पांच रूपये रक्खूंगा, उस पर सवारी का किराया अलग. लोग यही समझेगें कि यह कोई बडे वैद्य है नही तो इतनी फीस क्यों होती?&lt;br /&gt; स्त्री को अबकी कुछ विश्वास आया बोली—इतनी देर मे तुमने एक बात मतलब की कही है. मगर यह समझ लो, यहां तुम्हारा रंग न जमेगा, किसी दूसरे शहर को चलना पड़ेगा.&lt;br /&gt; मोटे—(हंसकर) क्या मैं इतना भी नही जानता. लखनऊ मे अडडा जमेगा अपना. साल-भर मे वह धाक बांध दूं कि सारे वैद्य गर्द हो जाएं. मुझे और भी कितने ही मन्त्र आते है. मै रोगी को दो-तीन बार देखे बिना उसकी चिकित्सा ही न करूंगा. कहूंगा, मै जब तक रोगी की प्रकृति को भली भांति पहचान न लूं, उसकी दवा नही कर सकता. बोलो, कैसी रहेगी?&lt;br /&gt; स्त्री की बांछे खिल गई, बोली—अब मै तुम्हे मान गई, अवश्य चलेगी तुम्हारी वैद्यकी, अब मुझे कोई संदेह नही रहा. मगर गरीबों के साथ यह मंत्र न चलाना नही तो धोखा खाओगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साल भर गुजर गया. &lt;br /&gt;भिषगाचार्य पण्डित मोटेराम जी शास्त्री की लखनऊ मे घूम मच गई. अलंकारों का ज्ञान तो उन्हे था ही, कुछ गा-बजा भी लेते थे. उस पर गुप्त रोगो के विशेषज्ञ, रसिको के भाग्य जागें. पण्डित जी उन्हें कवित सुनाते, हंसाते, और बलकारक औषधियां खिलाते, और वह रईसों मे, जिन्हें पुष्टिकारक औषधियों की विशेष चाह रहती है, उनकी तारीफों के पुल बांधते. साल ही भर मे वैद्यजी का वह रंग जमा, कि शायदं गुप्त रोगों के चिकित्सक लखनऊ मे एकमात्र वही थे. गुप्त रूप से चिकित्सा भी करते. विलासिनी विधवारानियों और शौकीन अदूरदर्शी रईसों मे आपकी खूब पूजा होने लगी. किसी को अपने सामने समझते ही  न थे.&lt;br /&gt; मगर स्त्री उन्हे बराबर समझाया करती कि रानियों के झमेलें मे न फंसों, नहीं तो एक दिन पछताओगे.&lt;br /&gt; मगर भावी तो होकर ही रहती है, कोई लाख समझाये-बुझाये. पंडितजी के उपासको मे बिड़हल की रानी भी थी. राजा साहब का स्वर्गवास हो चुका था, रानी साहिबा न जाने किस जीर्ण रोग से ग्रस्त थी. पण्डितजी उनके यहां दिन मे पांच-पाचं बार जाते. रानी साहिबा उन्हें एक क्षण के लिए भी देर हो जाती तो बेचैन हो जाती, एक मोटर नित्य उनके द्वार पर खड़ी रहती थी. अब पण्डित जी ने खूब केचुल बदली थी. ताजेब की अचकन पहनते, बनारसी साफा बाधते और पम्प जूता डाटते थे. मित्रगण भी उनके साथ मोटर पर बैठकर दनदनाया करते थे. कई मित्रों को रानी सहिबा के दरबार मे नौकर रखा दिया. रानी साहिबा भला अपने मसीहा की बात कैसी टालती.&lt;br /&gt; मगर चर्खे जफाकार और ही षडयन्त्र रच रहा था. &lt;br /&gt; एक दिन पण्डितजी रानी साहिबा की गोरी-गोरी कलाई पर एक हाथ रखे नब्ज देख रहे थे, और दूसरे हाथ से उनके हृदय की गति की परिक्षा कर रहे थे कि इतने मे कई आदमी सोटै लिए हुए कमरे मे घुस आये और पण्डितजी पर टूट पड़े. रानी भागकर दूसरे कमरे की शरण ली और किवाड़ बन्द कर लिए. पण्डितजी पर बेभाव पड़ने लगे. यों तो पण्डितजी भी दमखम के आदमी थे, एक गुप्ती सदैव साथ रखते थे. पर जब धोखे मे कई आदमियों ने धर दबाया तो क्या करते? कभी इसका पैर पकड़ते कभी उसका. हाय-हाय! का शब्द मुंह से निकल रहा था पर उन बेरहमों  को उन पर जरा भी दया न आती थी, एक आदमी ने एक लात जमाकर कहा—इस दुष्ट की नाक काट लो.&lt;br /&gt; दूसरा बोला—इसके मुंह मे कलिख और चूना लगाकर छोड़ दो.&lt;br /&gt; तीसरा—क्यों वैद्यजी महाराज, बोलो क्या मंजूर है? नाक कटवाओगे या मुंह मे कालिख लगवाओगें?&lt;br /&gt; पण्डित—भूलकर भी नही सरकार. हाय मर गया! &lt;br /&gt; दूसरा—आज ही लखनऊ से रफरैट हो जाओं नही तो बुरा होगा.&lt;br /&gt; पणिडत—सरकार मै आज ही चला जाऊगां. जनेऊ की शपथ खाकर कहता हूं. आप यहां मेरी सूरत न देखेगें.&lt;br /&gt; तीसरा—अच्छा भाई, सब कोई इसे पांच-पांच लाते लगाकर छोड़ दो.&lt;br /&gt; पण्डित—अरे सरकार, मर जाऊगां, दया करो&lt;br /&gt; चौथा—तुम जैसे पाखंडियो का मर जाना ही अच्छा है. हां तो शुरू हो. &lt;br /&gt; पंचलत्ती पड़ने लगी, धमाधम की आवाजें आने लगी. मालूम होता था नगाड़े पर चोट पड़ रही है. हर धमाके के बाद एक बार हाय की आवाज निकल आती थी, मानों उसकी प्रतिध्वनी हो.&lt;br /&gt; पंचलत्ती पूजा समाप्त हो जाने पर लोगों ने मोटेराम जी को घसीटकर बाहर निकाला और मोटर पर बैठाकर घर भेज दिया, चलते-चलते चेतावनी दे दी, कि प्रात:काल से पहले भाग खड़े होना, नही तो और ही इलाज किया जाएगा.&lt;br /&gt;३&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोटेराम जी लंगड़ाते, कराहते, लकड़ी टेकते घर मे गए और धम से चारपाई पर गिर पडे. स्त्री ने घबराकर पूछा—कैसा जी है? अरे तुम्हारा क्या हाल है? हाय-हाय  यह तुम्हारा चेहरा कैसा हो गया!&lt;br /&gt; मोटे—हाय भगवान, मर गया.&lt;br /&gt; स्त्री—कहां दर्द है? इसी मारे कहती थी, बहुत रबड़ी न खाओं. लवणभास्कर ले आऊं?&lt;br /&gt;मोटे—हाय, दुष्टों ने मार डाला. उसी चाण्डालिनी के कारण मेरी दुर्गति हुई. मारते-मारते सबों ने भुरकुस निकाल दिया.&lt;br /&gt; स्त्री—तो यह कहो कि पिटकर आये हो. हां, पिटे हो. अच्छा हुआ. हो तुम लातो ही के देवता. कहती थी कि रानी के यहां मत आया-जाया करो. मगर तुम कब सुनते थे.&lt;br /&gt; मोटे—हाय, हाय! रांड, तुझे भी इसी दम कोसने की सूझी. मेरा  तो बुरा हाल है और तू कोस रही है. किसी से कह दे, ठेला-वेला लावे, रातो-रात लखनऊ से भाग जाना है. नही तो सबेरे प्राण न बचेगें.&lt;br /&gt; स्त्री—नही, अभी तुम्हारा पेट नही भरा. अभी कुछ दिन और यहां की हवा खाओ! कैसे मजे से लड़के पढात थे, हां नही तो वैद्य बनने की सूझी. बहुत अच्छा हुआ, अब उम्र भर न भूलोगे. रानी कहां थी कि तुम पिटते रहे और उसने तुम्हारी रक्षा न की. &lt;br /&gt; पण्डित—हाय, हाय वह चुडैल तो भाग गई. उसी के कारण क्या जानता था कि यह हाल होगा, नहीं तो उसकी चिकित्सा ही क्यों करता?&lt;br /&gt; स्त्री—हो तुम तकदीर के खोटे. कैसी वैद्यकी चल गई थी. मगर तुम्हारी करतूतों ने सत्यनाश मार दिया. आखिर फिर वही पढौनी करना पड़ी. हो तकदीर के खोटे.&lt;br /&gt; प्रात:काल मोटेराम जी के द्वार पर ठेला खड़ा था और उस पर असबाब लद रहा था. मित्रो मे एक भी नजर न आता था. पण्डित जी पड़े कराह रहे थे और स्त्री सामान लदवा रही थी.&lt;br /&gt;____________ प्रेमचंद, &lt;em&gt;‘माधुरी’ जनवरी, १९२८&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-5434684173211270133?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/5434684173211270133/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=5434684173211270133' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/5434684173211270133'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/5434684173211270133'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/07/blog-post_14.html' title='&lt;strong&gt;मोटेराम जी शास्त्री&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image 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/&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="right"&gt;निराशा एक बेलगाम घोड़ी है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न हाथ में लगाम होगी न रकाब में पांव&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खेल नहीं उस पर गद्दी गाँठना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुलत्ती झाड़ेगी और ज़मीन पर पटक देगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिगाड़ कर रख देगी सारा चेहरा-मोहरा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बगल में खड़ी होकर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज़मीन पर अपने खुर बजाएगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धूल के बगूले बनाएगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे कहती हो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दम है तो दुबारा गद्दी गाँठो मुझ पर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भागना चाहोगे तो भागने नहीं देगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घसीटते हुए ले जाएगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और न जाने किन जंगलों में छोड़ आएगी !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;*************&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजेश जोशी की एक कविता&lt;br /&gt;( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-1260364356188351750?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/1260364356188351750/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=1260364356188351750' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/1260364356188351750'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/1260364356188351750'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/07/blog-post_05.html' title='&lt;strong&gt;निराशा&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image 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/&gt;आत्मा इतनी थकान के बाद&lt;br /&gt;एक कप चाय माँगती है&lt;br /&gt;पुण्य माँगता है पसीना और आँसू पोछने के लिए एक तौलिया&lt;br /&gt;कर्म माँगता है रोटी और कैसी भी सब्जी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ईश्वर कहता है सिरदर्द की गोली ले आना&lt;br /&gt;आधा गिलास पानी के साथ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और तो और फकीर और कोढ़ी तक बंद कर देते हैं&lt;br /&gt;थक कर भीख माँगना&lt;br /&gt;दुआ और मिन्नतों की जगह&lt;br /&gt;उसके गले से निकलती है&lt;br /&gt;उनके गरीब फेफड़ों की हवा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलिए मैं भी पूछता हूँ&lt;br /&gt;क्या माँगू इस ज़माने से मीर&lt;br /&gt;जो देता है भरे पेट को खाना,&lt;br /&gt;दौलत मंद को सोना, हत्यारे को हथियार,&lt;br /&gt;बीमार को बीमारी, कमज़ोर की निर्बलता&lt;br /&gt;अन्यायी को सत्ता&lt;br /&gt;और व्यभिचारी को बिस्तर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पैदा करो सहानुभूति&lt;br /&gt;कि मैं अब भी हँसता हुआ दिखता हूँ&lt;br /&gt;अब भी लिखता हूँ कविताएँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;---------------------उदय प्रकाश की कविता, साभार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-6501145350294377070?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/6501145350294377070/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=6501145350294377070' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/6501145350294377070'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/6501145350294377070'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/07/blog-post.html' title='&lt;strong&gt;सहानुभूति की माँग&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image 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alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5217340997644843426" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;रक्त से भरा तसला है&lt;br /&gt;रिसता हुआ घर के कोने-अंतरों में&lt;br /&gt;हम हैं सूजे हुए पपोटे&lt;br /&gt;प्यार किए जाने की अभिलाषा&lt;br /&gt;सब्जी काटते हुए भी&lt;br /&gt;पार्क में अपने बच्चों पर निगाह रखती हुई&lt;br /&gt;प्रेतात्माएँ&lt;br /&gt;हम नींद में भी दरवाज़े पर लगा हुआ कान हैं&lt;br /&gt;दरवाज़ा खोलते ही&lt;br /&gt;अपने उड़े-उड़े बालों और फीकी शक्ल पर&lt;br /&gt;पैदा होने वाला बेधक अपमान हैं&lt;br /&gt;हम हैं इच्छा-मृग&lt;br /&gt;वंचित स्वप्नों की चरागाह में तो&lt;br /&gt;चौकड़ियाँ&lt;br /&gt;मार लेने दो हमें कमबख्तो !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-----------------------वीरेन डंगवाल कृत साभार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-6051907260823295550?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/6051907260823295550/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=6051907260823295550' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/6051907260823295550'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/6051907260823295550'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/06/blog-post_29.html' title='&lt;strong&gt;हम औरतें&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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होगा&lt;br /&gt;जहाँ यह अजस्र धारा बह रही है.&lt;br /&gt;चलो इसमें एक बूँद बनकर बहें&lt;br /&gt;ताकि हमारा रास्ता&lt;br /&gt;कल इतिहास के सफ़ों पर&lt;br /&gt;सुन्दर सुरीले छंद बन अंकित हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;...इससे पहले कि&lt;br /&gt;इस सदी की किताब बंद हो&lt;br /&gt;ऐसा कुछ करें कि&lt;br /&gt;हमारे हिस्से के सफ़े&lt;br /&gt;कोरे ही न छूट जायें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;_____________________कात्यायनी, &lt;em&gt;दुर्ग द्वार पर दस्तक&lt;/em&gt; से साभार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-7292564300554485388?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/7292564300554485388/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=7292564300554485388' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/7292564300554485388'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/7292564300554485388'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/06/blog-post_28.html' title='&lt;strong&gt;साहित्येतिहास में स्त्री &lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp3.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SGZ8o2e8c6I/AAAAAAAAASE/nAp7k9IUyK4/s72-c/140px-Katyayani.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-5326502936257301615</id><published>2008-06-25T18:38:00.002+05:30</published><updated>2008-06-25T19:09:35.244+05:30</updated><title type='text'>आखिरी मंजिल ( कहानी )</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp3.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SGJJ_hZ5mdI/AAAAAAAAARc/z7ix8I8IYh4/s1600-h/CAJKRU9Q.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SGJJ_hZ5mdI/AAAAAAAAARc/z7ix8I8IYh4/s400/CAJKRU9Q.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5215812674096044498" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;आह? आज तीन साल गुजर गए, यही मकान है, यही बाग है, यही गंगा का किनारा, यही संगमरमर का हौज। यही मैं हूँ और यही दरोदीवार. मगर इन चीजों से दिल पर कोई असर नहीं होता. वह नशा जो गंगा की सुहानी और हवा के दिलकश झौंकों से दिल पर छा जाता था. उस नशे के लिए अब जी तरस-जरस के रह जाता है. अब वह दिल नही रहा. वह युवती जो जिंदगी का सहारा थी अब इस दुनिया में नहीं है.&lt;br /&gt; मोहिनी ने बड़ा आकर्षक रूप पाया था. उसके सौंदर्य में एक आश्चर्यजनक बात थी. उसे प्यार करना मुश्किल था, वह पूजने के योग्य थी. उसके चेहरे पर हमेशा एक बड़ी लुभावनी आत्मिकता की दीप्ति रहती थी. उसकी आंखे जिनमें लाज और गंभीरता और पवित्रता का नशा था, प्रेम का स्रोत थी. उसकी एक-एक चितवन, एक-एक क्रिया, एक-एक बात उसके ह्रदय की पवित्रता और सच्चाई का असर दिल पर पैदा करती थी. जब वह अपनी शर्मीली आंखों से मेरी ओर ताकती तो उसका आकर्षण और असकी गर्मी मेरे दिल में एक ज्वारभाटा सा पैदा कर देती थी. उसकी आंखों से आत्मिक भावों की किरनें निकलती थीं. मगर उसके होठों प्रेम की बानी से अपरिचित थे. उसने कभी इशारे से भी उस अथाह प्रेम को व्यक्त नहीं किया जिसकी लहरों में वह खुद तिनके की तरह बही जाती थी. उसके प्रेम की कोई सीमा न थी. वह प्रेम जिसका लक्ष्य मिलन है, प्रेम नहीं वासना है. मोहिनी का प्रेम वह प्रेम था जो मिलने में भी वियोग के मजे लेता है. मुझे खूब याद है एक बार जब उसी हौज के किनारे चॉँदनी रात में मेरी प्रेम – भरी बातों से विभोर होकर उसने कहा था-आह वह आवाज अभी मेरे ह्रदय पर अंकित है, ‘मिलन प्रेम का आदि है अंत नहीं.’ प्रेम की समस्या पर इससे ज्यादा शनदार, इससे ज्यादा ऊंचा ख्याल कभी मेरी नजर में नहीं गुजरा. वह प्रेम जो चितावनो से पैदा होता है और वियोग में भी हरा-भरा रहता है, वह वासना के एक झोंके को भी बर्दाश्त नहीं कर सकता. संभव है कि यह मेरी आत्मस्तुति हो मगर वह प्रेम, जो मेरी कमजोरियों के बावजूद मोहिनी को मुझसे था उसका एक कतरा भी मुझे बेसुध करने के लिए काफी था. मेरा हृदय इतना विशाल ही न था, मुझे आश्चर्य होता था कि मुझमें वह कौन-सा गुण था जिसने मोहिनी को मेरे प्रति प्रेम से विह्वल कर दिया था. सौन्दर्य, आचरण की पवित्रता, मर्दानगी का जौहर यही वह गुण हैं जिन पर मुहब्बत निछावर होती है. मगर मैं इनमें से एक पर भी गर्व नहीं कर सकता था. शायद मेरी कमजोरियॉँ ही उस प्रेम की तड़प का कारण थीं.&lt;br /&gt; मोहिनी में वह अदायें न थीं जिन पर रंगीली तबीयतें फिदा हो जाया करती हैं. तिरछी चितवन, रूप-गर्व की मस्ती भरी हुई आंखें, दिल को मोह लेने वाली मुस्कराहट, चंचल वाणी, उनमें से कोई चीज यहॉँ न थी! मगर जिस तरह चॉँद की मद्धिम सुहानी रोशनी में कभी-कभी फुहारें पड़ने लगती हैं, उसी तरह निश्छल प्रेम में उसके चेहरे पर एक मुस्कराहट कौंध जाती और आंखें नम हो जातीं. यह अदा न थी, सच्चे भावों की तस्वीर थी जो मेरे हृदय में पवित्र प्रेम की खलबली पैदा कर देती थी.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;     २&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाम का वक्त था, दिन और रात गले मिल रहे थे. आसमान पर मतवाली घटायें छाई हुई थीं और मैं मोहिनी के साथ उसी हौज के किनारे बैठा हुआ था. ठण्डी-ठण्डी बयार और मस्त घटायें हृदय के किसी कोने में सोते हुए प्रेम के भाव को जगा दिया करती हैं. वह मतवालापन जो उस वक्त हमारे दिलों पर छाया हुआ था उस पर मैं हजारों होशमंदियों को कुर्बान कर सकता हूँ. ऐसा मालूम होता था कि उस मस्ती के आलम में हमारे दिल बेताब होकर आंखों से टपक पड़ेंगे. आज मोहिनी की जबान भी संयम की बेड़ियों से मुक्त हो गई थी और उसकी प्रेम में डूबी हुई बातों से मेरी आत्मा को जीवन मिल रहा था.&lt;br /&gt; एकाएक मोहिनी ने चौंककर गंगा की तरफ देखा. हमारे दिलों की तरह उस वक्त गंगा भी उमड़ी हुई थी.&lt;br /&gt;पानी की उस उद्विग्न उठती-गिरती सतह पर एक दिया बहता हुआ चला जाता था और और उसका चमकता हुआ अक्स थिरकता और नाचता एक पुच्छल तारे की तरह पानी को आलोकित कर रहा था. आह! उस नन्ही-सी जान की क्या बिसात थी! कागज के चंद पुर्जे, बांस की चंद तीलियां, मिट्टी का एक दिया कि जैसे किसी की अतृप्त लालसाओं की समाधि थी जिस पर किसी दुख बँटानेवाले ने तरस खाकर एक दिया जला दिया था. मगर वह नन्हीं-सी जान जिसके अस्तित्व का कोई ठिकाना न था, उस अथाह सागर में उछलती हुई लहरों से टकराती, भँवरों से हिलकोरें खाती, शोर करती हुई लहरों को रौंदती चली जाती थी. शायद जल देवियों ने उसकी निर्बलता पर तरस खाकर उसे अपने आंचलों में छुपा लिया था.&lt;br /&gt; जब तक वह दिया झिलमिलाता और टिमटिमाता, हमदर्द लहरों से झकोरे लेता दिखाई दिया. मोहिनी टकटकी लगाये खोयी-सी उसकी तरफ ताकती रही. जब वह आंख से ओझल हो गया तो वह बेचैनी से उठ खड़ी हुई और बोली- मैं किनारे पर जाकर उस दिये को देखूँगी. &lt;br /&gt; जिस तरह हलवाई की मनभावन पुकार सुनकर बच्चा घर से बाहर निकल पड़ता है और चाव-भरी आंखों से देखता और अधीर आवाजों से पुकारता उस नेमत के थाल की तरफ दौड़ता है, उसी जोश और चाव के साथ मोहिनी नदी के किनारे चली. &lt;br /&gt; बाग से नदी तक सीढ़ियॉँ बनी हुई थीं. हम दोनों तेजी के साथ नीचे उतरे और किनारे पहुँचते ही मोहिनी ने खुशी के मारे उछलकर जोर से कहा-अभी है! अभी है! देखो वह निकल गया!&lt;br /&gt; वह बच्चों का-सा उत्साह और उद्विग्न अधीरता जो मोहिनी के चेहरे पर उस समय थी, मुझे कभी न भूलेगी. मेरे दिल में सवाल पैदा हुआ, उस दिये से ऐसा हार्दिक संबंध, ऐसी विह्वलता क्यों? मुझ जैसा कवित्वशून्य व्यक्ति उस पहेली को जरा भी न बूझ सका.&lt;br /&gt; मेरे हृदय में आशंकाएं पैदा हुई. अंधेरी रात है, घटायें उमड़ी हुई, नदी बाढ़ पर, हवा तेज, यहॉँ इस वक्त ठहरना ठीक नहीं. मगर मोहिनी! वह चाव-भरे भोलेपन की तस्वीर, उसी दिये की तरफ आँखें लगाये चुपचाप खड़ी थी और वह उदास दिया ज्यों हिलता मचलता चला जाता था, न जाने कहॉँ किस देश!&lt;br /&gt; मगर थोड़ी देर के बाद वह दिया आँखों से ओझल हो गया. मोहिनी ने निराश स्वर में पूछा-गया! बुझ गया होगा? और इसके पहले कि मैं जवाब दूँ वह उस डोंगी के पास चली गई, जिस पर बैठकर हम कभी-कभी नदी की सैरें किया करते थे, और प्यार से मेरे गले लिपटकर बोली-मैं उस दिये को देखने जाऊँगी कि वह कहॉँ जा रहा है, किस देश को. &lt;br /&gt; यह कहते-कहते मोहिनी ने नाव की रस्सी खोल ली. जिस तरह पेड़ों की डालियॉँ तूफान के झोंकों से झंकोले खाती हैं उसी तरह यह डोंगी डॉँवाडोल हो रही थी. नदी का वह डरावना विस्तार, लहरों की वह भयानक छलॉँगें, पानी की वह गरजती हुई आवाज, इस खौफनाक अंधेरे में इस डोंगी का बेड़ा क्योंकर पार होगा! मेरा दिल बैठ गया. क्या उस अभागे की तलाश में यह किश्ती भी डूबेगी! मगर मोहिनी का दिल उस वक्त उसके बस में न था. उसी दिये की तरह उसका हृदय भी भावनाओं की विराट, लहरों भरी, गरजती हुई नदी में बहा जा रहा था. मतवाली घटायें झुकती चली आती थीं कि जैसे नदी के गले मिलेंगी और वह काली नदी यों उठती थी कि जैसे बदलों को छू लेंगी। डर के मारे आँखें मुंदी जाती थीं. हम तेजी के साथ उछलते, कगारों के गिरने की आवाजें सुनते, काले-काले पेड़ों का झूमना देखते चले जाते थे. आबादी पीछे छूट गई, देवताओं को बस्ती से भी आगे निकल गये. एकाएक मोहिनी चौंककर उठ खड़ी हुई और बोली- अभी है! अभी है! देखों वह जा रहा है.&lt;br /&gt; मैंने आंख उठाकर देखा, वह दिया ज्यों का त्यों हिलता-मचलता चला जाता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दिये को देखते हम बहुत दूर निकल गए. मोहिनी ने यह राग अलापना शुरू किया:&lt;br /&gt;मैं साजन से मिलन चली...&lt;br /&gt;कैसा तड़पा देने वाला गीत था और कैसी दर्दभरी रसीली आवाज। प्रेम और आंसुओं में डूबी हुई. मोहक गीत में कल्पनाओं को जगाने की बड़ी शक्ति होती है. वह मनुष्य को भौतिक संसार से उठाकर कल्पनालोक में पहुँचा देता है. मेरे मन की आंखों में उस वक्त नदी की पुरशोर लहरें, नदी किनारे की झूमती हुई डालियॉँ, सनसनाती हुई हवा सबने जैसे रूप धर लिया था और सब की सब तेजी से कदम उठाये चली जाती थीं, अपने साजन से मिलने के लिए. उत्कंठा और प्रेम से झूमती हुई ऐ युवती की धुंधली सपने-जैसी तस्वीर हवा में, लहरों में और पेड़ों के झुरमुट में चली जाती दिखाई देती और कहती थी- साजन से मिलने के लिए! इस गीत ने सारे दृश्य पर उत्कंठा का जादू फूंक दिया.&lt;br /&gt;मैं साजन से मिलन चली&lt;br /&gt;साजन बसत कौन सी नगरी मैं बौरी ना जानूँ&lt;br /&gt;ना मोहे आस मिलन की उससे ऐसी प्रीत भली&lt;br /&gt;मैं साजन से मिलन चली...&lt;br /&gt; मोहिनी खामोश हुई तो चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ था और उस सन्नाटे में एक बहुत मद्धिम, रसीला स्वप्निल-स्वर क्षितिज के उस पार से या नदी के नीचे से या हवा के झोंकों के साथ आता हुआ मन के कानों को सुनाई देता था.&lt;br /&gt;                    मैं साजन से मिलन चली&lt;br /&gt; मैं इस गीत से इतना प्रभावित हुआ कि जरा देर के लिए मुझे खयाल न रहा कि कहॉँ हूँ और कहॉँ जा रहा हूँ. दिल और दिमाग में वही राग गूँज रहा था. अचानक मोहिनी ने कहा-उस दिये को देखो. मैंने दिये की तरफ देखा. उसकी रोशनी मंद हो गई थी और आयु की पूंजी खत्म हो चली थी. आखिर वह एक बार जरा भभका और बुझ गया. जिस तरह पानी की बूँद नदी में गिरकर गायब हो जाती है, उसी तरह अंधेरे के फैलाव में उस दिये की हस्ती गायब हो गई! मोहिनी ने धीमे से कहा, अब नहीं दिखाई देता! बुझ गया! यह कहकर उसने एक ठण्डी सांस ली. दर्द उमड़ आया. आँसुओं से गला फंस गया, जबान से सिर्फ इतना निकला, क्या यही उसकी आखिरी मंजिल थी? और आँखों से आँसू गिरने लगे.&lt;br /&gt; मेरी आँखों के सामने से पर्दा-सा हट गया. मोहिनी की बेचैनी और उत्कंठा, अधीरता और उदासी का रहस्य समझ में आ गया और बरबस मेरी आंखों से भी आँसू की चंद बूंदें टपक पड़ीं. क्या उस शोर-भरे, खतरनाक, तूफानी सफर की यही आखिरी मंजिल थी?&lt;br /&gt; दूसरे दिन मोहिनी उठी तो उसका चेहरा पीला था. उसे रात भर नींद नहीं आई थी. वह कवि स्वभाव की स्त्री थी. रात की इस घटना ने उसके दर्द-भरे भावुक हृदय पर बहुत असर पैदा किया था. हँसी उसके होंठों पर यूँ ही बहुत कम आती थी, हॉँ चेहरा खिला रहता थां आज से वह हँसमुखपन भी बिदा हो गया, हरदम चेहरे पर एक उदासी-सी छायी रहती और बातें ऐसी जिनसे हृदय छलनी होता था और रोना आता था. मैं उसके दिल को इन ख्यालों से दूर रखने के लिए कई बार हँसाने वाले किस्से लाया मगर उसने उन्हें खोलकर भी न देखा। हॉँ, जब मैं घर पर न होता तो वह कवि की रचनाएं देखा करती मगर इसलिए नहीं कि उनके पढ़ने से कोई आनन्द मिलता था बल्कि इसलिए कि उसे रोने के लिए खयाल मिल जाता था और वह कविताएँ जो उस जमाने में उसने लिखीं दिल को पिघला देने वाले दर्द-भरे गीत हैं. कौन ऐसा व्यक्ति है जो उन्हें पढ़कर अपने आँसू रोक लेगा. वह कभी-कभी अपनी कविताएँ मुझे सुनाती और जब मैं दर्द में डूबकर उनकी प्रशंसा करता तो मुझे उसकी ऑंखों में आत्मा के उल्लास का नशा दिखाई पड़ता. हँसी-दिल्लगी और रंगीनी मुमकिन है कुछ लोगों के दिलों पर असर पैदा कर सके मगर वह कौन-सा दिल है जो दर्द के भावों से पिघल न जाएगा.&lt;br /&gt; एक रोज हम दोनों इसी बाग की सैर कर रहे थे. शाम का वक्त था और चैत का महीना. मोहिनी की तबियत आज खुश थी. बहुत दिनों के बाद आज उसके होंठों पर मुस्कराहट की झलक दिखाई दी थी. जब शाम हो गई और पूरनमासी का चॉँद गंगा की गोद से निकलकर ऊपर उठा तो हम इसी हौज के किनारे बैठ गए. यह मौलसिरियों की कतार ओर यह हौज मोहिनी की यादगार हैं. चॉँदनी में बिसात आयी और चौपड़ होने लगी. आज तबियत की ताजगी ने उसके रूप को चमका दिया था और उसकी मोहक चपलतायें मुझे मतवाला किये देती थीं. मैं कई बाजियॉँ खेला और हर बार हारा. हारने में जो मजा था वह जीतने में कहॉँ. हल्की-सी मस्ती में जो मजा है वह छकने और मतवाला होने में नहीं.&lt;br /&gt; चॉँदनी खूब छिटकी हुई थी. एकाएक मोहिनी ने गंगा की तरफ देखा और मुझसे बोली, वह उस पार कैसी रोशनी नजर आ रही है? मैंने भी निगाह दौड़ाई, चिता की आग जल रही थी लेकिन मैंने टालकर कहा- सॉँझी खाना पका रहे हैं.&lt;br /&gt; मोहिनी को विश्वास नहीं हुआ. उसके चेहरे पर एक उदास मुस्कराहट दिखाई दी और आँखें नम हो गईं. ऐसे दुख देने वाले दृश्य उसके भावुक और दर्दमंद दिल पर वही असर करते थे जो लू की लपट फूलों के साथ करती है. &lt;br /&gt; थोड़ी देर तक वह मौन, निश्चला बैठी रही फिर शोकभरे स्वर में बोली-‘अपनी आखिरी मंजिल पर पहुँच गया!’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;______________________________________________&lt;strong&gt;प्रेमचंद&lt;/strong&gt;&lt;br&gt;-जमाना, अगस्त-सितम्बर १९११ &lt;/br&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-5326502936257301615?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/5326502936257301615/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=5326502936257301615' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/5326502936257301615'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/5326502936257301615'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/06/blog-post_25.html' title='&lt;strong&gt;आखिरी मंजिल&lt;/strong&gt; ( कहानी )'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp3.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SGJJ_hZ5mdI/AAAAAAAAARc/z7ix8I8IYh4/s72-c/CAJKRU9Q.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-806717979787722124</id><published>2008-06-18T13:54:00.007+05:30</published><updated>2008-06-18T14:39:27.822+05:30</updated><title type='text'>आदमी की पूँछ (व्यंग्य)</title><content type='html'>&lt;a "http://bp1.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SFjOcbYqi0I/AAAAAAAAAQk/enDMDoBtbbg/s1600-h/Graphic1.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SFjOcbYqi0I/AAAAAAAAAQk/enDMDoBtbbg/s320/Graphic1.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5213143556464216898" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज के बंदर भले न मानें, मगर आज का आदमी जरूर मानता है कि आदमी बंदर की औलाद है. चिंपाजी की प्रागैतिहासिक नानी हमारी भी नानी थी. पहले हम भी चिंपाजी की तरह पेड़ पर रहते थे और जमीन पर आने से घबराते थे. यह अलग बात है कि चिंपाजी जो था, वही बना रहा. हम जो थे, वह नहीं रहे. और तो और हम ने अपनी ऐतिहासिक पूँछ तक त्याग दी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मान लो, आज जो हम हैं, वह रहते, लेकिन साथ ही हमारी पूँछ भी रहती. यानी हम पूँछवान मनुष्य होते, तो क्या होता!&lt;br /&gt;एक संभावना यह थी कि हम पूँछ को शरीर का एक फालतू अंग मानकर कटवा डालते. लेकिन क्या हम सचमुच ऐसा करते? क्या अपने शरीर के किसी अंग को कटवा डालना आसान होता है. नहीं होता, तो इसका मतलब यह है कि हनुमानजी की तरह हमारी भी पूँछ होती. यह फालतू सी चीज हमेशा पीछे लटकी रहती, तो क्या हम अपने को अपनी ही नजर में हास्यास्पद लगते? क्या जिंदगी भर, पीढ़ी-दर- पीढ़ी हम इस हास्यास्पदता को ढो पाते?&lt;br /&gt;दूसरी संभावना यह है कि अगर गाय, भैंस, कुत्ता, गधा और खुद बंदर अपनी पूँछ के कारण हमें हास्यास्पद नहीं लगता है तो हम अपनी ही नजर में खुद को हास्यास्पद क्यों लगते?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो एक समस्या तो हल हो गई कि न हम अपनी पूँछ कटवाते, न खुद को हास्यास्पद लगते. मगर अब सवाल सामने यह आता है कि हम अपनी पूँछ का क्या करते? सिर से पैर तक हमारे शरीर का हर अंग काम का है. पूँछ भी शायद किसी न किसी तरह जरूरी होती. गुस्से में हम उसे जमीन पर फटकारते. शायद मक्खी-मच्छर से अपने को बचाने के लिए गाय भैंस की तरह हम भी अपनी पूँछ का इस्तेमाल करते. मालिक को खुश करने के लिए उसके सामने कुत्ते की तरह हम भी दुम हिलाते. शायद पाँच दस किलो का वजन उठाने के लिए हम पूँछ का इस्तेमाल करते.&lt;br /&gt;अगर कोई बिन पूँछ का हमें दिखता, तो हम उसे विकलांग मानते. बच्चों के हाथ-पैर तोड़कर उन्हें विकलांग बनाकर भीख मँगवाने वाले, तब शायद बच्चों की पूँछ भी काट डालते. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन पूँछ का बड़ा होना श्रेष्ठता का प्रतीक माना जाता या छोटा होना? छोटी पूँछ इसलिए श्रेष्ठ मानी जा सकती थी वह जमीन पर नहीं घिसटती. लेकिन छोटा कद, छोटी नाक, छोटी आँख, छोटे हाथ वगैरह को सौंदर्य का प्रतीक तो नहीं माना जाता. इसलिए संभव था कि लंबी पूँछ मनुष्य के सौंदर्य उपमानों में से एक मानी जाती। और सब तो ठीक है लेकिन लड़की की पूँछ छोटी है’, और सब तो ठीक है लेकिन लड़के की पूँछ टेढ़ी है’ जैसी टिप्पणियाँ होतीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक सवाल यह भी है कि आदमी अपनी पूँछ उठाकर चलता या गिराकर चलता या सीधी रखकर चलता? पूँछ उठाकर चलता, तो वह शर्ट पैंट या साड़ी ब्लाउज के बाहर होती या अंदर? और अगर पूँछ शर्ट-पैंट या साड़ी- ब्लाउज के बाहर होती, तो क्या उसे ठंड, गरमी, बरसात से बचाने के लिए कपड़े से ढँका जाता?&lt;br /&gt;तब पूँछ ढँकने की भी डेस होती और उसके ड्रेस डिजाइनर होते. फैशन हमेशा बदलते रहते. गरमी में पुरुष अपनी पूँछ आधी या पूरी खुली रखते, मगर औरतों को अपनी पूँछ ढँकनी पड़ती. केवल शहरी आधुनिकाएँ ही अपनी पूँछ को अधनंगा रखतीं और बुढ़ऊ कहते कि देखा-देखा, आजकल की लड़कियाँ कितनी बेशरम हैं, अपनी पूँछ दिखाती रहती हैं. लड़के टेढ़ी या सीधी नजरों से लड़कियों की पूँछ को देखते और कहते, यार क्या बला की पूँछ है. हाय! हम तो मर गए.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूँछ के बालों के बारे में तो हमने सोचा ही नहीं. पूँछ के बाल धोए जाते और उनमें कंघी की जाती. तब ब्यूटी पार्लवाले पूँछ के बालों को ‘सुन्दर’ बनाने के भी उपाय करते. उधर नाइयों को भी काम मिलता. हो सकता है कुछ पुरुष दाढ़ी-मूँछ की तरह पूँछ के बाल भी शेव कराते. कुछ इन बालों को बड़ा रखते. लड़कियाँ हो सकता है, इन बालों में रिबन बाँधतीं, रबड़ लगातीं या क्लिप लगातीं. पूँछ के बालों को नरम, मुलायम और स्वस्थ रखने के लिए हो सकता है कुछ साबुन शैंपू और क्रीमें होतीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत कुछ होता, गर पूँछ होती. तब आँख, दाँत कान विशेषज्ञ की तरह शायद पूँछ विशेषज्ञ भी होते. लोग पूँछ में दर्द की शिकायत लेकर डॉक्टर के पास जाते. डॉक्टर पूछता कि पूँछ को ऊँचा रखने से दर्द होता है या नीचा रखने से. पूँछ को फटकारने से दर्द होता है या हिलाने से. वह दवा के साथ-साथ पूँछ के तरह- तरह के व्यायाम भी बताता. मालिश के लिए तेल या लोशन बताता. पूँछ के बारे में कुछ नए मुहावरे भी बनते. हो सकता है, तब लोग पूँछ का सवाल बनाने की बजाए पूँछ का सवाल बनाते. व्यवस्था को लूँली-लँगड़ी के साथ ही लोग पूँछ कटी भी बताते. किसी को गरियाने के लिए लोग तब कहते कि साले को पूँछ हिलाना तो आता नहीं है, नेतागिरी करने चला है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और भी अनंत संभावनाएँ हैं. हिंदुओं में शादी के समय वर-वधू की गाँठ बाँधने की बजाए पूँछ बाँछने की परंपरा होती. हो सकता है, आदमी को पूँछ होती तो उसे कुर्सी की जरूरत न पड़ती. जमीन पर दो पैर रखे, पूँछ गोल-गोल मोड़कर रखी और बैठ गए. &lt;br /&gt;हो सकता है, हम भारतीय अपनी पूँछों के बल पर गर्व करते और सबसे बड़ी बात, सिर्फ हनुमान की ही नहीं राम-लक्ष्मण-सीता, कृष्ण-राधा वगैरह की जितनी तसवीरें और मूर्तियाँ मिलतीं, सब में उनकी पूँछ होती.&lt;br /&gt;_____________________विष्णु नागर,  &lt;em&gt;राष्ट्रीय नाक&lt;/em&gt; से साभार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-806717979787722124?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/806717979787722124/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=806717979787722124' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/806717979787722124'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/806717979787722124'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/06/blog-post_18.html' title='&lt;strong&gt;आदमी की पूँछ&lt;/strong&gt; (व्यंग्य)'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp1.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SFjOcbYqi0I/AAAAAAAAAQk/enDMDoBtbbg/s72-c/Graphic1.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-9201046097106333342</id><published>2008-06-15T21:49:00.007+05:30</published><updated>2008-06-18T14:54:14.444+05:30</updated><title type='text'>संस्कृति (लघुकथा)</title><content type='html'>&lt;a ="http://bp1.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SFVPC8CnFQI/AAAAAAAAANs/AKsdYVEkiew/s1600-h/CAGBMNG7.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SFVPC8CnFQI/AAAAAAAAANs/AKsdYVEkiew/s400/CAGBMNG7.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5212159055646627074" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भूखा आदमी सड़क किनारे कराह रहा था. एक दयालु आदमी रोटी लेकर उसके पास पहँचा और उसे दे ही रहा था कि एक-दूसरे आदमी ने उसका हाथ खींच लिया. वह आदमी बड़ा रंगीन था. &lt;br /&gt;    पहले आदमी ने पूछा, "क्यों भाई, भूखे को भोजन क्यों नहीं देने देते?"&lt;br /&gt;    रंगीन आदमी बोला, "ठहरो, तुम इस प्रकार उसका हित नहीं कर सकते. तुम केवल उसके तन की भूख समझ पाते हो, मैं उसकी आत्मा की भूख जानता हूँ. देखते नहीं हो, मनुष्य-शरीर में पेट नीचे है और हृदय के ऊपर. हृदय की अधिक महत्ता है."&lt;br /&gt;    पहला आदमी बोला, "लेकिन उसका हृदय पेट पर ही टिका हुआ है. अगर पेट में भोजन नहीं गया तो हृदय की टिक-टिक बंद नहीं हो जायेगी!"&lt;br /&gt;    रंगीन आदमी हँसा, फिर बोला,  "देखो, मैं बतलाता हूँ कि उसकी भूख कैसे बुझेगी!"&lt;br /&gt;    यह कहकर वह उस भूखे के सामने बाँसुरी बजाने लगा. दूसरे ने पूछा, "यह तुम क्या कर रहे हो, इससे क्या होगा?"&lt;br /&gt;    रंगीन आदमी बोला, "मैं उसे संस्कृति का राग सुना रहा हूँ. तुम्हारी रोटी से तो एक दिन के लिए ही उसकी भूख भागेगी, संस्कृति के राम से उसकी जनम-जनम की भूख भागेगी."&lt;br /&gt;    वह फिर बाँसूरी बजाने लगा. &lt;br /&gt;    और तब वह भूखा उठा और बाँसूरी झपटकर पास की नाली में फेंक दी.    &lt;br /&gt;____________________________ &lt;a ="http://bp1.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SFVMs5KXr8I/AAAAAAAAANc/N5t3KrKTi2s/s1600-h/HarishankerParsai.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SFVMs5KXr8I/AAAAAAAAANc/N5t3KrKTi2s/s200/HarishankerParsai.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5212156477893488578" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;हरिशंकर परसाई  कृत  साभार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-9201046097106333342?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/9201046097106333342/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=9201046097106333342' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/9201046097106333342'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/9201046097106333342'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/06/blog-post_7239.html' title='&lt;strong&gt;संस्कृति&lt;/strong&gt; (लघुकथा)'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp1.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SFVPC8CnFQI/AAAAAAAAANs/AKsdYVEkiew/s72-c/CAGBMNG7.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-1729057151592981889</id><published>2008-06-15T00:38:00.000+05:30</published><updated>2008-06-15T01:07:42.665+05:30</updated><title type='text'>रजनी-दिन नित्य चला ही किया </title><content type='html'>&lt;a ="http://bp2.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SFQdaG1Aw_I/AAAAAAAAANU/QtqvZIlR2dI/s1600-h/hajari+prasad+dwivedi.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SFQdaG1Aw_I/AAAAAAAAANU/QtqvZIlR2dI/s400/hajari+prasad+dwivedi.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5211823003121271794" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;गुरुवर आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अनेक विधाओं में रचना की है. उनका कवि रूप अपेक्षाकृत अल्पज्ञात है. उनकी कोई कविता किसी पत्रिका में प्रकाशित मैंने नहीं देखी है. ‘कवि’ (संपादक:विष्णुचंद्र शर्मा) में उन्होंने भवानीप्रसाद मिश्र की कविताओं पर अपने विचार कविता के रूप में प्रकट किये थे. वह कविता में लिखी हुई आलोचना है. हलके मूड में कभी-कभी वे अपनी कविताएँ सुनाते थे. उनके शिष्यों ने भी उनकी कविताओं को गंभीरता से नहीं लिया. डॉ. नामवर सिंह ने ‘आलोचना’ का संपादन शुरू किया तो द्विवेदी जी उनसे मज़ाक में कहते-‘‘मैंने भी कविताएँ लिखी हैं. मुझसे क्यों नहीं माँगते?’’ एक बार डॉ. नित्यानंद तिवारी और हम साथ-साथ बैठे थे. पंडित जी ने नामवर जी से कहा-‘‘मेरी कविताएँ ‘आलोचना’ में क्यों नहीं छापते?’’ मैंने कहा-‘‘नामवर जी, इतनी खराब कविताएं आप छापते हैं, पंडित जी की कविताएँ भी छाप दीजिए.’’ आचार्यश्री ने अट्टाहस किया. वत्सल एवं कृत्रिम क्रोध में कहा-‘‘मेरी कविताएँ अच्छी हैं, उनकी बुराई मत करो.’’ बाद में नित्यानंद जी ने आश्चर्यपूर्वक पूछा-‘‘आप द्विवेदी जी से ऐसी बात कर लेते हैं!’’&lt;br /&gt;लेकिन एक बार भोपाल में ‘इप्टा’ के एक युवक गायक से पंडित जी की एक कविता सुनकर मैं चकित रह गया. कविता की प्रारंभिक पंक्तियाँ हैं-&lt;br /&gt;रजनी-दिन नित्य चला ही किया मैं अनंत की गोद में खेला हुआ&lt;br /&gt;चिरकाल न वास कहीं भी किया किसी आँधी से नित्य धकेला हुआ&lt;br /&gt;न थका न रुका न हटा न झुका किसी फक्कड़ बाबा का चेला हुआ&lt;br /&gt;मद चूता रहा तन मस्त बना अलबेला मैं ऐसा अकेला हुआ। ‘इप्टा’ (भारतीय जन नाट्य मंच) के किशोर गायक ने इस गीत को ऐसी लय में बाँधा कि इस कविता में मुझे नया अर्थ मिला. मुझे याद पड़ता है कि गायक गुहा नियोगी थे जो किसी कॉलेज में अंग्रेज़ी के अध्यापक, कवि और प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यकर्त्ता हैं. छंद सवैया है किन्तु मध्यकालीन स्वर सन्निधि से उत्पन्न शब्द-मैत्री बिलकुल टूटी है. लगता है, रीति को भावनाओं की धकापेल ने तोड़-फोड़ दिया है. सवैया में ‘फक्कड़ बाबा का चेला हुआ’ और किसी आँधी से नित्य धकेला हुआ बिलकुल नया स्वर है. यह विनोद का नहीं, अनुभव की तीव्रता का अदमित स्वर है जो सिर्फ पुरानी सवैया रीति को तोड़ ही नहीं रहा है, एक नई लय का प्रवर्तन कर रहा है. यह खड़खड़ाहट वीररसात्मक सवैयों की कड़कड़ाहट या गर्जना नहीं है, वैयक्तिकता का नया स्वर है. नरेन्द्र शर्मा, बच्चन, अंचल से भिन्न.&lt;br /&gt;किन्तु कवि हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इस रौ में कविताएँ नहीं लिखीं. लिखीं भी तो यह अनगढ़पन एकाध विनोदपरक कविताओं में ही दिखलाई पड़ा-उनका विनोद प्रायः आत्म-व्यंग्य के रूप में आता था-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जोरि जोरि अच्छर निचोरि चोरि औरन सों सरस कबित नवराग कौ गढ़ैया हौं,&lt;br /&gt;पंडित प्रसिद्ध पंडिताई बिना जानै कछू तीसकम बत्तिसेक वेद को पढ़ैया हौं.&lt;br /&gt;टाँय टाँय जानौं, कूकि कूकि पहिचानौं तत्त्व चिकिर चिकिर करि सुर कौ चढ़ैया हौं,&lt;br /&gt;भाइयो भगिनि यो बताइए विचारि आजु शुक बनौं पिक बनौं कि गौरैया हौं. &lt;br /&gt;तीसकम बत्तिसेक-तीस कम बत्तीस में (३२-३०=२) दो वेद पढ़ने वाला यानी द्विवेदी. तीसरी और चौथी पंक्ति में यथा क्रमत्व है-‘टाँय टाँय’ शुक की बोली, ‘कूकि कूकि’ कोयल की और चिकिर चिकिर गौरैया की है. कवित्त में रीतिकालीन विदग्धता मौजूद है. सिर्फ आत्म-हास और उसकी खड़खड़ाहट नई है. इसे भी फक्कड़पन के ही अंतर्गत समझना चाहिए.&lt;br /&gt;इस रौ में पंडित जी ने और कविताएँ भी लिखी होंगी. एक कविता तो मैंने सुनी है. पंजाब विश्वाविद्यालय से 60 वर्ष में सेवा निवृत्त होने पर लिखी थी. उसमें ‘खूब बना रस छका’ और ‘व्योमकेश दरवेश चलो अब’ जैसे टुकड़े थे. ‘बनारस में श्लेष और व्योमकेश की दरवेशी।’ फक्कड़पन की बात.&lt;br /&gt;द्विवेदी जी मूलतः जीवन की विसंगतियों, अनिश्चय, अस्थिरता आदि से अत्याधिक संवेदित, उद्वेलित होते थे. जीवन संघर्ष-संकुल था. निम्न-मध्यवर्गीय ब्राह्मण परिवार में जन्म, अभावग्रस्त सुविधावंचित विद्यार्थी-जीवन, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ, यश-सम्मान के साथ-साथ काशी-निष्कासन भी. काशी से शांतिनिकेतन, शांतिनिकेतन से काशी, काशी से चंडीगढ़, चंढ़ीगढ़ से फिर काशी और काशी से फिर लखनऊ. सो फक्कड़पन जीवनदृष्टि भी थी, अपने को सँभालने का आश्वसान भी था-&lt;br /&gt;रजनी-दिन नित्य चला ही किया मैं अनंत की गोद में खेला हुआ&lt;br /&gt;चिरकाल न वास कहीं भी किया किसी आँधी से नित्य धकेला हुआ. द्विवेदी जी ने एक कविता देवेन्द्र सत्यार्थी पर लिखी है. भोजपुरी लोकगान की तर्ज पर. देवेन्द्र सत्यार्थी लोकगीतों को एकत्र करते थे अकेले घूम-घूमकर. यह फक्कड़पन का काम था, इसीलिए द्विवेदी जी को पसंद था-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पउलों तोरी चिठिया, बजवलों बधौआ कि सत्यार्थी भइया रे&lt;br /&gt;तोरी डगर अकेल की सत्यार्थी भइया रे &lt;br /&gt;लोकगान के संग्रही कविवर रामनरेश त्रिपाठी से भी पंडित जी की पटती थी. फक्कड़पन से कबीर की याद आना स्वाभाविक है. कबीर को यह विशेषण द्विवेदी जी ने ही दिया है. इस फक्कड़पन से गहरी, आंतरिक यातना छिप जाती है. कबीर का समाधान विषय था. लोग जलते हैं तो जलाशय में जाकर आग बुझाते हैं. कबीर की समस्या विषम थी. जलाशय उनकी आग बुझाने के बदले स्वयं जलने लगता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मों देख्याँ जलहर जलै संतो कहाँ बुझाऊँ. यह फक्कड़पन महँगा सौदा है. यह घरफूँक मस्ती है. जो दुनिया अपनी नहीं है, अपनी नहीं हो सकती, उसे फूँक देने, उसे त्याग देने से निश्चिंचतता आती है. बहुत कुछ पूस की रात के हरखू की फसल जलकर राख हो जाने के बाद वाली निश्चिंचतता. द्विवेदी जी के छत-फोड़ अट्टाहस का संबंध उसी से है. द्विवेदी जी को ऐसा फक्कड़पन जिसमें भी दिखता था, आत्मीयता की अनुभूति होती थी. उनके उपन्यासों, निबंधों में ऐसे फक्कड़ चरित्र और जीव बिखरे पड़े हैं. सीदी, मौला, अघोर, भैरव, कुटज, शिरीष आदि इसी तरह के है. द्विवेदी जी का बहुप्रयुक्त पदबंध, ‘दलित द्राक्षा के समान, सब कुछ लुटा देने की क्षमता’ का संबंध भी उनके फक्कड़पन से है. इस फक्कड़पन स्वाधीनता के लिए संघर्ष करने वाला समाज ही अपने अंदर पैदा कर सकता था-या किसी आदर्श के लिए सब कुछ लुटाकर सुख पाने वाली साधना, जैसे कि भक्ति की साधना। द्विवेदी जी स्वाधीनता आंदोलन के दौर से कबीर-प्रेमी थे.&lt;br /&gt;ब्रजभाषा की कविताएँ बहुत कुछ रीतिमुक्त कवियों के ढर्रे की हैं, जिनमें स्वदेश-प्रेम और सामाजिक रूढ़ियों से संतप्त जनों के प्रति कवि की करुणा बही है. प्रेमपरक कविताओं में प्रेम के उदात्त पक्ष का चित्रण और प्रेम के नाम पर ओछे आचरण करने वालों का तिरस्कार किया गया है. विषय राधा-रानी और मनमोहन है, किन्तु प्रेम का यह दृष्टिकोण वही है जो आगे चलकर बाणभट्ट की आत्मकथा और अन्य उपन्यासों में मिलता है-ऐसा प्रेम जो मानव-जीवन को सार्थक कर देता है, मनुष्य को जड़ता से मुक्त करके उच्च भूमि पर स्थित कर देता है.&lt;br /&gt;प्रिय को सामने पाकर संकोच हो आना सच्चे प्रेमी का स्वभाव है. लम्पट प्रेम का प्रदर्शन तो करते ही हैं अवसर भी नहीं चूकते. हिन्दी कविता में संकोच-आचरण प्रायः नारियों द्वारा चित्रित किया गया है. द्विवेदी जी ने श्रृंगारपरक कविताओं में ऐसी सलज्ज संकोचपूर्ण स्थितियों का चित्रण और उसके कारण मन की हूक का मार्मिक चित्रण किया है-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आगे खरौ लखि नंद कौ लाल हमने सखि पैंड तजे री&lt;br /&gt;कुंजन ओट चली सचुपाइ (सकुचाई?) उपाइ लगाइ तहौं तिन घेरी&lt;br /&gt;मैं निदरे सखि रूप अनूपन कान्हर हू पर आँखि तरेरी&lt;br /&gt;पै परी फास अरी मुसुकानि की प्रान बचाइ न लाख बचे री.&lt;br /&gt;यह अनुभाव-सरणि बिहारी की तर्ज पर है. द्विवेदी जी रीतिकालीन कविताओं को सिर्फ दरबारी नहीं मानते थे. वे रीतिकालीन कविताओं में लोक-जीवन का चित्रण भी पाते थे. प्रेम-व्यापार सिर्फ सामंतों के जीवन में नहीं होता, लोक सामान्य जीवन में प्रेम मन के स्वास्थ्य और जीवन की स्वाभाविकता का परिचायक है. द्विवेदी जी की ब्रजभाषा में रचित श्रृंगारी कविताएँ ज्यादातर इसी तरह की हैं.&lt;br /&gt;द्विवेदी जी की कविताओं में, उनके निबंधों की ही भाँति, सर्वत्र एक विनोद-भाव मिलता है. गंभीर चिंतन और व्यापक अध्ययन को सहज तौर पर हलके-फुलके ढंग से पाठक श्रोता पर बोझ डाले बिना प्रकट करना उनके व्यक्तित्व और लेखक की विशेषता और क्षमता है. इस विशेषता और क्षमता का संबंध भी फक्कड़पन से ही है. द्विवेदी जी लोकवादी विशेषण को पसंद नहीं करते थे, क्योंकि वे लोकवाद का संस्कृत में क्या अर्थ होता है, समझते थे. लेकिन वे महत्व सबसे अधिक लोक को देते थे. वे बोलियों, लोक-साहित्य, लोकधुनों और जन-प्रचलित लोक-साहित्य-रूपों पर अतीव गंभीरता से विचार करते थे. एक दलित जाति का प्रचलित गीत है-‘करौ जिन जारी हे गिरवरधारी’. यह गीत चमड़े का काम करने वाली दलित जाति एक विशेष लय में गाती है. पंडित जी पहले इस पंक्ति को उसी लय में गाते, फिर वैदिक मंत्र उसी लय में. निष्कर्ष प्रस्तुत करते कि चमार जाति की इस गीत-लय में वेद-पाठ की लय सुरक्षित है. लोकगान की परंपरा में.&lt;br /&gt;सो गंभीर कथ्य को विनोद भाव से प्रस्तुत करने की भी धुनें हैं. उनमें एक प्रसिद्ध धुन नज़ीर अकबरवादी ने प्रयुक्त की है- ‘क्या-क्या कहूँ मैं कृष्ण कन्हैया का बालपन’.&lt;br /&gt;अब द्विवेदी जी की यह कविता पढ़िए-&lt;br /&gt;काली घटा बढ़ती चली आती है गगन पर,&lt;br /&gt;झुक झूम-झूम पेड़ हैं अलमस्त मगन, पर-&lt;br /&gt;साहित्य का सेवक किसी मसले में है उलझा,&lt;br /&gt;सुलझाना चाहता है पै पाता नहीं सुलझा.&lt;br /&gt;ऐसे ही समय आके कोई डाकिया हरिहर,&lt;br /&gt;‘पंडित जी’ कह पुकार उठा रूम के बाहर.&lt;br /&gt;बुकपोस्ट के बंडल हैं कई, पाँच-सात-दस&lt;br /&gt;इन पोथों में शायद ही हो रस का दरस-परस.&lt;br /&gt;फिर एक-एक को समालोचक है खोलता,&lt;br /&gt;कुंचन ललाट पर है और होठ डोलता.&lt;br /&gt;‘उँह मारिए गोली, वही अनुरोध लेख का,&lt;br /&gt;कुछ देख-रेख का तथा कुछ मीन-मेष का.’&lt;br /&gt;फिर खोलता है एक सुविख्यात-सा परचा,&lt;br /&gt;सर्वत्र धूम जिसकी है सर्वत्र ही चरचा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहला ही पृष्ठ देख के कुछ उन्मना हुआ,&lt;br /&gt;दो-चार और देख के दिल चुनमुना हुआ.&lt;br /&gt;फिर एक पृष्ठ और, हाथ माथे पै गया!&lt;br /&gt;आँखें गईं पथरा जो पृष्ठ खोले है नया!&lt;br /&gt;पढ़-पढ़ के ले रहा है उसाँसें हज़ारहा,&lt;br /&gt;आकाश मगर शान से बरसे ही जा रहा.&lt;br /&gt;पारे का सा दरियाव चहुँ ओर उछलता,&lt;br /&gt;बच्चों का दल उसे है लूटने को मचलता.&lt;br /&gt;टूप-टाप टूप-टाप टूप-टाप टूप-टाप,&lt;br /&gt;बच्चे क्या, मचल जाएँ जो बच्चों के बड़े बाप..... &lt;br /&gt;इस कविता की शब्दावली पर गौर कीजिए. कविता 1940 के आसपास लिखी गई होगी. 1950 से पहले तो निश्चित। द्विवेदी जी ने 1950 में शांति निकेतन छोड़ दिया था. संवेदना गैररोमांटिक है और शब्दावली रोज़मर्रा की. पात्र कल्पित नहीं. डाकिया हरिहर है. ‘पंडित जी कह पुकार उठा रूम के बाहर’. बुकपोस्ट में पाँच, सात, दस बंडल हैं-साहित्य की पोथियों के. किन्तु-‘इन पोथों में शायद ही हो रहा रस का दरस-परस.’ उधर आकाश शाम से बरसे जा रहा है. चहुँ ओर पारे का गरियाव उछल रहा है, इस उपमा पर गौर कीजिए. बरसात की बूँदों के लिए अछूती है. और नाद बिंब की यह आवृत्ति जो कविता की एक पूरी पंक्ति बन जाती है-टूप-टाप, टूप-टाप, टूप-टाप, टूप-टाप’.&lt;br /&gt;अनौपचारिक वार्तालाप यानी बतरस का मज़ा देती हुई इस कविता का कथ्य क्या है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सारी उमर लेखक ने की ज्योतिष की पढ़ाई,&lt;br /&gt;पर बम्बई वाले ने फतह कर ली लड़ाई.&lt;br /&gt;बंगाल के इस बोलपुर में कटी उमर,&lt;br /&gt;खजाना मगर तिलिस्म का पहुँचा है अमृतसर.&lt;br /&gt;दिन तीन ही में काले हो जाएँ सफेद केश,&lt;br /&gt;ऐसा गया का एक करामाती है दरवेश.&lt;br /&gt;मस्तानी दवा जो है इटावे से चल पड़ी,&lt;br /&gt;क्या वह भी न मिल सकती है लेखक को इस घड़ी.&lt;br /&gt;चटकीले बहुत से पड़े विज्ञापनों के ठाट,&lt;br /&gt;मैनेजरों ने हैं दिए पन्ने सभी ही पाट.&lt;br /&gt;देख इश्तिहार चूर्ण का मोदक वरास्त्र का,&lt;br /&gt;दिलखुश का, सेंट-सोप का और कोकशास्त्र का.&lt;br /&gt;यह झीन-सीन गेंद का आश्चर्य मलहम का,&lt;br /&gt;सब चूर-चूर हो गया अभिमान कलम का.&lt;br /&gt;कविता में लय का प्रवाह अनवरूद्ध नहीं है, प्रसंग के अनुसार दीर्घ, ह्रस्व का विधान करना पड़ता है, कहीं देर तक ठहरना पड़ता है, कहीं जल्दी से दौड़ जाना पड़ता है. जैसे ‘मैनेजरों ने हैं दिए पन्ने सभी ही पाट’ में मैनेजरों के ‘ने’ पर ठहरना है और ‘देख इश्तिहार चूर्ण में ‘ख’ के साथ इश्तिहार के ‘इ’ को मिलाकर ‘रिव’ पढ़ने से प्रवाह बनेगा. शास्त्र को व्यवहार से जीवित रखना होगा। खै़र!&lt;br /&gt;साहित्यिक पत्रिका या पुस्तक में ‘चटकीले बहुत से पड़े विज्ञापनों के ठाट’. ‘मैनेजरों ने हैं दिए पन्ने सभी ही पाट’. आजकल हम लोग जिस उपभोक्ता संस्कृति की बात करते हैं, टाइम्स ऑफ इण्डिया, हिन्दुस्तान टाइम्स, इंडिया टुडे, यहाँ तक कि हिन्दी के दैनिक हिन्दुस्तान, नवभारत टाइम्स आदि में प्रथम पृष्ठ पर नेताओं के फोटुओं की जगह माडेल्स ने ले ली है, भारतीय संस्कृति का खजुराहो संस्करण छाया हुआ है, उसकी शुरुआत हो चुकी थी और ज्योतिषाचार्य पं.हजारीप्रसाद द्विवेदी ने उस पर कविता भी लिख दी थी. विज्ञापनी संस्कृति के कारण साहित्य की दुर्दशा को चित्रित करने वाली खड़ी बोली हिन्दी की और शायद उर्दू की भी यह पहली कविता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठाठ व्यक्तिपरक निबंध का है. वही मामूली-सी बात से शुरुआत करके, विविध प्रसंगों से बहलाते-फुसलाते बतरस, अनौपचारिक आत्मीय ढंग से किसी निर्णायक ऐतिहासिक मुद्दे पर पहुँचा देना. कविता में निबंध की विधा का उपयोग करना मामूली बात नहीं. इसे कविता से गद्य में कर दें तो यह परसाई के व्यंग्य-निबंध जैसा हो जाएगा. लेकिन वाचन-लय से उत्पन्न प्रभाव त्यागकर कहानी का प्रभाव ज्यादा ग्रहण कर लेगा. इस विज्ञापनी संस्कृति से घाटा साहित्यकार को है-‘सब चूर-चूर हो गया अभिमान कलम का’.&lt;br /&gt;द्विवेदी जी ने संस्कृत और अपभ्रंश में भी कविता की है. कविता क्या की है, हाथ आजमाया है. पंत जी की या मंडन की कविताओं का ऐसा अनुवाद किया है कि वे अनुवाद नहीं लगतीं. पंत जी की प्रसिद्ध पंक्तियों-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छोड़ द्रुमों की यह छाया&lt;br /&gt;तोड़ प्रकृति से भी माया&lt;br /&gt;बाले तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन। का संस्कृत अनुवाद यों किया है-&lt;br /&gt;त्यक्तवा द्रुमाणमिह मंजुलाम्याम् विहाय मायां प्रकृतेरुदाराम्&lt;br /&gt;बालो सुजाले तव कुंतलानां कथं प्रबहनामि विलोचने में द्विवेदी जी दूसरों की पंक्तियों को संदर्भ में बिठलाकर ग्रहण कर लेते हैं और अपनी पंक्तियाँ दूसरों के हवाले कर देते हैं. उनकी रचनाओं में यह कौशल ऐसा रचा-बसा है कि कई बार इस बात का पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि पंक्तियाँ किसकी हैं। चारुचंद्र लेख में वर्णन है-रानी की दृष्टि युगलमूर्ति की ओर गई. हम दोनों ने साष्टांग प्रणाम किया. बाहर नारी माता की मधुर स्तुति सुनाई पड़ी-&lt;br /&gt;गताऽहं कालिंदीं गृहसलिलया नेतुमनसा&lt;br /&gt;घनद घोरैर्मेघै गगनमभितौ मेदुरमभूत्&lt;br /&gt;मृशं धारासारैरपतमसहाया क्षितितले&lt;br /&gt;ज्यत्वङ्के गृहणान्पटुनट कलः कोऽपि चपलः. जानकर ही समझेगा कि ये पंक्तियाँ ब्रजभाषा कवि मंडल के सवैये का अनुवाद हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भालि हौं तो गई जमुना जल को सो कहा कहौ वीर विपति परी.&lt;br /&gt;घहराय कै कारी घटा उनई इतनेई में गागर सीस धरी।. &lt;br /&gt;रपट्यो पग घाट चढ़यो न गयो कवि मंडल हवै कै बिहाल गिरी.&lt;br /&gt;चीर जीवहु नंद को बारो अरी! गहि बाँह गरीब ने ठाढ़ी करी. &lt;br /&gt;पुनर्नवा में मंजुला ने देवरात को पत्र लिखा है. पत्र में अपभ्रंश दोहा है-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुल्लह जण अणुराउ गरु लज्ज बरब्बसु प्राणु.&lt;br /&gt;सहि मणु विसम सिणेह बसु मरणु सरणु णहु आणु।. यह दोहा द्विवेदी जी की ही रचना है. मैंने त्रिलोचन शास्त्री और नामवर जी से बारहा पूछा कि बाणभट्ट की आत्मकथा का वस्तु-संकेतक यह श्लोक कहाँ से उद्धत है. स्रोत का पता नहीं चलता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जलौघमग्ना सचराचरा धरा&lt;br /&gt;विषाण कोट या ऽखिल विश्व मूर्त्ति ना.&lt;br /&gt;समुद्धृता येन बराह रूपिणा.&lt;br /&gt;समे स्वयंभू भगवान् प्रसीदतु।.&lt;br /&gt;अनुमानतः यही भी आचार्य द्विवेदी जी की रचना है. द्विवेदी जी मन में मौज उठने पर संस्कृत, हिन्दी, खड़ीबोली, अपभ्रंश, भोजपुरी-किसी में रचना करते थे. भाषा आयोग के सदस्य के रूप में गवाही लेने के बाद सी.वी.रमन पर श्लोक लिखा था-मुझे पूरा नहीं याद है-स्मृति से लिख रहा हूँ-&lt;br /&gt;मनोहरां तां मांग्ल मनोभवां..&lt;br /&gt;स एष सी.बी.रमणो महात्मा&lt;br /&gt;हा हंत नीबी रमणो बभूव।&lt;br /&gt;हिन्दी के प्रति रमण महोदय के मन में जो अवज्ञा थी उससे आहत होकर पंडित जी ने लिखा होगा.&lt;br /&gt;द्विवेदी जी की बिखरी लुप्तप्राय छोटी-बड़ी रचनाओं की खोज की जानी चाहिए. उन्हें संकलन में शामिल किया जाना चाहिए. समाधिस्थ शिव का चित्रण करने वाली कालिदास की पंक्तियों का हिन्दी में पद्यानुवाद किया था. पहली पंक्ति है-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बैठे संयमी त्रिलोचन शिव द्विवेदी जी स्वप्नजीवी थे, यथार्थ-द्रष्टा भी. उनकी दो वैचारिक कविताएँ (आप चाहें तो विचार कविताएँ भी कह लीजिए) निबंध के रूप में (नवें खंड) छपी हैं. ‘रे कवि एक बार सम्हल’ और ‘बोलो, काव्य के मर्मज्ञ’. इसमें उन्होंने अपनी दुविधा का बयान किया है, कल्पना में भारत का स्वर्णिम अतीत है और आँखों के सामने वर्तमान की दुर्दशा. &lt;br /&gt;‘मन में रमे हैं पूर्व युग के स्वर्ण मणिमय सौध’ किन्तु ‘आँखें देखती हैं ठठरियों के ठाठ, चिथड़ों के घृणास्पद ढूह’&lt;br /&gt;अपने इस व्यक्तित्व के बारे में वे लिखते हैं-&lt;br /&gt;मैं हूँ स्वयं जिन प्रतिवाद...मैं हूँ उभय तो विभ्रष्ट, अधर कलंक रंक त्रिशंकु.&lt;br /&gt;यथार्थ देखकर कवि कहता है-&lt;br /&gt;सत्यानाथ हो उस विधि-व्यवस्था का&lt;br /&gt;कि जिसने चूसना ही है सिखाया मनुज को नरात्य का,&lt;br /&gt;विध्वंस हो उस नीति का जिसने कि झूठी मानसिक उन्मादना को&lt;br /&gt;नाम दे देकर महामहिमा समन्वित बाँध रखा है&lt;br /&gt;मनुज को दीनता के पाश में. कविता में आगे सामान्य जन को अपार संभावनाओं वाला बताया गया है-तू धूल में लिपटे हुए जनों को क्या समझता है. ये हिमालय की जड़ खोद सकते हैं, जलधि को पाट सकते हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कि अरे इन खुफ्त गाने खाक को तू क्या समझता है&lt;br /&gt;कि ये जड़ खोद सकते हैं हिमालय की, पाट सकते जलधि को वंचित, अभावग्रस्त जन की शक्ति पर इतना भरोसा. कविता पर कम भरोसा. इतने बड़े-बड़े सरस्वती-पुत्रों की कविता क्या कर पाई! वाल्मीकि, व्यास, कालिदास की कविता से मनुष्य समाज में हिंसा, घृणा, पाशविकता कम हुई? नहीं फिर सारा काव्य व्यर्थ है-&lt;br /&gt;फिर क्यों काव्य का अभिमान?&lt;br /&gt;फिर क्यों व्यर्थ अभिसम्पात?&lt;br /&gt;फिर क्यों यह अरण्य –निनाद?&lt;br /&gt;फिर क्यों कलम कण्डूयन&lt;br /&gt;वृथा वाग्जाल! व्यर्थ प्रयास! यह निराशा उस चिंतक कवि की है, जो बार-बार मनुष्य की जय-यात्रा की बात करता है. मनुष्य की जय-यात्रा और कवि की व्यर्थता दोनों साथ-साथ हैं. इसीलिए वे भावुक और एकांगी नहीं हैं. द्विवेदी जी इकहरे चिंतक कवि नहीं. वे मानव-इतिहास और व्यक्तित्व की सफलता-विफलता को साथ-साथ देखते हैं. विरोधी भाव-दशा में वे विरोधी बातें करते जान पड़ते हैं, किन्तु यह वह मानवीय संवेदना है जो इतिहास की द्वंद्वात्मकता पर नज़र रखती है और युग-बोध की धार पर खराद कर नए मनुष्य को गढ़ने का प्रयास करती है. द्विवेदी जी की काव्य-दृष्टि मनुष्य की उच्चता और नीचता दोनों को देखती है. इसीलिए कविताओं में संवेदना और समझ का संयोग है. &lt;br /&gt;------------------विश्वनाथ त्रिपाठी कृत सभार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-1729057151592981889?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' 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src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-5231073348170443655?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/5231073348170443655/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=5231073348170443655' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/5231073348170443655'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/5231073348170443655'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/06/blog-post_13.html' title='टूटी हुई बिखरी हुई'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-4047793449971620959</id><published>2008-06-10T18:43:00.000+05:30</published><updated>2008-06-10T19:16:31.085+05:30</updated><title type='text'>ज़िल्लत की रोटी </title><content type='html'>&lt;a href="http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SE6FP6NBLdI/AAAAAAAAAMU/QdOx2828Kyo/s1600-h/125.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SE6FP6NBLdI/AAAAAAAAAMU/QdOx2828Kyo/s400/125.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5210248327282634194" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन दिनों अक्सर यह लगता है कि हम किसी महानाटक के बीचों-बीच उलझे हुए हैं. हालाँकि यह पता करना आसान नहीं कि इसे कब और कितना हम बाहर होकर देख रहे हैं और कब अपना आपा खोकर इसमें इसी के एक किरदार की तरह शरीक हो गए हैं. इस नए रंगमंच पर मुफ़्तखोर लम्पट पूँजी के कुटिल खेलों ने लगभग एक विराट बम्बइया फिल्म की शक़्ल अख़्तियार कर ली है. पिछले दिनों अन्तर्राष्टीय और राष्टीय पैमाने के कितने ही हत्या- अनुष्ठानों और फासीवादी पूर्वाभ्यासों को हमने दूरदर्शन के ‘सोप ऑपेरा’ की तरह कमरों में बैठकर देखा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नई दुनिया के ज़िद्दी और मग़रूर शहंशाह अपना निरंकुश बुलडोज़र लेकर इन दिनों राष्ट्र-राज्यों की सरहदों, राजनीतिक-आर्थिक संरचनाओं और पेचीदा रास्तों को मिस्मार करते और रौंदतें हुए एक नया भूगोल रचने का दुर्दांत अभियान चला रहे हैं. नए नक़्शे में दुनिया की शक़्ल एक खुले चरागाह की है. इस मुहिम के नतीजे में तबाही, अफ़रातफ़री और बदहवासी का भयानक दृश्य सामने है. यह एकल प्रलय जैसा दृश्य है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी इस विध्वंसलीला की शुरुआत है लेकिन यह स्पष्ट है कि सामाजिक संरचनाओं में विस्फोटों और अन्तःस्फोटों की एक श्रृंखला चल पड़ी है और उखड़ने-उजड़ने और टूटने-बिखरने के विनाशकारी भीषण दृश्य अभी और भी देखने होंगे.&lt;br /&gt;हम अपने सामने पुराने नवजागरणकालीन उदारवाद का आत्मसमर्पण, पतन और विसर्जन घटित होते हुए देख रहे हैं. ऐसे में नागरिक-समाज के निर्माण की विशद् कार्यसूची को परे धकेलते हुए राज्य, समाज और संस्कृति के निरंकुश पुनर्गठन का विचार प्रचारित और प्रतिष्ठित किया जा रहा है. शासक तबकों, नए दौलतमंदों और खाते-पीते मध्यवर्ग में ख़ासतौर पर लोकप्रिय ‘कल्चरल लुंपेनिज़्म’ हमारे युग में सांस्कृतिक जागरण की शक्ल में सामने आ रहा है. ज़ाहिल उपभोग और अपराध की संस्कृति सामाजिक प्रतिक्रियावाद की ताकतों और फासीवादी तत्त्वों के कुटिल गठजोड़ से इसे भीड़ का उन्माद जगानेवाले अन्धलोकवाद के आक्रमण रूपों में पेश कर रही है. नृशंसता के इस अश्लील उत्सव के पीछे मनुष्यद्रोह की विचारधारा और निर्बल-निर्धन आबादी के प्रति हिंसक हिक़ारत के भाव को आसानी से देखा जा सकता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परिस्थिति के जिस तर्क से असंगठित, असहाय, उत्पीड़ित आबादियाँ भारी मार झेल रही हैं; उसी तर्क से रचना, विचार या आविष्कार की अभी तक उपलब्ध जगह तेज़ी से गायब हो रही है. भोलेभाले बन कर लेखन या कविताई करना आज भी कोई मुश्किल काम नहीं है. लेकिन एक गम्भीर रचनाकार के लिए इतिहास की इस घड़ी की उद्धिग्नताएँ, बेचैनियाँ, विकलताएँ कशमकश और दबाव काफ़ी तीखे और कठिन हैं, लेकिन अनिवार्य भी हैं. हालाँकि उनसे बचने के तमाम रास्ते हमेशा उपलब्ध हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनुष्य और उसकी रचनात्मक ऊर्जा के अवमूल्यन और उसके स्वत्व और उसकी गरिमा की तिरस्कारपूर्ण अवहेलना के जिस अपदृश्य से इस समय हम रूबरू हैं उसे देखने और खड़े रहने के लिए भी काफी जीवट चाहिए. कहा जा सकता है कि समकालीन रचनाशीलता ख़ासकर कविता ने इस जीवट का परिचय दिया है और इस अपमानपूर्ण परिस्थिति से कोई ख़ास समझौता नहीं किया है. लेकिन इतना काफ़ी नहीं है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नई परिस्थित की एक विशेषता यह है कि इसने प्रतिरोध का एक अभूतपूर्व विराट समाजिक क्षेत्र खोल दिया है, जिसमें नए हस्तक्षेप और नई रचनात्मक कल्पना के लिए अपार सम्भावनाएँ छिपी हैं जो कुछ-कुछ सामने भी आने लगी हैं. अनेक आसानियाँ और झूठी तसल्लियाँ जो थीं, फिलहाल नहीं हैं और अलक्षित असम्बोधित प्रश्नों को टालना अब लगभग नामुमकिन है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गरीब आबादी  वंचित तबकों के लिए नागरिक समाज के निर्माण की लोकतान्त्रिक कार्यसूची अप्रासंगिक नहीं हुई है, बल्कि यह उनके पहले से कहीं ज़्यादा जीवन-मरण का प्रश्न है. इस विशाल आबादी में इस समय जनतन्त्र का हिस्सा बनने और उसे विस्तृत और सामभूत बनाने के लिए अभूतपूर्व व्याकुलता और सचे्ष्टता दिखाई दे रही है. लेकिन गहरे ऐतिहासिक रिश्ते के बावजूद प्रतिरोध की ऊर्जा के ये नए स्रोत समकालीन रचनाशीलता से दूर दिखाई देते हैं. अकिंचनता के खोल में शरण लेकर रचना की आज़ादी और उसकी जगह को ज़्यादा समय नहीं बचाया जा सकता. अनुकूलन या आत्मविसर्जन का ख़तरा पूरा है. रचना का देश-काल इस वक़्त प्रतिरोध पक्षनिर्माण और सामाजिक रूपान्तरण या पुनर्रचना के बड़े संघर्षों और उपायों से सक्रिय सम्बन्ध बनाकर ही पुनः प्राप्त किया जा सकेगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;______________ मनमोहन, &lt;em&gt;ज़िल्लत की रोटी &lt;/em&gt; की भूमिका&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-4047793449971620959?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/4047793449971620959/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=4047793449971620959' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/4047793449971620959'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/4047793449971620959'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/06/blog-post_10.html' title='&lt;strong&gt;ज़िल्लत की रोटी &lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SE6FP6NBLdI/AAAAAAAAAMU/QdOx2828Kyo/s72-c/125.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-2222527896542359474</id><published>2008-06-07T03:22:00.000+05:30</published><updated>2008-06-07T03:50:35.155+05:30</updated><title type='text'>तीसरा क्षण</title><content type='html'>&lt;a ="http://bp3.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SEm3uUwjhLI/AAAAAAAAAKo/WqTZxq0JbDE/s1600-h/140px-Gajanan_madhav_muktibodh.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SEm3uUwjhLI/AAAAAAAAAKo/WqTZxq0JbDE/s400/140px-Gajanan_madhav_muktibodh.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5208896450504918194" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;आज से कोई बीस साल पहले की बात है. मेरा एक मित्र केशव और मैं दोनों जंगल-जंगल घूमने जाया करते. पहाड़-पहाड़ चढ़ा करते, नदी-नदी पार किया करते. केशव मेरे-जैसा ही पन्द्रह वर्ष का बालक था. किन्तु वह मुझे बहुत ही रहस्यपूर्ण मालूम होता. उसका रहस्य बड़ा ही अजीब था. उस रहस्य से मैं भीतर ही भीतर बहुत आतंकित रहता. केशव ने ही बहुत-बहुत पहले मुझे बताया कि इड़ा, पिगंला और सुषुम्ना किसे कहते हैं. कुण्डलिनी चक्र से मुझे बड़ा डर लगता. उसने हठयोगियों की बहुत-सी बातें बड़े ही विस्तार के साथ वर्णन कीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    केशव का सिर पीछे से बहुत बड़ा था. आगे की ओर लम्बा और विस्तृत था. माथा साधारण और घनी-घनी भौंहों के नीचे काली आँखें, बहुत गहरी, मानो दो कुएँ पुतली के काँच से मढ़े हुए हों. यह भी लगता कि उसकी आँखें और जमी हुई हैं. आँखों के बीच, नाक की शुरुआत पर घनी-घनी भौहों की दोनों पट्टियाँ नीचे झुककर मिल जाती थीं. कभी-कभी नाई द्वारा वह इस मिलन-स्थल पर भौहों के बाल कटवा लेता. लेकिन उनके रोएँ फिर उग आते. आँखों के नीचे फीका-पीला, लम्बा, शिथिल और उकताया हुआ थका चेहरा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    केशव मझोले कद का बालक था जिसे खेलने-कूदने से कोई मोह नहीं था. उसका गणित विषय अच्छा था. इसीलिए केशव मेरे लिए मिडिल और मैट्रिक में जरूरी हो उठा था. फिर भी मैं केशव के प्रति विशेष उत्साहित नहीं था. मुझे प्रतीत हुआ कि वह मेरे प्रति अधिक स्नेह रखता है. वह मेरे पिताजी के श्रद्धेय मित्र का लड़का था इसलिए उसके वहाँ मेरा काफी आना-जाना था. केवल एक ही बात उसमें और मुझमें समान थी. वह बड़ा ही घुमक्कड़ था. मैं भी घूमने का शौकीन था. हम दोनों सुबह-शाम और छुट्टी के दिनों में तो दिन-भर दूर-दूर घूमने जाया करते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    इसके बावजूद उसका लम्बा चेहरा फीका और पीला रहता. किन्तु वह मुझसे अधिक स्वस्थ था, उसका डील ज्यादा मजबूत था. वह निस्सन्देह हट्टा-कट्टा था. फिर भी उसके चेहरे की त्वचा काफी पीली रहती। पीले लम्बे चेहरे पर घनी भौंहों के नीचे गहरी-गहरी काली चमकदार कुएँ-नुमा आँखें और सिर पर मोटे बाल और गोल अड़ियल मजबूत ठुड्डी मुझे बहुत ही रहस्य-भरी मालूम होती. केशव में बाल-सुलभ चंचलता न थी वह एक स्थिर प्रशान्त पाषाण-मूर्ति की भाँति मेरे साथ रहता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    मुझे लगता कि भूमि के गर्भ में कोई प्राचीन सरोवर है. उसके किनारे पर डरावने घाट, आतंककारी देव-मूर्तियाँ और रहस्यपूर्ण गर्भ-कक्षोंवाले पुराने मन्दिर हैं. इतिहास ने इन सबको दबा दिया। मिट्टी की तह पर तह, परतों पर परतें, चट्टानों पर चट्टानें छा गयीं. सारा दृश्य भूमि में गड़ गया, अदृश्य हो गया. और उसके स्थान पर यूकैलिप्ट्स के नये विलायती पेड़ लगा दिये गये. बंगले बना दिये गये. चमकदार कपड़े पहने हुई खूबसूरत लड़कियाँ घूमने लगीं. और उन्हीं-किन्हीं बंगलों में रहने लगा मेरा मित्र केशव जिसने शायद पिछले जन्म में या उसके भी पूर्व के जन्म में उसी भूमि-गर्भस्थ सरोवर का जल पिया होगा, वहाँ विचरण किया होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    मनुष्य का व्यक्तित्व एक गहरा रहस्य है-इसका प्रथम भान मुझे केशव द्वारा मिला-इसलिए नहीं कि केशव मेरे सामने खुला मुक्त हृदय नहीं था. उसके जीवन में कोई ऐसी बात नहीं थी जो छिपायी जाने योग्य हो. इसके अलावा वह बालक सचमुच बहुत दयालु, धीर-गम्भीर, भीषण कष्टों को सहज ही सह लेनेवाला, अत्यन्त क्षमाशील था. किन्तु साथ ही वह शिथिल, स्थिर, अचंचल, यन्त्रवत् और सहज-स्नेही था. उसमें सबसे बड़ा दोष यह था कि उसमें बालकोचित, बाल-सुलभ गुण-दोष नहीं थे. मुझे हमेशा लगा कि उसका विवेक वृद्धता का लक्षण है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    जब हम हाई-स्कूल में थे, केशव मुझे निर्जन अरण्य-प्रदेश में ले जाता. हम भर्तृहरि की गुहा, मछिन्दरनाथ की समाधि आदि निर्जन किन्तु पवित्र स्थानों में जाते. मंगलनाथ के पास शिप्रा नदी बहुत गहरी, प्रचण्ड मन्थर और श्याम-नील थी. उसके किनारे-किनारे हम नये-नये भौगोलिक प्रदेशों का अनुसन्धान करते. शिप्रा के किनारों पर गैरव और भैरव साँझें बितायीं. सुबहें और दुपहर अपने रक्त में समेट लीं. सारा वन्य-प्रदेश श्वास में भर लिया. सारी पृथ्वी वक्ष में छिपा ली.&lt;br /&gt;मैंने केशव को कभी भी योगाभ्यास करते हुए नहीं देखा, न उसने कभी सचमुच ऐसी साधना की. फिर भी वह मुझसे योग की बातें करता. सुषुम्ना नाड़ी के केन्द्रीय महत्त्व की बात उसने मुझे समझायी. षट्चक्र की व्यवस्था पर भी उसने पूर्ण प्रकाश डाला. मेरे मन के अँधेरे को उसके प्रकाश ने विच्छिन्न नहीं किया. किन्तु मुझे उसके योग की बातें रहस्य के मर्मभेदी डरावने अँधेरे की भाँति आकर्षित करती रहती मानो मैं किन्हीं गुहाओं के अँधेरे में चला जा रहा हूँ और कहीं से (किसी स्त्री की) कोई मर्मभेदी पुकार मुझे सुनाई दे रही है.&lt;br /&gt;मैंने अपने मन का यह चित्र उसे कह सुनाया. वह मेरी तरफ अब पहले से भी अधिक आकर्षित हुआ. बहुत सहानुभूति से मेरी तरफ ध्यान देता. धीरे-धीरे मैं उसके अत्यन्त निकट आ गया. उसकी सलाह के बिना काम करना अब मेरे लिए असम्भव हो गया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साधारण रूप से, मेरे मन में उठनेवाली भाव-तरंगें मैं उसे कह सुनाता-चाहे वे भावनाएँ अच्छी हों, चाहे बुरी, चाहे वे खुशी करने लायक हों, चाहें ढाँकने लायक। हम दोनों के बीच एक ऐसा विश्वास हो गया था कि तथ्य का अनादर करना, छुपाना, उससे परहेज करके दिमागी तलघर में डाल देना न केवल गलत है, वरन् उससे कई मानसिक उलझनें होती हैं.&lt;br /&gt;एक बात कह दूँ. अपने खयाल या भाव कहते समय मैं बहुत उच्छ्वसित हो उठता. मुझे लगता कि मन एक रहस्यमय लोक है. उसमें अँधेरा है. अँधेरे में सीढ़ियाँ है. सीढ़ियाँ गीली हैं. सबसे निचली सीढ़ी पानी में डूबी हुई है. वहाँ अथाह काला जल है. उस अथाह जल से स्वयं को ही डर लगता है. इस अथाह काले जल में कोई बैठा है. वह शायद मैं ही हूँ. अथाह और एकदम स्याह-अँधेरे पानी की सतह पर चाँदनी का एक चमकदार पट्टा फैला हुआ है, जिसमें मेरी ही आँखें चमक रही हैं, मानो दो नीले मूँगिया पत्थर भीतर उद्दीप्त हो उठे हों.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे मन के तहखाने में उठी हुई ध्वनियाँ उसे आकर्षित करतीं। धीरे-धीरे वह मुझमें ज्यादा दिलचस्पी लेने लगा. मैं जब उसे अपने मन की बातें, कह सुनाता तो वह क्षण-भर अपनी घनी भौंहोंवाली प्रशान्त-स्थिर आँखों से मेरी तरफ देखता रहता. साधारण बातें, जो कि हमारे समाज की विशेषताएँ थीं, हमारी चर्चा का विषय बनतीं. यद्यपि उसकी ज्ञान-सम्पत्ति अल्प ही थी, हमारी चर्चाएँ विविध विषयों पर होतीं. मुझे अभी तक याद है कि उसने मुझे पहली बार कहा था कि गाँधीवाद ने भावुक कर्म की प्रवृत्ति पर कुछ इस ढंग से जोर दिया है कि सप्रश्न बौद्धिक प्रवृत्ति दबा दी गयी है. असल में यह गाँधीवादी प्रवृत्ति प्रश्न, विश्लेषण और निष्कर्ष की बौद्धिक क्रियाओं का अनादर करती है. यह बात उसने मुझे तब कही थी जब सन् तीस-इकतीस का सत्याग्रह खत्म हो चुका था और विधान सभाओं में घुसने की प्रवृत्ति जोर पकड़ रही थी. तब हम स्थानीय इण्टरमीडिएट कॉलेज के फर्स्ट ईअर में पढ़ते थे. तभी हमने रूस के पंचवर्षीय आयोजन का नाम सुना था.&lt;br /&gt;इसके बाद हम डिग्री कॉलेज में पहुँचे-किसी दूसरे शहर में. मुझे नहीं मालूम था कि केशव ने भी वही कॉलेज जॉयन किया है. मैंने उसके बारे में जानकारी लेने की कोई कोशिश भी नहीं की थी. सच तो यह है कि मेरा उसके प्रति कोई विशेष स्नेह नहीं था, न कोई आकर्षण। ऐसे पाषाणवत्, प्रशान्त, गम्भीर व्यक्ति मुझे पसन्द नहीं। हाँ, उसके प्रति मेरे मन में सम्मान और प्रशंसा के भाव थे, और चूँकि वह मुझे बहुत चाहता था, इसलिए मुझे भी उसे चाहना पड़ता था. शायद उसे मेरी यह स्थिति मालूम थी. लेकिन कभी उसने अपने मन का भाव नहीं दरशाया इस सम्बन्ध में.&lt;br /&gt;और, एक बार, जब हम दोनों फोर्थ ईअर में पढ़ रहे थे वह मुझे कैण्टीन में चाय पिलाने ले गया. केवल मैं ही बात करता जा रहा था. आखिर वह बात भी क्या करता-उसे बात करना आता ही कहाँ था. मुझे फिलॉसफी में सबसे ऊँचे नम्बर मिले थे. मैंने प्रश्नों के उत्तर कैसे-कैसे दिये, इसका मैं रस-विभोर होकर वर्णन करता जा रहा था. चाय पीकर हम दोनों आधी मील दूर एक तालाब के किनारे जा बैठे. वह वैसा ही चुप था. मैंने साइकोऐनलिसिस की बात छेड़ दी थी. जब मेरी धारा-प्रवाह बात से वह कुछ उकताने लगता तब वह पत्थर उठाकर तालाब में फेंक मारता. पानी की सतह पर लहरें बनतीं और डुप्प-डुप्प की आवाज.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साँझ पानी के भीतर लटक गयी थी. सन्ध्या तालाब में प्रवेश कर नहीं रही थी. लाल-भड़क आकाशीय वस्त्र पानी में सूख रहे थे. और मैं सन्ध्या के इस रंगीन यौवन से उन्मत्त हो उठा था. हम दोनों उठे चले, और दूर एक पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े हो रहे. एकाएक मैं अपने से चौंक उठा. पता नहीं क्यों, मैं स्वयं एक अजीब भाव से आतंकित हो उठा. उस पीपल-वृक्ष के नीचे अँधेरे में मैने उससे एक अजीब और विलक्षण आवेश में कहा, ‘‘शाम, रंगीन शाम, मेरे भीतर समा गयी है, बस गयी है. वह एक जादुई रंगीन शक्ति है. मुझे उस सुकुमार ज्वाला-ग्राही जादुई शक्ति से-यानी मुझसे मुझे डर लगता है.’’ और सचमुच, तब मुझे एक कँपकँपी आ गयी !! इतने में शाम साँवली हो गयी. वृक्ष अँधेरे के स्तूप-व्यक्तित्व बन गये. पक्षी चुप हो उठे. एकाएक सब ओर स्तब्धता छा गयी. और, फिर इस स्तब्धता के भीतर से एक चम्पई पीली लहर ऊँचाई पर चढ़ गयी. कॉलेज के गुम्बद पर और वृक्षों के ऊँचे शिखरों पर लटकती हुई चाँदनी सफेद धोती सी चमकने लगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एकाएक मेरे कन्धे पर अपना शिथिल ढीला हाथ रख केशव ने मुझसे कहा, याद है एक बार तुमने सौन्दर्य की परिभाषा मुझसे पूछी थी ? मैंने उसकी बात की तरफ ध्यान न देते हुए बेरुखी-भरी आवाज में कहा, हाँ. &lt;br /&gt;‘‘अब तुम स्वयं अनुभव कर रहे हो.’’&lt;br /&gt;मैं नहीं जानता कि मैं क्या अनुभव कर रहा था. मैं केवल यही कह सकता हूँ कि किसी मादक अवर्णनीय शक्ति ने मुझे भीतर से जकड़ लिया था. मैं केवल इतना ही कह सकता हूँ कि उस समय मेरे-अन्तःकरण के भीतर एक कोई और व्यक्तित्त्व बैठा था. मैं उसे महसूस कर रहा था. कई बार उसे महसूस कर चुका था. किन्तु अब तो उसने भीतर से मुझे बिलकुल ही पकड़ लिया था. ‘‘मैं जो स्वयं था वह स्वयं हो गया था. अपने से ‘बृहत्तर’, विलक्षण अस्वयं.’’ एकाएक उस पाषाण-मूर्ति-मित्र की भीतरी रिक्तता पर मेरा ध्यान हो आया. वह मुझसे कितना दूर है, कितना भिन्न है, कितना अलग है-अवांछनीय रूप से भिन्न !!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह मुझसे पण्डिताऊ भाषा में कह रहा था, किसी वस्तु या दृश्य या भाव से मनुष्य जब एकाकार हो जाता है तब सौन्दर्य बोध होता है. सब्जेक्ट और ऑब्जेक्ट वस्तु और उसका दर्शन, इन दो पृथक् तत्त्वों का भेद मिटकर सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट से तादात्म्य प्राप्त कर लेता है तब सौन्दर्य भावना उद्बुद्ध होती है !!&lt;br /&gt;मैंने उसकी बात की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया. सौन्दर्य की परिभाषा वे करें जो उससे अछूते हैं, जैसे मेरा मित्र केशव! उनकी परिभाषा सही हो तो क्या, गलत हो तो क्या! इससे क्या होता जाता है !!&lt;br /&gt;दिन गुजरते गये. एक ही गांव के हम दो साथी, भिन्न प्रकृति के, भिन्न गुण-धर्म के, भिन्न दशाओं के। एक-दूसरे से उकता उठने के बावजूद हम दोनों मिल जाते. चर्चा करने लगते. मेरी कतरनी जैसी चलती. केशव साँकल में लगे हुए, फिर भी खुले हुए, ढीले ताले-सा प्रतीत होता. कोई मकान के अन्दर जाये, देख-भाल ले, चोर-चपाटी कर ले, लेकिन जाते वक्त साँकल में ताला जरूर अटका जाये, वह भी खुला हुआ; चाबी लगाने की जरूरत नहीं. ताला भीतर से टूटा है, चाबी लग ही नहीं सकती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इस ताले में एक दिन अकस्मात चाबी भी लग गयी. छुट्टी का दिन। वृक्षों के समीप धूप अलसा रही थी. मैं घर में बैठे-बैठे ‘बोर’ हो रहा था. मैंने साइकिल पर आते हुए और धूप में चमकते हुए एक चेहरे को दूर से देखा. इधर मैंने काफी कविताएँ लिख ली थीं. सोचा, शिकार खुद ही जाल में फँसने आ रहा है. केशव का चेहरा उत्तप्त था. चेहरे पर कुछ नयी बात थी जिसको मैं पहचान नहीं पाया. कविताओं से मुझे इतनी फुरसत नहीं थी कि केशव की तरफ ध्यान दे सकूँ. मैं तो अपने नशे में रहता था.&lt;br /&gt;अगर मैं बोलना न शुरू करता तो चुप्पी काली होकर घनी और घनी होकर और भी काली और लम्बी हो जाती. इसलिए मैंने ही बोलना शुरू किया, ‘‘कैसे निकले?’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;केशव गरदन एक ओर गिराकर रह गया. उसके बाल तब आधे माथे पर आ गये. मुझे लगा, वह आराम करना चाहता है. उसने आरम्भ किया, ‘‘मैंने तो  बहुच-बहुत सोचा कि ईस्थेटिक एक्सपीरिएन्स क्या है. आज मैंने इसी सम्बन्ध में कुछ लिखा है. तुम्हें सुनाने आया हूँ.’’&lt;br /&gt;भीतर दिल में मेरी नानी मर गयी. मैं खुद कविताएँ सुनाने की ख्वाहिश रखता था. अब यह केशव अपनी सुनाने बैठेगा. मेरी सारी दुपहर खराब हो जायेगी. शीः.&lt;br /&gt;मैंने प्रस्ताव रखा, ‘‘अपने उस विषय की बात ही क्यों न कर लें.’’&lt;br /&gt;‘‘ज़रूर; लेकिन तुम्हें डिसिप्लिन से बात करनी होगी.’’ यह कहकर वह मुस्करा दिया !!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह मुस्कराहट मुझे चुभ गयी. तो क्या मैं इतना पागल हूँ कि बात करने में भटक जाता हूँ! इस साले ने बहुत ध्यानपूर्वक मेरे स्वाभाव का अध्ययन किया होगा. शायद मैं इसे बहुत ‘बोर’ करता रहा हूँगा. अपने स्वभाव के अध्ययन के इतने अधिक और इतने प्रदीर्घ अवसर किसी को देना शायद उचित नहीं था. मैं तो उल्लू सरीखा बोलता जाता हूँ और ये हजरत अपने दिमाग की नोटबुक में मेरी हर गलती टीप लेते हैं!&lt;br /&gt;मैंने विश्वास दिलाने की जबरजस्त चेष्टा की और कुचेष्टा करते हुए ‘‘बात बिलकुल ढंग से ही होगी.’’&lt;br /&gt;उसने कहा, ‘‘मैंने तुम्हें बताया था कि ‘निज’ और ‘पर’ ‘स्व-पक्ष’ और ‘वस्तु-पक्ष’ दोनों जब एक हो जाते हैं तब तादातम्य उत्पन्न होता है!’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके भावों की गम्भीरता कुछ ऐसी थी, चेहरा उसने इतना सीरियस बना रखा था कि मुझे अपनी हँसी दबा देनी पड़ी. पहली बात तो यह है कि मुझे उसकी शब्दावली अच्छी नहीं लगी. यह तो मैं जनता हूँ कि सारे दर्शन का मूल आधार सब्जेक्ट-ऑब्जेक्ट रिलेशनशिप की कल्पना है-स्व-पक्ष और वस्तु-पक्ष की परिकल्पनाएँ और उन दो पक्षों के परस्पर सम्बन्ध की कल्पना के आधार पर ही दर्शन खड़ा होता है. अथवा यूँ कहिए की ज्ञान-मीमांसा खड़ी होती है. एपिस्टॅमॉलॉजी अर्थात् ज्ञान-मीमांसा की बुनियाद पर ही परिकल्पनाओं के प्रसाद की रचना की गयी है. इस दृष्टि से देखा जाये तो मुझे वाक्य पर हँसने की जरूरत नहीं थी. मैं उसकी स्थापना को विवाद्य मान सकता हूँ, हास्यास्पद नहीं.&lt;br /&gt;फिर भी मैं हँस पड़ा-इसलिए कि मुझे उसके शब्दों में, उसके स्वयं के विचित्र व्यक्तित्व की झलक दिखलाई दी. वही बोझिल, गतिहीन, ठण्डा, पाषाणवत् व्यक्तित्व!!&lt;br /&gt;उसकी भौहें कुछ आकुंचित हुईं. फीका, पीला चेहरा, किंचित् विस्मय से मेरी ओर वही ठण्डी दृष्टि डालने लगा-मानो वह मेरे रुख का अध्ययन करना चाहता हो.&lt;br /&gt;मैंने कहा, ‘‘भाई मुझे तादात्म्य और तदाकारिता की बात समझ में नहीं आयी. सच तो यह है कि किसी वस्तु में तदाकार नहीं हो पाता. तदाकारिता की बात का मैं खण्डन नहीं करता, किन्तु मैं उसको एक मान्यता के रूप में ग्रहण नहीं करना चाहता.’’&lt;br /&gt;उसने कहा, ‘‘क्यों?’’&lt;br /&gt;मैंने जवाब दिया, ‘‘एक तो मैं वस्तु-पक्ष का ठीक-ठीक अर्थ नहीं समझता. हिन्दी में मन से बाह्य वस्तु को ही वस्तु समझा जाता है-मेरा खयाल है. मैं कहता हूँ कि मन का तत्त्व भी वस्तु हो सकता है. और अगर यह मान लिया जाये कि मन का तत्त्व भी एक वस्तु है तो ऐसे तत्त्व के साथ तदाकारिता या तादातम्य का कोई मतलब नहीं होता क्योंकि वह तत्त्व मन ही का एक भाग है, हाँ, मैं इस मन के तत्त्व के साथ तटस्थता का रुख की कल्पना कर सकता हूँ; तदाकारिता नहीं.’’&lt;br /&gt;मेरे स्वर और शब्द की हल्की धीमी गति ने उसे विश्वास दिला दिया कि मैं उसकी बात उड़ाने के लिए नहीं कह रहा हूँ, वरन् उसकी बातें समझने में महसूस होनेवाली कठिनाई का बयान कर रहा हूँ.&lt;br /&gt;आखिकार वह मेरा मित्र था, बुद्धिमान और कुशाग्र था. उसने मेरी ओर देखकर किंचित् स्मित किया और कहने लगा, ‘‘तुम एक लेखक की हैसियत से  बोल रहे हो इसलिए ऐसा कहते हो. किन्तु सभी लोग लेखक नहीं हैं. दर्शक हैं, पाठक हैं, श्रोता हैं. वे हैं, इसलिए तुम भी हो-यह नहीं कि तुम हो इसलिए वे हैं!! वे तुम्हारे लिए नहीं हैं, तुम उनके सम्बन्ध से हो. पाठक या श्रोता तादात्म्य या तन्मयता से बातें शुरू करें तो तुम्हें आश्चर्य नहीं होना चाहिए.’’&lt;br /&gt;मेरे मुँह से निकला, ‘‘तो ?’’&lt;br /&gt;उसने जारी रखा, ‘‘तो यह कि लेखक की हैसियत से, सृजन-प्रक्रिया के विश्लेषण के रास्ते से होते हुए  सौन्दर्य-मीमांसा करोगे या पाठक अथवा दर्शक की हैसियत से, कालानुभव के मार्ग से गुजरते हुए सौन्दर्य की व्यख्या करोगे ? इस सवाल का जवाब दो!’’&lt;br /&gt;मैं उसकी चपेट में आ गया. मैं कह सकता था कि दोनों करूँगा. लेकिन मैंने ईमानदारी बरतना उचित समझा. मैंने कहा, ‘‘मैं तो लेखक की हैसियत से ही सौन्दर्य की व्याख्या करना चाहूँगा. इसलिए नहीं कि मैं लेखक को कोई बहुत ऊँचा स्थान देना चाहता हूँ वरन् इसलिए कि मैं वहाँ अपने अनुभव की चट्टान पर खड़ा हुआ हूँ.’’&lt;br /&gt;उसने भौहों को सिकोड़कर और फिर ढीला करते हुए जवाब दिया, ‘‘बहुत ठीक; लेकिन जो लोग लेखक नहीं हैं वे तो अपने ही अनुभव के दृढ़ आधार पर खड़े रहेंगे और उसी बुनियाद पर बात करेंगे. इसलिए उनके बारे में नाक-भौं सिकोड़ने की जरूरत नहीं. उन्हें नीचा देखना तो और भी गलत है.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने कहना जारी रखा, ‘‘इस बात पर बहुत कुछ निर्भर करता है कि आप किस सिरे से बात शुरू करेंगे! यदि पाठक श्रोता या दर्शक के सिरे से बात शुरू करेंगे तो आपकी विचार-यात्रा दूसरे ढंग की होगी. यदि लेखक सिरे से सोचना शुरू करेंगे तो बात अलग प्रकार की होगी. दोनों सिरे से बात होगी सौन्दर्य-मीमांसा की है. किन्तु यात्रा की भिन्नता के कारण अलग-अलग रास्तों का प्रभाव विचारों को भिन्न बना देगा.&lt;br /&gt;दो यात्राओं की परस्पर भिन्नता, अनिवार्य रूप से, परस्पर-विरोधी ही है-यह सोचना निराधार है. भिन्नता पूरक हो सकती है, विरोधी भी.&lt;br /&gt;यदि हम यथा तथ्य बात भी करें तो भी बल (एम्फैसिस) की भिन्नता के कारण विश्लेषण भी भिन्न हो जायेगा.&lt;br /&gt;किन्तु सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि प्रश्न किस प्रकार उपस्थित किया जाता है. प्रश्न तो आपकी विचार-यात्रा होगी. यदि इस विचार-यात्रा को रेगिस्तान में विचरण का पर्याय नहीं बनाना है तो प्रश्न को सही ढंग से प्रस्तुत करना होगा. यदि वह गलत ढंग से उपस्थित किया गया तो अगली सारी यात्रा गलत हो जायेगी.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने मेरी तरफ ध्यान से देखा. शायद वह देखना चाहता था कि मैं उसकी बात गम्भीरता पूर्वक सुन रहा हूँ या नहीं. शायद उसका यह विश्वास था कि मैं अत्यधिक इम्पल्सिव, सहज-उत्तेजित हो उठने वाला एक बेचैन आदमी की तरह हूँ. किन्तु मैं शान्त था. मेरे मन की केवल एक ही प्रतिक्रिया थ और वह यह कि केशव यह समझता है कि मैं समस्या को ठीक तरह से प्रस्तुत करना नहीं जानता. असल में उसकी यह धारणा मुझे बहुत अप्रिय लगी. मैं उसकी इस धारणा को बहुत पहले से जानता था. वह काई बार दुहरा भी चुका था. असल में वह बौद्धिक क्षेत्र में अपने को मुझसे उच्चतर समझता था. उसका ठण्डापन, उस के फलस्वरूप हम दो के बीच की दूरी, दूरी का सतत मान, और इस मान के बावजूद हम दोनों का नैकट्य-परस्पर घनिष्ठता और इसके विपरीत, दूरी के उस मान के कारण मेरे मन में केशव के विरुद्ध एक झख मारती खीझ और चिड़चिड़ापन—इन सब बातों से मेरे अन्तःकरण में, केशव से मेरे सम्बन्धों की भावना विषम हो गयी थी. सूत्र उलझ गये थे. मैं केसव को न तो पूर्णतः स्वीकृत कर सकता था न उसे अपनी जिन्दगी से हटा सकता था. इस प्रकार की मेरी स्थिति थी. फिर भी चूँकि ऐसी स्थित बहुत पहले से चली आयी थी इसलिए मुझे उसकी आदत पड़ गयी थी. किन्तु इस अभ्यस्तता के बावजूद कई बार में विक्षोभ फूट पड़ता और तब केशव की आँखों में एक चालाक रोशनी दिखाई देती, और मुझे सन्देह होता कि वह मेरी तरफ देखकर मुस्कराता हुआ कोई गहरी चोट कर रहा है. उस समय उसके विरुद्ध मेरे हृदय में घृणा का फोड़ा फूट पड़ता !!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी न किसी तरह मैं अपने को सामंजस्य और मानसिक सन्तुलन की समाधि में लिया; यह बताने के लिए मैं उसकी बातें ध्यानपूर्वक सुन रहा हूँ. मैंने उसके तर्कों और युक्तियों के प्रवाह में डूबकर मर जाना ही श्रेयस्कर समझा क्योंकि इस रवैये से या रुख से मेरे आत्मगौरव की रक्षा हो सकती थी. इस बीच मेरा मन दूर-दूर भटकने लगा. बाहर से शायद मैं धीर-प्रशान्त लग रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;---------------गजानन माधव मुक्तिबोध, &lt;em&gt;एक साहित्यिक की डायरी &lt;/em&gt; से साभार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-2222527896542359474?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/2222527896542359474/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=2222527896542359474' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/2222527896542359474'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/2222527896542359474'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/06/blog-post_06.html' title='&lt;strong&gt;तीसरा क्षण&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp3.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SEm3uUwjhLI/AAAAAAAAAKo/WqTZxq0JbDE/s72-c/140px-Gajanan_madhav_muktibodh.jpg' height='72' 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विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान ।&lt;br /&gt;सीस दिये जो गुर मिलै, तो भी सस्ता जान ॥3॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुरु गोविन्द दोऊ खड़े,काके लागूं पायं ।&lt;br /&gt;बलिहारी गुरु आपणे, जिन गोविन्द दिया दिखाय ॥4॥&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-7423171566660811533?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/7423171566660811533/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=7423171566660811533' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/7423171566660811533'/><link rel='self' type='application/atom+xml' 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="http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SEEVVf3g5ZI/AAAAAAAAAJE/Y2RgeKykn7Q/s1600-h/Leeladhar+jaguri.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SEEVVf3g5ZI/AAAAAAAAAJE/Y2RgeKykn7Q/s400/Leeladhar+jaguri.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5206466103292781970" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जब उसने कहा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कि अब सोना नहीं मिलेगा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर अगर वह कहता &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कि अब नमक नहीं मिलेगा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो शायद मैं रो पड़ता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;------------------लीलाधर जगूड़ी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-3423989412119258414?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/3423989412119258414/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=3423989412119258414' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/3423989412119258414'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/3423989412119258414'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/05/blog-post_31.html' title='&lt;strong&gt;तो &lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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तुरही&lt;br /&gt;पगड़ी छत्र चंवर के साथ&lt;br /&gt;तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर&lt;br /&gt;जय-जय कौन कराता है. &lt;br /&gt;पूरब-पश्चिम से आते हैं&lt;br /&gt;नंगे-बूचे नरकंकाल&lt;br /&gt;सिंहासन पर बैठा,&lt;br /&gt;उनके&lt;br /&gt;तमगे कौन लगाता है. &lt;br /&gt;कौन-कौन है वह जन-गण-मन&lt;br /&gt;अधिनायक वह महाबली&lt;br /&gt;डरा हुआ मन बेमन जिसका&lt;br /&gt;बाजा रोज बजाता है.&lt;br /&gt;--------------------रघुवीर सहाय&lt;a href="http://bp3.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SD6HA_3g5UI/AAAAAAAAAIU/53Gx7LBTiuo/s1600-h/-Raghuvirsahayg.jpg"&gt;&lt;img style="float:center; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SD6HA_3g5UI/AAAAAAAAAIU/53Gx7LBTiuo/s200/-Raghuvirsahayg.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5205746670500898114" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-1530018810134467174?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/1530018810134467174/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=1530018810134467174' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/1530018810134467174'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/1530018810134467174'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/05/blog-post_9761.html' title='&lt;strong&gt;राष्ट्रगीत&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp1.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SD6HXf3g5VI/AAAAAAAAAIc/FOl1Y05BcdM/s72-c/zx.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-4432217377376125332</id><published>2008-05-29T14:04:00.000+05:30</published><updated>2008-05-29T14:22:28.679+05:30</updated><title type='text'>एक कथा</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp1.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SD5usf3g5RI/AAAAAAAAAH8/TO_atbxzSio/s1600-h/ek+katha.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SD5usf3g5RI/AAAAAAAAAH8/TO_atbxzSio/s400/ek+katha.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5205719930034513170" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अपने प्रिय को सुनाता हूँ एक कथा &lt;br /&gt;जैसे एक बढ़ई गढ़ता है लकड़ी को &lt;br /&gt;रच देता है काठ का घोड़ा &lt;br /&gt;एक जादूगर आता है और उसे छू लेता है &lt;br /&gt;सजीव हो उठता है काठ का घोड़ा &lt;br /&gt;एक राजकुमार कसता है उस पर जीन &lt;br /&gt;और नीले आकाश में उड़ जाता है &lt;br /&gt;कितने भाग्यशाली हैं हे प्रिय &lt;br /&gt;काठ का घोड़ा, राजकुमार और नीला आकाश &lt;br /&gt;उनसे भी भाग्यशाली है हे प्रिय &lt;br /&gt;लकड़ी को जोड़कर नया संसार रचता &lt;br /&gt;वह बढ़ई &lt;br /&gt;काश मैं भी तुम्हें रच पाता, &lt;br /&gt;तुम एक फूल होती जिसमें खिला होता &lt;br /&gt;मेरा प्यार &lt;br /&gt;तुम सावन की बारिस होती &lt;br /&gt;जिसमें बरसता रहता प्यार &lt;br /&gt;तुम ब्रह्मावर्त से आने वाली मलयनील &lt;br /&gt;होती &lt;br /&gt;जिसमें &lt;br /&gt;महकता रहता प्यार &lt;br /&gt;तुम वो नदी होती &lt;br /&gt;जिसमें छल-छल मचलता होता मेरा प्यार, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं कदली बन में खोया &lt;br /&gt;अकेला ढूँढता हूँ तुझे. &lt;br /&gt;--------------------------बद्रीनारायण&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-4432217377376125332?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/4432217377376125332/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=4432217377376125332' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/4432217377376125332'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/4432217377376125332'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/05/blog-post_6772.html' title='&lt;strong&gt;एक कथा&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp1.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SD5usf3g5RI/AAAAAAAAAH8/TO_atbxzSio/s72-c/ek+katha.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-3317769436380801959</id><published>2008-05-29T13:40:00.000+05:30</published><updated>2008-05-29T13:51:15.977+05:30</updated><title type='text'>बच्‍चे काम पर जा रहे हैं </title><content type='html'>&lt;a href="http://bp3.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SD5mM_3g5QI/AAAAAAAAAH0/WMNFymge0ME/s1600-h/images.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SD5mM_3g5QI/AAAAAAAAAH0/WMNFymge0ME/s400/images.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5205710592775611650" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp3.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SD5l2_3g5PI/AAAAAAAAAHs/1klsNpNY4ns/s1600-h/images1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SD5l2_3g5PI/AAAAAAAAAHs/1klsNpNY4ns/s400/images1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5205710214818489586" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोहरे से ढँकी सड़क पर बच्‍चे काम पर जा रहे हैं &lt;br /&gt;सुबह सुबह &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बच्‍चे काम पर जा रहे हैं &lt;br /&gt;हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह &lt;br /&gt;भयानक है इसे विवरण के तरह लिखा जाना &lt;br /&gt;लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काम पर क्‍यों जा रहे हैं बच्‍चे? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्‍या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदें &lt;br /&gt;क्‍या दीमकों ने खा लिया हैं &lt;br /&gt;सारी रंग बिरंगी किताबों को &lt;br /&gt;क्‍या काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं सारे खिलौने &lt;br /&gt;क्‍या किसी भूकंप में ढह गई हैं &lt;br /&gt;सारे मदरसों की इमारतें &lt;br /&gt;क्‍या सारे मैदान, सारे बगीचे और घरों के आँगन &lt;br /&gt;खत्‍म हो गए हैं एकाएक &lt;br /&gt;तो फिर बचा ही क्‍या है इस दुनिया में? &lt;br /&gt;कितना भयानक होता अगर ऐसा होता &lt;br /&gt;भयानक है लेकिन इससे भी ज्‍यादा यह &lt;br /&gt;कि हैं सारी चीज़ें हस्‍बमामूल &lt;br /&gt;पर दुनिया की हज़ारों सड़कों से गुजते हुए &lt;br /&gt;बच्‍चे, बहुत छोटे छोटे बच्‍चे &lt;br /&gt;काम पर जा रहे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;----------------------------राजेश जोशी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-3317769436380801959?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/3317769436380801959/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=3317769436380801959' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/3317769436380801959'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/3317769436380801959'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/05/blog-post_323.html' title='&lt;strong&gt;बच्‍चे काम पर जा रहे हैं &lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp3.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SD5mM_3g5QI/AAAAAAAAAH0/WMNFymge0ME/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-7947482508072163295</id><published>2008-05-21T23:53:00.000+05:30</published><updated>2008-05-21T23:57:42.350+05:30</updated><title type='text'>जब-जब देखा</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SDRphUdTmBI/AAAAAAAAAGU/JiZAXJPxiOs/s1600-h/140px-Kedarnath_Agarwal.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SDRphUdTmBI/AAAAAAAAAGU/JiZAXJPxiOs/s200/140px-Kedarnath_Agarwal.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5202899490667993106" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मैंने उसको &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब-जब देखा, &lt;br /&gt;लोहा देखा, &lt;br /&gt;लोहा जैसा-- &lt;br /&gt;तपते देखा, &lt;br /&gt;गलते देखा, &lt;br /&gt;ढलते देखा, &lt;br /&gt;मैंने उसको &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोली जैसा &lt;br /&gt;चलते देखा !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;___________केदारनाथ अग्रवाल&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-7947482508072163295?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/7947482508072163295/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=7947482508072163295' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/7947482508072163295'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/7947482508072163295'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/05/blog-post_9321.html' title='&lt;strong&gt;जब-जब देखा&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp2.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SDRphUdTmBI/AAAAAAAAAGU/JiZAXJPxiOs/s72-c/140px-Kedarnath_Agarwal.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-4598021187619243244</id><published>2008-05-21T23:23:00.000+05:30</published><updated>2008-05-21T23:25:17.972+05:30</updated><title type='text'>छाप-तिलक तज दीन्हीं</title><content type='html'>छाप-तिलक तज दीन्हीं रे तोसे नैना मिला के. &lt;br /&gt;प्रेम बटी का मदवा पिला के, &lt;br /&gt;मतबारी कर दीन्हीं रे मोंसे नैना मिला के.&lt;br /&gt;खुसरो निज़ाम पै बलि-बलि जइए &lt;br /&gt;मोहे सुहागन कीन्हीं रे मोसे नैना मिला के.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;------------------------------------- अमीर खुसरो&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-4598021187619243244?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/4598021187619243244/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=4598021187619243244' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/4598021187619243244'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/4598021187619243244'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/05/blog-post_21.html' title='&lt;strong&gt;छाप-तिलक तज दीन्हीं&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8601993305620549940.post-3741653742700301542</id><published>2008-05-20T11:05:00.000+05:30</published><updated>2008-05-21T23:29:26.248+05:30</updated><title type='text'>हाशिए पर</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SDJnaUdTl9I/AAAAAAAAAFs/VOvWtngYAzY/s1600-h/scan0001.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SDJnaUdTl9I/AAAAAAAAAFs/VOvWtngYAzY/s200/scan0001.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5202334221432231890" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तुम हमारा ज़िक्र इतिहासों में&lt;br /&gt;नहीं पाओगे&lt;br /&gt;और न उस कराह का&lt;br /&gt;जो तुमने उस रात सुनी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्योंकि हमने अपने को&lt;br /&gt;इतिहास के विरूद्ध दे दिया है&lt;br /&gt;लेकिन जहाँ तुम्हें इतिहास में&lt;br /&gt;छूटी हुई जगह दिखे&lt;br /&gt;और दबी हुई चीख का अहसास हो&lt;br /&gt;समझना हम वहाँ मौजूद थे."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;( विजयदेव नारायण साही ने यह कविता ह्रदयेश की किताब &lt;em&gt;इतिहास&lt;/em&gt; के मुख्य पृष्ट पर दी है. )&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8601993305620549940-3741653742700301542?l=hindisaahitya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/feeds/3741653742700301542/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8601993305620549940&amp;postID=3741653742700301542' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/3741653742700301542'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8601993305620549940/posts/default/3741653742700301542'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hindisaahitya.blogspot.com/2008/05/blog-post_19.html' title='&lt;strong&gt;हाशिए पर&lt;/strong&gt;'/><author><name>भास्कर रौशन</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='28' height='32' src='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SHrPFOD0aYI/AAAAAAAAAVg/smBhxaiog8c/S220/at.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp0.blogger.com/_5z_5iTul5kU/SDJnaUdTl9I/AAAAAAAAAFs/VOvWtngYAzY/s72-c/scan0001.jpg' height='72' 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